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हड़प्पा की सभ्यता या सिन्धु घाटी की सभ्यता -

सिन्धु घाटी सभ्यता का क्षेत्र संसार की सभी प्राचीन सभ्यताओं के क्षेत्र से अनेक गुना बड़ा और विशाल था। इस परिपक्व सभ्यता के केन्द्र-स्थल पंजाब तथा सिन्ध में था। तत्पश्चात इसका विस्तार दक्षिण और पूर्व की दिशा में हुआ। इस प्रकार हड़प्पा संस्कृति के अन्तर्गत पंजाब, सिन्ध और बलूचिस्तान के भाग ही नहीं, बल्कि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमान्त भाग भी थे। इसका फैलाव उत्तर में रहमानढेरी से लेकर दक्षिण में दैमाबाद (महाराष्ट्र) तक और पश्चिम में बलूचिस्तान के मकरान समुद्र तट के सुत्कागेनडोर से लेकर उत्तर पूर्व में मेरठ और कुरुक्षेत्र तक था। प्रारंभिक विस्तार जो प्राप्त था उसमें सम्पूर्ण क्षेत्र त्रिभुजाकार था (उत्तर में जम्मू के माण्डा से लेकर दक्षिण में गुजरात के भोगत्रार तक और पश्चिम में अफगानिस्तान के सुत्कागेनडोर से पूर्व में उत्तर प्रदेश के मेरठ तक था और इसका क्षेत्रफल 12,99,600 वर्ग किलोमीटर था।) इस तरह यह क्षेत्र आधुनिक पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया से भी बड़ा है।
ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी सहस्त्राब्दी में संसार भर में किसी भी सभ्यता का क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति से बड़ा नहीं था। अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस संस्कृति के कुल 1000 स्थलों का पता चल चुका है। इनमें से कुछ आरंभिक अवस्था के हैं तो कुछ परिपक्व अवस्था के और कुछ उत्तरवर्ती अवस्था के।

परिपक्व अवस्था के नगर-

परिपक्व अवस्था वाले कम जगह ही हैं। इनमें से आधे दर्जनों को ही नगर की संज्ञा दी जा सकती है। इनमें से दो नगर बहुत ही महत्वपूर्ण हैं -
1 . पंजाब का हड़प्पा तथा
2. सिन्ध का मोहनजोदड़ो (शाब्दिक अर्थ - प्रेतों का टीला)।
ये दोनों ही स्थल वर्तमान पाकिस्तान में हैं। दोनों एक दूसरे से 483 किमी दूर थे और सिंधु नदी द्वारा जुड़े हुए थे।
तीसरा नगर मोहनजोदड़ो से 130 किमी दक्षिण में चन्हुदड़ो स्थल पर था तो चौथा नगर गुजरात के खंभात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थल पर। इसके अतिरिक्त राजस्थान के उत्तरी भाग में कालीबंगा (शाब्दिक अर्थ -काले रंग की चूड़ियां) तथा हरियाणा के हिसार जिले का बनावली
इन सभी स्थलों पर परिपक्व तथा उन्नत हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुतकागेंडोर तथा सुरकोतड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति की परिपक्व अवस्था दिखाई देती है। इन दोनों की विशेषता है एक-एक नगर दुर्ग का होना। उत्तर हड़प्पा अवस्था गुजरात के कठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी स्थलों पर भी पाई गई है।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर -

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर तीन देशों में हैं -        1. अफगानिस्तान          2. भारत          3. पाकिस्तान

ये इस प्रकार है:-

अफगानिस्तान में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर --

1. शोर्तुगोई - यहाँ से नहरों के प्रमाण मिले है
2. मुन्दिगाक

भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर --

1. गुजरात में लोथल, सुरकोटदा, रंगपुर, रोजदी, मालवड, देसलपुर, धोलावीरा, प्रभाषपाटन, भगतराव
2. हरियाणा में राखीगढ़ी, भिर्दाना, बनावली, कुणाल, मीताथल
3. पंजाब में रोपड़ (पंजाब), बाड़ा संघोंल (जिला फतेहगढ़, पंजाब)
4. महाराष्ट्र में दायमाबाद धौलपुर, रावण उर्फ़ बड़ागांव, अम्बखेड़ी, हुलास
5. जम्मू कश्मीर में मांदा
6. राजस्थान में कालीबंगा, तरखनवाला डेरा

