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 राजस्थान का नमदा उद्योग -

नमदा मूल नाम ''नमता'' शब्द से आता है, जो एक संस्कृत शब्द है और इसका मतलब 'ऊनी चीजें' हैं। नमदा भेड़ की ऊन से बनता है। नमदा को ऊनी गलीचा या चटाई कहा जा सकता है। नमदे की लोकप्रियता का मुख्य कारण यह भी है कि यह गलीचे के मुकाबले अत्यंत सस्ता होता है। नमदों की उत्कृष्ट कलाकृतियों की थीम अद्वितीय विषयों से युक्त फूलों, पत्तियों, कलियों और फलों के विभिन्न पैटर्न पर आधारित होते हैं।
राजस्थान का टोंक शहर देश व विदेश में नमदों के शहर के रूप में विख्यात है। इसी कारण  टोंक को नमदो का शहर या नमदा नगरी भी कहा जा सकता है। गुणवत्ता के कारण टोंक के नमदे की मांग भारत में ही नहीं वरन विदेशों तक में है। ऐसा माना जाता है कि टोंक जिले के नमदा क्लस्टर में सामूहिक रूप से 500 से अधिक कारीगर और श्रमिक का निर्माण कार्य में संलग्न हैं। जिला उद्योग केंद्र, टोंक कार्यालय में नमदा आधारित शिल्प में नमदा निर्माण के लगभग 40 सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यम (एमएसएमई) पंजीकृत हैं, जिनमें से कुछ गैर कार्यात्मक को छोड़कर, शेष नमदा के सक्रिय विनिर्माण और व्यापार में शामिल हैं। टोंक शहर में वर्तमान में करीब 3000 से अधिक गरीब परिवारों को नमदे के कार्य से रोजगार मिल रहा है और उनकी आजीविका इसी के सहारे चल रही हैं।

नमदा निर्माण का इतिहास 

ईसा पूर्व 5 वीं शताब्दी में खानाबदोश सिथियन मूल के लोग ऊन के फेल्टेड तंबू में रहते थे, जैसा कि मध्य एशिया विशेष रूप से सिंकियांग में खानाबदोश कजाख जाति के लोग आज भी ऐसा करते हैंयह माना जाता है कि भारत में सबसे पहले नमदा 11 सदी में नबी नाम के एक व्यक्ति ने सम्राट अकबर के घोड़े की पहले ठंड से रक्षा के लिए ऊनी कपड़े से बनाया था। इसी कारण इस क्राफ्ट का नाम इसके प्रथम निर्माता नबी के नाम पर नमदा हो गया। नमदा बनाने का शिल्प राजस्थान मूल का नहीं है अपितु यह कला दूरदराज के ईरान या टर्की देश से आई है। मुगल राजाओं और राजपूत राजाओं द्वारा भेड़ की ऊन से नरम बनावट के वस्त्रों से लेकर नमदा बनाने की कला राज्य में प्रचारित की थी। नमदा बनाने का क्राफ्ट कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के कुछ बहुत सीमित क्षेत्रों में किया जाता है। 

नमदा निर्माण की विधि-

कच्चा माल -

1 . ऊन - 

नमदा भेड़ की ऊन से बनाया जाता है। नमदा भेड़ की ऊन से बनने वाली एक प्रकार की गलीचा या चटाई एवं अन्य सामग्री है। ऊन में कभी-कभी सूत भी मिलाया जाता है।

2 . नमदा साबुन -

यह सामान्य साबुन होता है जो नमदा को धोने तथा बंधनकारक पदार्थ (या बंधक एजेंट) के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

3 . रंग -

ऊन को रंगने के लिए संश्लेषित रंग या एसिड रंग प्रयुक्त किया जाता है।

4 . तेज़ाब (Acid )-

यह रंगाई की प्रक्रिया में प्रयुक्त किया जाता है।

5 . तिल्ली का तेल, अलसी का तेल, नमक, फिटकरी -

ये  रंगाई की प्रक्रिया में उपयोगी प्रमुख पदार्थ है।

6. लेई -

यह मैदे या अरारोट से बनाई जाती है जो नमदे में कट डिजाइन को चिपकाने के लिए आसंजक पदार्थ के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

औजार और उपकरण-

1.  धुन-

यह ऊन को साफ़ करने में काम में लिया जाता है। ऊन को साफ़ करने में प्रक्रिया को धुनना कहा जाता है। भेड़ की ऊन से बनने वाला नमदा कई प्रक्रियाओं से गुजरता है। नमदा बनाने के लिए भेड़ की ऊन को धुनकर, रगड़ कर पोलिश करके नर्म रोयेंदार बनाया जाता है।

2.  पिंजा

फूली हुई ऊन को समतल करने के लिए इसे काम में लिया जाता है।

3.  घुटाई मशीन 

4.  पिनाई मशीन

5 . बायलर 

6.  अन्य सामान - सींक झाड़ू , रॉड , पाइप या डंडी, केतली या लोठा , डब्बा, तराजू , कैंची , रस्सी, मौजा,  

