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राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की प्रमुख बातें

  • राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955, 15 अक्टूबर 1955 से लागू हुआ।
  • तहसील आबू, अजमेर एवं सुनेल में यह अधिनियम 15 जून 1958 से लागू किया गया।
  • इस अधिनियम के अधीन बिचौलिये पूर्णतया समाप्त कर दिये गये एवं अब राजस्थान में सभी काश्तकार भूमि पर सिर्फ राज्य के अन्तर्गत अपना हक रखते है।
  • राज्य सभी भूमि का स्वामी माना जाता है। दूसरे शब्दों में राज्य भूमि का ''विधितः स्वामी'' और काश्तकार ''वस्तुतः स्वामी'' है।
    फिर भी काश्तकारी अधिनियम के उपबन्ध और उसके अन्तर्गत बनाये गये नियम राजस्थान भू-दान योजना अधिनियम, 1954 के उपबन्धों एवं उनके अंतर्गत बनाये गए नियमों या उन उपबन्धो को अनुसरण करने में किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं डालते। 
  • भू-दान योजना अधिनियम इस विषय पर एक पूर्ण विधान है एवं इसके अन्तर्गत भू-दान योजना बोर्ड के गठन, उक्त बोर्ड को भूमि के दान, दान में आई हुई भूमि को भूमिहीन व्यक्तियों में या सामुदायिक प्रयोजन के लिए बाँटने तथा आनुषंगिक कार्य करने की व्यवस्था है। 
  • इस अधिनियम की धारा 11 के तहत कोई व्यक्ति जो भूमि का स्वामी है ऐसी भूमि को लिखित घोषणा द्वारा बोर्ड को दान या प्रदान कर सकता है। ऐसी भूमि का स्वामित्व बोर्ड में  निहित होंगे।
(राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 260)
 

काश्तकारों  के वर्ग - 

कानून के अनुसार काश्तकारों के निम्नलिखित वर्ग हैं :-

(i) खातेदार काश्तकार
(ii) गैर खातेदार काश्तकार
(iii) मालिक
(iv) खुदकाश्त काश्तकार ।

खातेदार काश्तकार :- 

हालांकि काश्तकार चार प्रकार के होते हैं लेकिन उक्त बिंदु (iii) के मालिक और बिंदु (iv) के ख़ुदकाश्तकार के अधिकार और दायित्व या तो खातेदार काश्तकारों या गैर खातेदार काश्तकारों के अनुरूप होते हैं।
 
उपर्युक्त से यह स्पष्ट है कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग खातेदार काश्तकारों का है, जिसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है :-

''ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसे अधिनियम लागू होने के समय काश्तकार स्वीकार किया गया है, या जो खातेदारी अधिकार अर्जित कर लेता है राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 द्वारा खातदारों को प्रदान किये गए सभी अधिकारों का हकदार होगा और उन पर लगाई गई सभी देनदारियां उस पर होगी। तथापि इस धारा के अधीन किसी ऐसे काश्तकार को खातेदारी अधिकार प्राप्त नहीं होंगे, जिसे राजस्थान नहर, गंगनहर, भाखड़ा, चम्बल या जवाई परियोजना क्षेत्र में या इस उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य क्षेत्र में अस्थायी रूप  से भूमि दी गई है।''

वे भूमि जिस पर खातेदारी अधिकार प्रोद्भूत नहीं होंगे :-

निम्नलिखित भूमि पर खातेदारी प्रोद्भूत नहीं होगेःं -

(i) चारागाह
(ii) नदी या तालाब के तल में नैमित्तिक या आकस्मिक खेती के लिए प्रयुक्त की जाने वाली भूमि।
(iii) सिंघाड़े या उस जैसी उत्पादों की पैदावार के लिए प्रयुक्त की जाने वाली जलावृत्त भूमि।
(iv) परिवर्ती और अस्थायी कृषि के अधीन भूमि।
(v) राज्य सरकार के स्वामित्व अथवा देखरेख वाली बागों की भूमि।
(vi) सार्वजनिक उपयोग या सार्वजनिक उपयोग कार्य के लिए प्राप्त अथवा धारित भूमि।
(vii) सैनिक शिविर लगाने के लिए नियत की गई भूमि

(viii) छावनी की सीमाओं में स्थित भूमि 
(ix) सरकारी वन की सीमाओं में स्थित भूमि 
(x) रेलवे या नहर की सीमाओं में आने वाली भूमि
(xi) नगर ट्रैचिंग ग्राउण्ड
(xii) कृषि प्रशिक्षण या खेल के मैदान के लिए शिक्षा संस्थाओं द्वारा धारित या अर्जित भूमि
(xiii) सरकारी कृषि या घास स्थली की सीमाओं में आने वाली भूमि और
(xiv) ऐसी
भूमि जिसे गाँव या आस-पास के गाँवों के जलाशय या तालाब में पानी पहुंचाने के लिए अलग रखा गया है या कलक्टर की राय में अलग रखा जाना आवश्यक है।

