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Main breeds of Indian horses - भारतीय अश्वों की मुख्य नस्लें

1. मारवाड़ी (मालानी) घोड़े -


मारवाड़ी घोड़े का इस्तेमाल राजाओं के ज़माने में युद्ध के लिए किया जाता था। इसलिए कहा जाता है कि इन घोड़ों के शरीर में राजघराने का लहू दौड़ता है। मालानी नस्ल के घोड़े अपनी श्रेष्ठ गुणवता के कारण देश-विदेश मे पहचान बना चुके हैं और इनकी खरीद-फरोख्त के लिए लोग बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा मेले में पहुँचते है। पोलो एवं रेसकोर्स के लिए इन घोड़ों की माँग लगातार बढ़ रही है। दौड़ते समय मालानी नस्ल के घोड़े के पिछले पैर, अपने पैरों की तुलना में, अधिक गतिशील होने के कारण अगले पैरों से टक्कर मारते हैं, जो इसकी चाल की खास पहचान है। इनके ऊँचे कान आपस में टकराने पर इनका आकर्षण बढ़ जाता हैं और ये घोड़े कानों के दोनों सिरों से सिक्का तक पकड़ लेते हैं। चाल व गति में बेमिसाल इन घोड़ों की सुन्दरता, ऊँचा कद, मजबूत कद-काठी देखते ही बनती हैं। राजस्थान में घोड़े जोधपुर, बाड़मेर, झालावाड़, राजसमन्द, उदयपुर, पाली एवं उदयपुर आदि स्थानों में पाये जाते है।

जन्म स्थान :  

इस नस्ल के घोड़ों का जन्म स्थल राजस्थान का मारवाड़ क्षेत्र माना जाता है।


पहचान :


  • मारवाड़ी अश्वों के कान बड़े तथा चेहरा लम्बा, नाक के ऊपर का भाग थोड़ा उभरा हुआ या फिर चपटा होता है।
  • इस नस्ल के अश्व प्रायः चुस्त, सुन्दर व शांत प्रकृति के होते हैं और अपनी तेज चाल और मजबूती के लिए प्रसिद्ध हैं और शरीर भार लगभग 360 किलोग्राम होता है। इनकी ऊँचाई लगभग 14-15 मुट्ठी (1.40-1.50 मीटर) के लगभग होती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में ये अश्व अल्प आहार पर निर्वाह कर जीवित रह सकते हैं।
  • इनकी पैस्टर्न काठियावाड़ी घोड़ों की अपेक्षा लम्बी होती है।

    उपयोग :

    इनका प्रयोग खेलों, घुड़दौड़, सफारी, घुड़सवारी व अन्य कार्यों में किया जाता है।


    2. काठियावाड़ी़ घोड़े -


    जन्म स्थान :

    इस नस्ल के घोडे़ प्रायः पूरे भारत में पाए जाते हैं परन्तु इनका मुख्य स्थान गुजरात का काठियावाड़ क्षेत्र रहा है।


    पहचान :


    • इस नस्ल का उदय देशी मादा टट्टू व अरबी अश्व के पारस्परिक प्रजनन से माना जाता है।
    • कानों के अग्रभाग का नुकीला होना, अन्दर की तरफ मुड़ने पर आपस में मिलना तथा 360 डिग्री तक घूमना तथा पिछली टांगों के घुटनों के जोड़ों का हंसिया की तरह मुड़ा होना काठियावाड़ी घोड़ों की प्रमुख पहचाना है।
    • मारवाड़ी घोड़ों के मुकाबले में काठियावाड़ी घोड़ों का चेहरा चौड़ा, जबड़े की हड्डी का 900 के कोण पर मुडा होना, नाक के ऊपर हल्का सा गडा तथा कानों के बीच का भाग (पोल) संकरा होता है।
    • इसके अतिरिक्त इस नस्ल के अश्वों का माथा, छाती, खुर, पीठ तथा नाक के छिद्र चौड़े होते हैं।
    • इनकी ऊँचाई लगभग 13-15 मुट्ठी (1.30-50 मीटर) और वक्ष परिधि 1.37-1.52 मीटर पाई जाती है।

      उपयोग :


      इनका उपयोग मुख्यतः घुडसवारी, घुड़दौड़, खेलों, सुरक्षा व सफारी में होता है।


      3. मणिपुरी घोड़े-


      जन्म स्थान :