नमदा निर्माण प्रक्रिया -

 1. छंटाई व धुलाई -

सर्वप्रथम ऊन को हाथ से साफ़ किया जाता है।  इसमें मशीनी प्रक्रिया द्वारा भी पिनाई की जाती है। फिर रंग एवं गुणवत्ता के आधार पर छांटा जाता है। अच्छी क्वालिटी की ऊन को कट आउट पैटर्न के डिजाइन बनाने के लिए तथा कम गुणवत्ता की ऊन को नमदा शीट्स या आधार बनाने के लिए काम में लिया जाता है। गुणवत्ता की परख स्पर्श करके, रेशे की शक्ति (fiber sttrength)  व रंग के आधार पर किया जाता है। फिर इसमें से अशुद्धियों को दूर करने के लिए केरोसिन से धोया जाता है। इस प्रक्रिया को धुलाई कहा जाता है।

2 . रंगाई  -

देगची में पानी लेकर उसमे चूल्हे पर गर्म किया जाता है तथा उसमें तेजाब, रंग,फिटकरी, नमक व तेल मिला कर ऊन की रंगाई की जाती है। इसमें आधे घंटे लगभग गर्म किया जाता है। इस हेतु आजकल बायलर का भी प्रयोग किया जाने लगा है।

3 . बिछाई  -

शिल्पकार सर्वप्रथम नमदे के आधार के रूप में एक खद्दर या मेट को बिछाता है तथा धुनाई की गयी उन को इस पर दो डंडों से फैलाया जाता है तथा पंजा नामक औजार से इसे एकसमान रूप से मेट पर बिछाया जाता है। फिर साबुन के गर्म पानी को केतली या लोटे से इस पर छिड़का जाता है। गीली ऊन को पाइप या डंडे पर लपेट लिया जाता है।

4 . घुटाई (Rolling & Felting भराई) -

इसके बाद रोलिंग की जाती है।  इसमें व्यवस्थित रूप से रोलिंग और अनरोलिंग करके ऊन की मेटिंग की जाती है। नमदा को उसके भौतिक फ्रेम में सेट करने के लिए रोलिंग की जाती है।

5 . साबन लगाना -

रोलिंग के बाद इस को खोल कर पुनः साबुन छिड़का जाता है तथा फिर सुखाया जाता है। इसे सूखने में 3 -4  दिन लग जाते हैं।

6 . साँचा बैठाना -

 शिल्पकार साधा नमदा से पट्टियां  काट देता हैं और मेट पर डिजाइन  वाली ग्रिड  डाल देता है। ग्रिड के रिक्त स्थान में रंगीन ऊन की फिलिंग कर देता है।

6 . साँचा भराई  -

कलाकार मेट के रिक्त स्थान में रंगीन ऊन की फिलिंग कर देता है।

7 . पुनः घुटाई व धुलाई  -

इसके बाद पुनः रोलिंग की जाती है। रोलिंग के बाद इस को खोल कर पुनः साबुन छिड़का जाता है तथा फिर सुखाया जाता है।
मुख्य रूप से रंगी हुई पतली शीट से उत्पाद की जरूरत के अनुसार आयत, वर्ग, गोल या अर्धवृत्ताकार आवश्यक बुनियादी आकार काटे जाते है। इन आकारों को लेआउट के अनुसार गोंद या स्थानीय रूप से बने चिपकने वाला पेस्ट लेई की सहायता नमदा पर रखकर चिपका देते है। फिर इन आकारों पर ध्यान से सिलाई करके दृढ कर देते हैं । नमदा पर सुरक्षात्मक बाहरी मोटा किनारा लगाया जाता है।

सारांश -

संक्षेप में नमदा बनाने के लिए भेड़ की ऊन को धुनकर, रगड़ कर पोलिश करके नर्म रोयेंदार बनाया जाता है। इस क्रिया में प्रयोग में लाई जाने वाली भेड़ की ऊन की पहले पिनाई व पोलिश की जाती हैं। बाद में इसे नमदों की शक्ल में बिछा कर उस पर केमिकल लगाकर मजदूरों द्वारा घुटाई की जाती है। इसके बाद उसे स्वच्छ पानी में धो कर सुखाया जाता है। सूखने के बाद इसे विभिन्न आकार में काट कर इन पर विभिन्न मनमोहक आकृतियों की डिजाइन की जाती है। बाद में उन आकृतियों को सिलाई के लिए दे दिया जाता है। अर्थात शीट तैयार होने के उपरांत ओपनर मशीन से बिंदाई की जाती है तथा कार्डिंग मशीन से मिलिंग की जाती है। इस कारण नमदा में कठोरता आ जाते हैं। तत्पश्चात पतले नमदा डिजाइनें काट काट कर उसकी नमदा की मोटी शीट पर सिलाई कर दी जाती है।
हस्तकला से बनाए जाने वाले यह नमदे पहले कम मात्रा में बनते थे तथा बाजार भी सीमित ही था। लेकिन अब ऐसा नहीं है बाजार भी पर्याप्त हैं तथा उत्पादन भी अधिक होने लगा है, क्योंकि पहले की पिनाई हाथों से होती थी, लेकिन अब मशीनों के जरिए पिनाई होने लगी हैं। आज मशीनों से घुटाई का काम किया जा रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप एक ही दिन में दर्जनों लोगों की शीट तैयार होने लगी है।

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