परन्तु राजस्थान सरकार राजस्थान गजट में अधिसूचना जारी करके यह घोषणा कर सकती है कि अधिनियम की धारा (16) के परन्तुक में निर्दिष्ट शर्तो के अधीन आने वाली अमुक भूमि खातेदारी अधिकारों पर दिए जाने के लिए उपलब्ध है।

टिप्पणी-1 

किसी कृत्रिम व्यक्ति जैसे किसी संस्था, निगमन, मन्दिर, मस्जिद (राजस्व बोर्ड का 1955 का आर.आर.आर. संख्या 125) अथवा कृषि सहकारी समितियों द्वारा काश्तकार के रूप में धारित भूमि पर खातेदारी अधिकार प्रोद्भूत नहीं होंगे, जिन्हे राजस्थान भू - राजस्व (सहकारी समितियों   को भूमि का आवंटन) नियमावली 1959 के अधीन भूमि आवंटित की गई है।

टिप्पणी-2 

कुछ मामलों में गुरूद्वारों के अधीन भूमि को ग्रंथियों की खातेदारी में दर्ज किया गया है। ऐसी भूमि धार्मिक संस्थाओं से संबद्ध थी उसे ग्रंथियों के नाम दर्ज कर देने से ये धार्मिक संस्थाएं अपनी वार्षिक आय से वंचित हो गई है। ग्रथियों और मौलवियों को आवंटित किये जाने के संबंध में सरकार ने यह निर्णय लिया है कि गुरूद्वारों की जो भूमियां ग्रंथियों के खातेदारी रिकार्ड में पहले ही (23.3.1970 तक) दर्ज हो चुकी है, इन भूमि की बाजार भाव पर कीमत सरकार को अदा कर देने पर उनके नाम पर रहने दिया जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि और इलाकों में ऐसी भूमि केवल धार्मिक संस्थाओं की खातेदारी में दर्ज की जाएं। 

काश्तकारों को उत्तराधिकार -


जब एक काश्तकार की निर्वसीयती रूप से मृत्यु हो जाती है तो उसकी जोत पर उसके हित अधिकार वैयक्तिक विधि जिसके अध्याधीन वह मृत्यु के समय था, अन्तरित कर दिये जाएंगे।
एक काश्तकार जिसकी काश्तकारी अधिनियम लागू होने से पूर्व मृत्यु हो जाती है तो उसका उत्तराधिकार इस संबंध में उस समय प्रचलित प्रसंविदा की स्थिति के अनुसार होगा।
मूर्ति या देवता को धारित
भूमि का उत्तराधिकार नहीं मिल सकता क्योंकि उसका कानून शाश्वत अस्तित्व है।
(प्राधिकार- रामदीन बनाम नूरा 1961 आर.आर.डी. 57, 1966 आर.आर.डी. 332)

बिक्री या दान द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को अधिनियम की धारा 42 में दी गई कुछ शर्तों के अधीन खातेदार को अपनी पूरी जोत में या उसके किसी अंश में अपने हितों को अन्तरित करने का अधिकार है। जोत में अपने हितों का निपटान वह वसीयत द्वारा भी कर सकता है।
 

उसे अधिकार है कि वहः-

(i) किन्हीं परिस्थितियों में भूमि बंधक रख सकता है।
(
ii) किसी समय अपनी जोत को 5 वर्ष तक के लिए शिकमी पट्टे पर दे सकता है।
(
iii) अपनी इच्छानुसार अपने घरेलू या कृषि संबंधी उपयोग के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों में वृक्ष लगा सकता है या काट सकता है।

किसान अपनी जोत के  निम्नलिखित सुधार कर सकता हैः-

(क) स्वयं रहने के लिए मकान बनवा सकता है या कृषि प्रयोजन के लिए पशुशाला या भण्डारगृह या अन्य कोई निर्माण कर सकता है।
(ख) कोई ऐसा निर्माण कार्य कर सकता है, जिससे उसको जोत के मूल्य में पर्याप्त वृद्धि हो और जो उस प्रयोजन के अनुसार हो जिसके लिए भूमि दी गई थी। 

(अ) जब तक लगान देता रहे और ऐसा कोई कार्य न करे जो भूमि के लिए अहितकर है तब तक भूमि पर अपना कब्जा रख सकता है (धारा 161 और 162) लगान अदा न करने पर उसे बेदखल किया जा सकता है।
 