      इस नस्ल के घोड़े मणिपुर एवं आसाम प्रदेश में पाए जाते हैं।


      पहचान :


      • इस नस्ल के घोड़े यद्यपि आकार में छोटे होते हैं, लेकिन इनका शरीर उचित अनुपात में गठा होता है।
      • इनकी ऊँचाई लगभग 11-13 मुट्ठी (1.10-1.30 मीटर) आंकी गई है और शरीर भार लगभग 300 किलोग्राम पाया जाता है।
      • इन घोड़ों का चेहरा लम्बा होता है और देखने में मणिपुरी घोड़े भले व सावधान (जागरूक) लगते हैं।
      • इनकी नाक का अग्रभाग (मजल) थोड़ा चौड़ा होता है, व नाक फूली हुई होती है। मणिपुरी घोडे़ सुन्दरता व गति के लिए प्रसिद्ध हैं।

        उपयोग :

        मणिपुरी अश्वों का उपयोग यातायात, सामान ढुलाई, सवारी तथा पोलो के खेल के लिए उत्तम माने जाते हैं।


        4. जांसकारी घोड़े -

        जन्म स्थान :

        भारत में इस नस्ल के टट्टू लेह-लदाख क्षेत्र में पाये जाते हैं।


        पहचान :


        • शुद्ध जांसकारी घोड़ा भूरा-श्वेत होता है।
        • इसकी पूंछ लम्बी होती है जो लगभग जमीन तक पहुंचती है।
        • ये घोड़े चैतन्य दिखते हैं और इनकी ऊँचाई 1.20-1.40 मीटर होती है।
        • इस नस्ल के अश्वों का शरीर गठा हुआ, मस्तक चौड़ा तथा काठी मजबूत होती है।

          उपयोग : 

          इनका उपयोग पहाड़ी क्षेत्रों में यातायात, सामान की ढुलाई, सवारी तथा पोलों खेलने में किया जाता है।


          5. भूटिया घोड़े -


          जन्म स्थान :

          इस नस्ल के टट्टू भारत में हिमालय पर्वत के निचले क्षेत्रों तथा भूटान में पाए जाते हैं।


          पहचान :


          • ये अश्व प्रायः भूरे, बादामी व चितकबरे रंग के होते हैं।
          • गठी देह, चैड़ा माथा,छोटी व मोटी गर्दन, चौड़ा वक्ष, सीधे कंधे, बलिष्ठ कमर, उत्तम पसलीदार उदर, गोल मांसल पुट्ठे, स्थूल टांगे, बालदार लम्बी पूंछ तथा गर्दन पर लम्बे बाल आदि इनकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
          • इनकी ऊँचाई लगभग 13.0-13.2 मुट्ठी (1.30-1.32 मीटर) और शरीर भार 275-360 किलोग्राम तक होता है।

            उपयोग :  

            पहाड़ी क्षेत्रों में इनकी संख्या अधिक होती है। जहां ये मुख्यतया सवारी करने तथा बोझा ढोने के काम आते हैं।


            6. स्पीति घोड़े -


            जन्म स्थान :

            ये टट्टू हिमाचल प्रदेश कें स्पीति घाटी में पाए जाते हैं।


            पहचान :


            • इस नस्ल के घोडे़ कद में छोटे होने के कारण टट्टू की श्रेणी में आते हैं।
            • इनकी ऊँचाई लगभग 12 मुट्ठी (1.20 मीटर) तथा शारीरिक संरचना मजबूत होती है।
            • इनकी देह सुविकसित, हड्डियां मजबूत व टांगों पर लम्बे बाल होते हैं जो इन्हें ठंड से बचाते हैं। इनका रंग गहरा स्लेटी, काला व लाल भूरा होता है। क्रीम रंग भी यदाकदा पाया जाता है।
            • स्पीति नस्ल के घोड़े ठंडे भागों में रहने में सक्षम है तथा प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे चारे की कमी व लम्बी यात्रा को भी सह सकते हैं।

              उपयोग :

              इनमें विशेष सहिष्णुता होती है तथा जल्दी से फिसलते नहीं हैं जिस कारण पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्रों में आसानी से चलने और बोझा ढोने के काम के लिए उत्तम होते हैं।

               

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