टिप्पणी-

तथापि राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 42 में एक खातेदार काश्तकार द्वारा बिक्री, उपहार या वसीयत करने पर निर्बन्धन दिये गये है।

गैर खातेदार काश्तकार -

खातेदार या उप खातेदार से भिन्न अन्य प्रत्येक काश्तकार को गैर खातेदार काश्तकार माना जाता है। गैर खातेदार काश्तकार निम्नलिखित वर्गों में आते हैः-
  • (i) वे खातेदार जिन्हें ऐसी भूमि दी गई है जिस पर अधिनियम की धारा 16 के कारण खातेदार अधिकार प्रोद्भूत नहीं हो सकते।

राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1970 की धारा 14 के अनुसार
-

  • (ii) वे खातेदार जिन्हें राजस्थान उपनिवेशन अधिनियम 1954 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार किसी बस्ती में भूमि दी गई है और
  • (iii) वे काश्तकार जिन्हें राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 101 के अधीन बनाए गए आवंटन नियमों के अनुसार भूमि दी गई/दी जाती है।
  • इन काश्तकारों के अपनी जोतों में हित जैसाकि ऊपर कहा गया है वंशानुगत है, किन्तु अन्तरणी नहीं है। बस्ती क्षेत्र को छोड़कर वे अपनी भूमि अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए शिकमी दे सकते है। अधिनियम की धारा 79 और 84(3) में निर्धारित कुछ शर्तों के अधीन वे भूमि में सुधार ला सकते है। पेड़ पौधे लगा सकते/ काट सकते है।
  • राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 15 के अनुसार खातेदारी अधिकार उन काश्तकारों को प्रोदभूत होते हैं जो 15 अक्टूबर 1955 तक काश्तकार के रूप में  दर्ज हो चुके थे। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 19 में उप काश्तकारों और खुदकाश्त के काश्तकारों को खातेदारी प्रदान किये जाने की व्यवस्था है। 

राजस्थान भू - राजस्व (कृषि प्रयोजनों के लिए भूमि का आवंटन) नियमावली 1970 में अन्य व्यवस्थाएं भी है। 

  • इन व्यवस्थाओ के अनुसार जिस आवंटिती ने आवंटन की शर्तों का उल्लंघन न करते हुए 10 वर्ष पूरे कर लिए है वह खातेदारी अधिकारों के लिए आवेदन कर सकता है।
  • जिस आवंटिती को 31 दिसम्बर 1969 तक भूमि आवंटित की जा चुकी है, वह उक्त अवधि बीतने से पहले भी खातेदारी अधिकार प्राप्त करने का हकदार है, बशर्ते कि वह बकाया अवधि के प्रत्येक वर्ष के लिए भू-राजस्व का ढाई गुणा प्रीमियम अदा करें ।* (*संशोधित आदेश दिनांक 15.9.2001)

 धृति का विभाजन:- 


राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 53(1) में उपबंध किया गया है कि किसी भी धृति को इस प्रकार विभाजित नहीं किया जायेगा जिससे धृति का क्षेत्र प्रत्येक जिला या जिले के लिए राज्य सरकार द्वारा निर्धारित क्षेत्र से कम क्षेत्र हो जाये।
परन्तु 12.7.1978 से औद्योगिक, आवासीय या वाणिज्यिक प्रयोजनों से सम्बन्धी विभाजनों पर यह उपधारा लागू नहीं होगी। धारा 53(2) के अधीन किसी जोत क्षेत्र का विभाजन जोत क्षेत्र के ऐसे विभाजन और इस प्रकार कई हिस्सों में विभाजित जोत क्षेत्र के लगान बंटवारे के संबंध में सह काश्तकारों के बीच हुए समझौते द्वारा या जोत क्षेत्र के विभाजन और इस
प्रकार विभाजित जोत क्षेत्र के कई हिस्सों पर लगान के बंटवारे के विषय में एक या एक से अधिक सह काश्तकारों द्वारा किये गये किसी मुकदमें में सक्षम न्यायालय द्वारा दिये गये आदेश या डिक्री द्वारा लागू किया जा सकता है।
(राजकीय परिपत्र क्रमांक एफ 6(38) राज./ ग्रुप-4 /73 दिनांक 7.4.1973)


काश्तकारी अधिनियम के अध्याय- III ख में अधिकतम सीमा से अधिक जोतों पर प्रतिबंध लगाए गए है। 5 या 5 से कम सदस्यों के परिवार के लिए अधिकतम जोत सीमा 30 मानक एकड़ और 5 से अधिक सदस्यों के परिवार के लिए अधिकतम सीमा प्रत्येक अतिरिक्त सदस्य के लिए 5 मानक एकड़ बढ़ायी जानी है, लेकिन इसकी सीमा 60 मानक एकड़ से अधिक नहीं होगी।
राजस्थान कृषि जोत अधिकतम सीमा का अधिरोपण अधिनियम 1973 बन जाने पर पांच या
पांच से कम सदस्यों के परिवार की प्राथमिक इकाई के लिए निम्नलिखित के संबंध में जोत क्षेत्र की अधिकतम सीमा इस प्रकार होगी :- 

(क) सुनिश्चित सिंचाई वाली भूमि जिसमें वर्ष में कम से कम दो फसलें उगाई जा सकती है- 18 एकड़
(ख) सुनिश्चित सिंचाई वाली भूमि जिसमें वर्ष में कम से कम एक फसल उगाई जा सकती है -27 एकड़
(ग) 23 जुलाई 1972 को विद्यमान फलोद्यान के अधीन भूमि - 54 एकड़
(घ) खण्ड(क) से (ग) में निर्दिष्ट वर्गों में न आने वाली और उपजाऊ जोन में आने वाली भूमि जैसे कुएं से सिंचित भूमि- 48 एकड़।
(ड.) खण्ड(क) से(घ) में निर्दिष्ट वर्गों में न आने वाली और अर्द्ध उपजाऊ जोन में आने वाली भूमि - 54 एकड़।
(च) खण्ड (क) से (ड.) में निर्दिष्ट वर्गों में न आने वाली और पहाड़ी जोन में आने वाली भूमि - 54 एकड़ ।
(छ) खण्ड (क) से (च) में निर्दिष्ट वर्गों  में न आने वाली और अर्द्ध मरूस्थली जाने में आने वाली भूमि - 125 एकड़
(ज) खण्ड (छ) में निर्दिष्ट वर्ग में न आने वाली और मरूस्थली जोन में आने वाली भूमि - 175 एकड़।

यदि किसी परिवार के सदस्यों की संख्या 5 से अधिक है तो प्रत्येक अतिरिक्त सदस्य के लिए 1/5 भूमि क्षेत्र बढ़ जाएगा लेकिन उस परिवार के लिए भूमि की अधिकतम सीमा उस सीमा के दुगने से अधिक नहीं होगी जो 5 या 5 से कम सदस्यों वाले परिवार के लिए होगी।

जिस व्यक्ति के पास अधिकतम सीमा से अधिक भूमि है, उसे अतिरिक्त भूमि सरकार को सौंपनी पड़ेगी। जिसे भूमिहीन व्यक्तियों में आवंटित किया जाएगा। भूमि छोड़ने वाले व्यक्तियों को मुआवजा दिया जावेगा। जिन व्यक्तियों को अधिकतम जोत सीमा कानून के अधीन प्राप्त की गई भूमि 1 जनवरी 1973 से पहले बांटी गई थी उन्हें निम्नलिखित दरों पर भूमि का मूल्य चुकाना था:-

(क) असिंचित (बारानी) - गांव में निम्नतम वर्ग की बारानी भूमि के लिए स्वीकृत लगान की दर का 30 गुना
(ख) कुएं से सिंचित (चाही) - चाही वर्ग की भूमि के लिए स्वीकृत दर का 30 गुना ।

(ग) मध्यम या लघु सिंचाईं परियोजना के अधीन आने वाली भूमि - जिस वर्ग की भूमि है उसके लिए स्वीकृत लगान की दर का 40 गुना ।
(घ) किसी मुख्य सिंचाईं परियोजना के अधीन आने वाली भूमि - जिस वर्ग की भूमि है उसके लिए स्वीकृत लगान की दर का 60 गुना ।


अतिरिक्त भूमि के अधिग्रहण के लिए राशि का निर्धारण-

 
राजस्थान कृषि जोतों पर अधिकतम सीमा अधिरोपण अधिनियम 1973 की धारा 16 के अधीन 1.1.73 के बाद राज्य सरकार को सौपी गई अतिरिक्त भूमि के अधिग्रहण के लिए प्राधिकृत अधिकारी द्वारा भुगतान किए जाने वाली राशि का निर्धारण निम्न प्रकार से किया जाएगा :-


(1) प्रथम 7.5 एकड़ अधिशेष भूमि के लिए
  • (क) नहरी - रुपये 1600 प्रति एकड़
  • (ख) चाही -रुपये  1000 प्रति एकड़
  • (ग) शुष्क भूमि (बारानी)
(i) अनुसूची में उल्लिखित उपजाऊ क्षेत्र रूपये 500 प्रति एकड़
(ii) अर्द्ध उपजाऊ क्षेत्र - रुपये  300 प्रति एकड़
(iii) पर्वतीय क्षेत्र - रुपये 300 प्रति एकड़
(iv) अर्द्ध मरू क्षेत्र - रुपये  100 प्रति एकड़
(v) मरू क्षेत्र - रुपये 75 प्रति एकड़
(2) अगली 7.5 एकड़ अतिरिक्त भूमि के लिए
(क) नहरी - रुपये 1400 प्रति एकड़
(ख) चाही - रुपये 880 प्रति एकड़
(ग) शुष्क भूमि (बारानी)

  • (i) उपजाऊ क्षेत्र - रूपये 400 प्रति एकड़
  • (ii) अर्द्ध उपजाऊ क्षेत्र- रुपये 260 प्रति एकड़
  • (iii) पर्वतीय क्षेत्र  - रुपये 260 प्रति एकड़
  • (iv) अर्द्ध मरू क्षेत्र - रुपये 88 प्रति एकड़
  • (v) मरू क्षेत्र - रुपये 65 प्रति एकड़
(3) बाकी की अतिरिक्त भूमि के लिए
(क) नहरी - रुपये 1280 प्रति एकड़
(ख) चाही - रुपये 880 प्रति एकड़
(ग) शुष्क भूमि (बारानी)
(i) उपजाऊ क्षेत्र - रूपये 400 प्रति एकड़
(ii) अर्द्ध उपजाऊ क्षेत्र - रुपये 240 प्रति एकड़
(iii) पर्वतीय क्षेत्र - रुपये 240 प्रति एकड़
(iv) अर्द्ध मरू क्षेत्र - रुपये 80 प्रति एकड़
(v) मरू क्षेत्र - रुपये 60 प्रति एकड़
(प्राधिकार- राजस्थान सरकार का गजट वर्ष 1981)
  • राजस्थान कृषि जोतों पर अधिकतम सीमा का अधिरोपण नियमावली 1973 के अधीन आवंटितियों को आवंटित भूमि कर मूल्य उस दर से चुकाना होता है, जिस दर से सरकार ने उस भूमि के अधिग्रहण के लिए संबंधित व्यक्तियों को राशि चुकायी थी।
आवंटित भूमि का मूल्य निम्नलिखित तरीके से अदा किया जाना हैः-
(क) यदि भूमि का मूल्य 500 रुपये या उससे कम है -     एकमुश्त
(ख) यदि भूमि का मूल्य 500 रुपये से अधिक किन्तु 5000 रुपये से अधिक नहीं है  -  पांच समान वार्षिक किश्तों में
(ग) यदि भूमि का मूल्य 5000 रुपये से अधिक है  - दस समान वार्षिक
किश्तों  में 

  • उक्त नियम के अधीन मूल्य किश्तों में चुकाए जाने की स्थिति में आवंटन की तारीख से पूरी राशि अदा किये जाने की तारीख तक मूल्य पर ढ़ाई प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज लगता है।
    नियत तारीख तक सारी राशि वसूल न होने पर आवंटिती से बकाया राशि की वसूली, भू-राजस्व के बकाया के रूप में की जाती है।

कुओं और स्थायी संरचनाओं का मूल्य - 

भूमि पर यदि कोई कुआं या स्थानीय संरचना हो तो आवंटिती को उसका और साथ ही भूमि पर उगे हुए वृक्षों का मूल्य उन दरों पर अदा करना होगा जो इस संबंध में अधिनियम की धारा 80 और 81 में निर्धारित की गई है।
टिप्पणी - 1 
राजस्थान कृषि जोतों पर अधिकतम सीमा अधिरोपण अधिनियम 1973 के नियम 18 के उपनियम (1) में सन्निविष्ट नये परन्तुक के अनुसार उपनिवेशन क्षेत्र जैसाकि राजस्थान उपनिवेशन अधिनियम 1954 परिभाषित है, में भूमि के आवंटिती को आवंटित भूमि की वह रकम देनी होगी जो कि कालोनी क्षेत्र की विभिन्न प्रकार की भूमि के लिए आरक्षित कीमत के रूप में निश्चित है।
(प्राधिकार - राजस्व ग्रुप- IV विभाग अधिसूचना संख्या एफ 7(15)रेवे/ग्रुप IV/ 78 दिनांक 1.5. 78)
टिप्पणी-2 
जो व्यक्ति अपने पर लागू होने वाली उच्चतम सीमा से अधिक भूमि पर कब्जा रखता है उसको अतिक्रमी समझा जायेगा और उसे इस अतिरिक्त भूमि से बेदखल किया जा सकेगा। धारा 30 ई उप धारा (4) की व्यवस्था के अनुसार की गई विधिक कल्पना के आधार पर भूमि धाकर उस अतिरिक्त भूमि के संबंध मे अतिक्रामी बन जाता है यद्यपि उक्त धारा की उपधारा (3) के प्रावधान के अनुसार भूमि का स्वामित्व राज्य सरकार को हस्तान्तरित नहीं किया गया है और ऐसे व्यक्ति को उसी दिन से अतिक्रमी माना जायेगा जबसे वह उच्चतम सीमा से अतिरिक्त भूमि पर अनाधिकृत कब्जा बनाये रखा है और जिसको विधि द्वारा विहित अवधि मे राज्य सरकार को भूमि नहीं सौपी है। 
परिणामतः काश्तकारी अधिनियम की धारा 30 ई की उपधारा (4) के अधीन उस पर शास्ति अधिरोपित की जा सकती है और तदनुरूपी मांग का सृजन कर ऐसे दोषी भूमि धारकों से उन मामलों के अलावा जिनमें अपील करने पर निचले न्यायालय के शास्ति आदेश उच्च न्यायालय ने बदल दिये हों, वसूल की जा सकती है।
(प्राधिकार - राजस्थान के समस्त जिलाधीशों को प्रेषित राजस्व ग्रुप II विभाग पत्र संख्या एफ 8(216) राजस्व/ग्रुप-
II/75 दिनांक 9.4.81 )

काश्तकार का वृक्षरोपण का अधिकार:- 

काश्तकार अपनी जोत में वृक्ष लगा सकता है बशर्ते कि उससे भूमि की उपजाऊ शक्ति में कमी न आती हो और काश्तकार अपनी जोत का पूरा लगान देता रहे। दखल की हुई या न की हुई भूमि पर लगा हुआ कोई भी वृक्ष निम्नलिखित परिस्थितियों को छोड़ कर अन्य स्थिति में काटा नहीं जा सकता।

(1) अधिकतम सीमा से कम जोत वाला काश्तकार अपनी इच्छा से भूमि पर लगे वृक्ष किसी प्रयोजन के लिए काट सकता है।
(2) गैर-खातेदार काश्तकार तहसीलदार की पूर्व अनुमति से अपनी जोत में लगे हुए वृक्षों को घरेलू या कृषि उपयोग के लिए काट सकता है।
(3) उप-काश्तकार उस व्यक्ति की पूर्व अनुमति से जिससे उसने भूमि प्राप्त की है अपनी जोत में लगे हुए वृक्षों को घरेलू या कृषि उपयागे के लिए काट सकता है ।
(4) खातेदार काश्तकार, जिसके पास अधिकतम सीमा से अधिक
भूमि है यदि ऐसे वृक्षों को काटना चाहता है जिस पर उसका अधिकार है या जो उसकी सम्पत्ति हैं या जो उसके कब्जे में हैं, तो वह उपखण्ड अधिकारी द्वारा दिये जाने वाले लाइसेंस के अधीन ऐसा कर सकता है।

यदि कोई व्यक्ति उक्त उपबंधों का उल्लंघन करता है, तो उसे निम्नलिखित दण्ड दिया जा सकता है:-

(क) यदि कोई वृक्ष काटे गए हैं। तो प्रथम उल्लंघन के मामले में काटे गए प्रत्येक वृक्ष के लिए जुर्माना एक सौ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है, अन्य मामले में एक सौ रुपये तक का जुर्माना।
(ख) दूसरी बार या बाद में किए गए उल्लंघन के मामले में जुर्माना जो उपर्युक्त (क) के अधीन किए जा सकने वाले जुर्माने से दुगना हो सकता है और जो वृक्ष या लकड़ी काटी गई है उसे राज्य सरकार जब्त कर सकती है।


लगान का निर्धारण और संशोधन:- 


प्रत्येक काश्तकार को अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार लगान देना होता है। राज्य सरकार से सीधे भूमि प्राप्त करने वाले काश्तकार से वसूली योग्य नकद लगान की अधिकतम राशि निम्नलिखित से अधिक नहीं होनी चाहिए:-
(क) यदि उस भूमि का लगान तय हो चुका है तो पिछले भू- प्रबन्ध में उसके लिए स्वीकृत लगान दर और
(ख) यदि उस भूमि का लगान तय नहीं हुआ है तो पिछले भू- प्रबन्ध में आस-पास के इलाके में उसी प्रकार की भूमि के लिए स्वीकृत लगान दर


जोत के लगान का परिकलन साधारणतया उस इलाके के लिए निर्धारित और स्वीकृत लगान दरों के अनुसार किया जाता है जिस इलाके में वह जोत स्थित है।
काश्तकार का लगान केवल निम्नलिखित प्रकार से बढ़ाया या कम किया जा सकता हैः-
(क) पंजीकृत करार द्वारा, एवं
(ख) किसी वाद में सक्षम राजस्व न्यायालय द्वारा जारी की गई डिक्री या आदेश द्वारा अथवा राज्य सरकार से सीधे प्राप्त की गई भूमि के मामले में काश्तकार के आवेदन पर या तहसीलदार की रिपोर्ट पर।



लगान बढ़ाए जाने के आधार:-


काश्तकार के लगान निम्नलिखित में से एक या अधिक आधारों पर बढ़ाया जा सकता है यथा:-
(i) काश्तकार द्वारा देय लगान उस पर लागू होने वाली उचित स्वीकृत लगान दरों के अनुसार परिकलित लगान से बहुत कम है अथवा
(ii) काश्तकार की भूमि की उत्पादक शक्तियां नदी क्रिया से बढ़ गई हैं अथवा
(iii) काश्तकार की भूमि की उत्पादन शक्तियों में भूमिधारी द्वारा या उसके खर्च पर हुए सुधारों से वृद्धि हुई है अथवा
(iv) काश्तकार की जोत का क्षेत्र बाढ़ या किसी अन्य कारण से बढ़ गया है।


काश्तकार के लगान में उसके वर्तमान लगान के एक चौथाई से अधिक की राशि की वृद्धि नहीं की जा सकती है बशर्ते कि नियत किया गया लगान उस पर लागू होने वाली लगान दर से परिकलित किये गए लगान के तीन चौथाई से कदापि कम हो।
यदि काश्तकार जिससे लगान की वृद्धि का दावा किया गया है यह सिद्ध कर दे कि जिस वृद्धि का दावा किया गया है वह पूर्णतः या अंशतः उन सुधारों के कारण हुई है, जो उसने पिछले बीस वर्षों में किए है और जिन्हें करने का उसे हक था, तो केवल न्यायालय ही वृद्धि का ऐसा आदेश जारी करेगा जैसा कि काश्तकार द्वारा कोई सुधार न किए जाने की स्थिति में वह करता। 



कृषि आपदाओं के दौरान लगान की छूट या स्थगन:-

किसी क्षेत्र में अकाल या अभाव की स्थिति में या फसलों को प्रभावित करने वाली कृषि आपदाओं के आने पर राज्य सरकार या उसकी ओर से प्राधिकृत कोई प्राधिकारी उस क्षेत्र में काश्तकार द्वारा देय लगान में राज्य सरकार द्वारा उस संबंध में बनाए गए नियमों के अनुसार किसी अवधि के लिए पूरी या आंशिक छूट दे सकता है या उसे स्थगित कर सकता है।


लगान की अदायगी और वसूली:- 


जोत की पैदावार जोत पर देय लगान के लिए बंधक मानी जाती है। जब तक लगान चुकता न कर दिया जाए उस पैदावार पर किसी सिविल या राजस्व न्यायालय की डिक्री के निष्पादन में बिक्री द्वारा या अन्य प्रकार से कोई दावा लागू नहीं किया जा सकता।

काश्तकार द्वारा मुद्रा लगान की अदायगी भूमिधारी को सीधे या पोस्टल मनीआर्डर से या तहसील में जमा कराके की जा सकती है।

निर्धारित तारीख को या उसके पहले जमा न कराई गई लगान की किश्त उस निर्धारित तारीख के अगले दिन से बकाया हो जाती है जिस पर काश्तकार को 6.25 प्रतिशत वार्षिक दर से साधारण ब्याज देना पडता है। राजस्व या लगान की बकाया राशि की वसूली जिसके लिए मांग रिट भेजी गई है, राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 229 क के अधीन कलक्टर के आदेश से अधिकतम तीन वर्षाें में किश्तों में की जाएगी।



बकाया लगान के लिए बेदखली:- 


जब कभी काश्तकार से दो वर्ष या अधिक अवधि तक लगान की राशि बकाया हो जाए तो तहसीलदार यदि भूमि सीधे राज्य सरकार से ली गई हो, स्वःप्रेरणा से और अन्य मामलों में भूमिधारी के आवेदन पर काश्तकार को यह नोटिस भेजेगा कि वह नोटिस की तामील के 30 दिन के भीतर या तो बकाया राशि चुका दे या स्वयं उपस्थित होकर देनदारी कबूल करे या उसका प्रतिवाद करे। नोटिस में यह भी लिखा जाता है कि बकाया राशि की अदायगी न करने पर उसे बेदखल किया जा सकेगा। यदि काश्तकार उपस्थित नहीं होता है या उपस्थित होता है और देनदारी कबुल करता है तो तहसीलदार बकाया राशि चुकाने का आदेश देगा। यदि काश्तकार बकाया राशि नहीं चुकाता है तो यथास्थिति तहसीलदार या डिक्री देने वाला न्यायालय काश्तकार को सारी जोत से या उसके भाग से बेदखल करने के आदेश देगा और काश्तकार को तदनुसार बेदखल कर दिया जाएगा।


गैर-कानूनी अन्तरण या शिकमी देने पर बेदखली:- 

यदि कोई काश्तकार अपनी पूरी जोत या उसके किसी भाग की अधिनियम की व्यवस्थाओं के प्रतिकूल अन्तरित कर देता है या शिकमी देता है और अंतरिती या शिकमी पट्टेदार अन्तरण या शिकमी के अनुसार उस भूमि पर या उसके भाग में दाखिल होता है या कब्जा ले लेता है तो काश्तकार और इस तरह से पूरी जोत या उसके भाग पर कब्जा ले चुकने वाले या लेने वाले व्यक्ति को, भूमिधारी के आवेदन पर अन्तरित या शिकमी दी गई भूमि से बेदखल किया जा सकेगा।


हानिकारक कार्य करने या शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में बेदखली:- 

काश्तकार को निम्नलिखित कारणों से जोत से बेदखल किया जा सकता है:-

(क) जोत की भूमि के लिए हानिकारक या जोत जिस प्रयोजन के लिए दी गई थी उसके प्रतिकूल कोई कार्य करने पर अथवा,
(ख) उसके द्वारा अथवा उसने जिसे भूमि दी है उसके द्वारा किसी ऐसी शर्त का उल्लंघन किये जाने पर जिसके लिए उसे बेदखल किया जा सकता है।

वृक्ष लगाना या अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार सुधार करना बेदखली का आधार नहीं है।


खुदकाश्त या गैर खातेदार काश्तकारों या उप काश्तकारों की बेदखली - 


खुदकाश्त या गैर खातेदार काश्तकार या उपकाश्तकार को आवेदन किये जाने पर इस आधार पर बेदखल किया जा सकता है कि उनके पास जितनी भूमि है वह राज्य सरकार द्वारा उस जिले या जिले के उस भाग के लिए जिसमें वह भूमि स्थित है, निर्धारित भूमि की न्यूनतम सीमा से अधिक है, और जिस अतिरिक्त भूमि से बेदखल करने के लिए आवेदन किया गया है उसकी भूमिधारी को अपनी निजी खेती के लिए आवश्यकता है।


किन्हीं अतिचारियों की बेदखली -

यदि किसी अतिचारी ने कानूनी प्राधिकार के बिना किसी भूमि पर कब्जा ले लिया है या कब्जा बनाया हुआ है। उसे उस व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा कब्जे का दावा किये जाने पर जिसे या जिन्हें उसे काश्तकारी से बेदखल का अधिकार है, बेदखल किया जा सकता है और उसे उस प्रत्येक कृषि वर्ष या उसके किसी भाग के लिए जिसके दौरान भूमि पर उसका कब्जा था जुर्माना देना पड़ सकता है जिसकी राशि वार्षिक लगान की राशि के पचास गुने तक (14.8.1975 तक पन्द्रह गुना) हो सकती है।
यदि भूमि सीधे राज्य सरकार से ली गई हो या जहां राज्य सरकार तहसीलदार के माध्यम से कार्य करते हुए अतिचारी व्यक्ति को काश्तकार के रूप में स्वीकार करने के लिए प्राधिकृत हो तो तहसील द्वारा राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 91 की व्यवस्थाओं के अनुसार कार्यवाही की जाएगी ।



बकाया मांग बेदखली पर पूरी हो जाती है:- 


लगान की अदायगी न करने पर बेदखली की डिक्री या आदेश के निष्पादन में जब किसी खातेदार, काश्तकार को उसकी जाते से या उसके किसी भाग से बेदखल किया जाता है, तो कब्जे की सुपुर्दगी की तारीख को उस जोत के लिए देय सारा बकाया लगान चुकता मान लिया जाता है। काश्तकार की बेदखली होने पर काश्तकार यदि भूमि पर किए गए सुधारों की क्षतिपूर्ति का दावा करे और वह दावा स्वीकार हो तो सुधारों के मूल्य का निर्धारण किया जाएगा और निर्धारित की गई क्षतिपूर्ति की राशि लगान के रूप में वसूली योग्य राशि से अधिक है तो बेदखली का आदेश इस शर्त के साथ होगा कि काश्तकार को देय बकाया राशि की अदायगी यथा निर्धारित अवधि में कर दी जाए।

भूमि (भू-प्रबन्ध) से पूर्व सिंचाई योग्य भूमि के निर्धारण में बढ़ोतरी -


नई धारा 177 ए को सन्निविष्ट करके राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 को संशोधित किया गया है। इस धारा के प्रावधानो के अनुसार नहरों द्वारा सिंचाई की गई भूमि के निर्धारण की दरे बढ़ा दी गई है।





1 टिप्पणियाँ:

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