सिन्धु घाटी सभ्यता को हड़प्पा संस्कृति भी कहा जाता है। इसीलिए इसे कभी हड़प्पा सभ्यता और कभी 'सिंधु-सरस्वती सभ्यता' अथवा सैंधव सभ्यता के नाम से जाना जाता है। पुरातत्वविद ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग पुरावस्तुओं के ऐसे समूह के लिए करते हैं जो एक विशिष्ट शैली के होते हैं और सामान्यतया एक साथ, एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र तथा काल-खंड से संबंध पाए जाते हैं।
हड़प्पा सभ्यता के संदर्भ में इन विशिष्ट पुरावस्तुओं में मुहरें, मनके, बाट, पत्थर के फलक और पकी हुई ईंटें आदि सम्मिलित हैं। ये वस्तुएँ अफगानिस्तान, जम्मू, बलूचिस्तान (पाकिस्तानद्) तथा गुजरात जैसे क्षेत्रों से मिली हैं जो एक दूसरे से लंबी दूरी पर स्थित हैं।
इस सभ्यता का नामकरण, हड़प्पा नामक स्थान, जहाँ यह संस्कृति पहली बार खोजी गई थी, के नाम पर किया गया है। इसका काल निर्धारण लगभग 2600 और 1900 ईसा पूर्व के बीच किया गया है। इस क्षेत्र में इस सभ्यता से पहले जो सभ्यता अस्तित्व में थी उसे आरंभिक हड़प्पा सभ्यता कहते हैं जबकि इसके बाद में भी जो संस्कृतियाँ अस्तित्व में थीं उन्हें परवर्ती हड़प्पा सभ्यता कहा जाता है। इन संस्कृतियों से हड़प्पा सभ्यता को अलग करने के लिए कभी-कभी इसे "विकसित हड़प्पा संस्कृति" भी कहा जाता है।

हड़प्पाई मुहर-

हड़प्पाई मुहर संभवतः हड़प्पा अथवा सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे विशिष्ट पुरावस्तु है। सेलखड़ी नामक पत्थर से बनाई गई इन मुहरों पर सामान्य रूप से जानवरों के चित्र तथा एक ऐसी लिपि के चिह्न उत्कीर्णित हैं जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। फिर भी हमें इस क्षेत्र में उस समय बसे लोगों के जीवन के विषय में उनके द्वारा पीछे छोड़ी गई पुरावस्तुओं - जैसे उनके आवासों, मृदभाण्डों, आभूषणों, औजारों तथा मुहरों, दूसरे शब्दों में पुरातात्विक साक्ष्यों के माध्यम से बहुत जानकारी मिलती है, किन्तु कई जानकारियाँ अभी प्रकाश में आना शेष है। निश्चित रूप से इस सभ्यता के कई पहलू आज भी हमारी जानकारी से परे हैं और हो सकता है, हमेशा ही रहें।

सभ्यता का आरंभ

इस क्षेत्र में विकसित हड़प्पा से पहले भी कई संस्कृतियाँ अस्तित्व में थीं। ये संस्कृतियाँ अपनी विशिष्ट मृदभाण्ड शैली से संबंधित थीं तथा इनके संदर्भ में हमें कृषि, पशुपालन तथा कुछ शिल्पकारी के साक्ष्य भी मिलते हैं। बस्तियाँ आमतौर पर छोटी होती थीं और इनमें बड़े आकार की संरचनाएँ लगभग न के बराबर थीं। कुछ स्थलों पर बड़े पैमाने पर इलाकों में जलाए जाने के संकेतों से तथा कुछ अन्य स्थलों के त्याग दिए जाने से ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभिक हड़प्पा तथा हड़प्पा सभ्यता के बीच क्रम-भंग था।

निर्वाह के तरीके-

विकसित हड़प्पा संस्कृति कुछ ऐसे स्थानों पर पनपी जहाँ पहले आरंभिक हड़प्पा संस्कृतियाँ अस्तित्व में थीं। इन संस्कृतियों में कई तत्व जिनमें निर्वाह के तरीके शामिल हैं, समान थे। हड़प्पा सभ्यता के निवासी कई प्रकार के पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद और जानवरों जिनमें मछली भी शामिल है, से प्राप्त भोजन करते थे। जले अनाज के दानों तथा बीजों की खोज से पुरातत्वविद आहार संबंधी आदतों के विषय में जानकारी प्राप्त करने में सफल हो पाए हैं। इनका अध्ययन पुरा-वनस्पतिज्ञ करते हैं जो प्राचीन वनस्पति के अध्ययन के विशेषज्ञ होते हैं। हड़प्पा स्थलों से मिले अनाज के दानों में गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना तथा तिल शामिल हैं। बाजरे के दाने गुजरात के स्थलों से प्राप्त हुए थे। चावल के दाने अपेक्षाकृत कम पाए गए हैं। हड़प्पा के स्थलों से मिली जानवरों की अस्थियों में मवेशियों भेड़, बकरी, भैंस तथा सूअर की अस्थियाँ शामिल हैं।
पुरा-प्राणिविज्ञानियों अथवा जीव-पुरातत्वविदों द्वारा किए गए अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ये सभी जानवर पालतू थे। जंगली प्रजातियों जैसे सूअर, हिरण तथा घडिय़ाल की अस्थियाँ भी मिली हैं।
हम यह नहीं जान पाए हैं कि हड़प्पा-निवासी स्वयं इन जानवरों का शिकार करते थे अथवा अन्य आखेटक-समुदायों से इनका मांस प्राप्त करते थे। मछली तथा पक्षियों की अस्थियाँ भी मिली हैं।

हड़प्पा की कृषि प्रौद्योगिकी

हालाँकि यहां अनाज के दानों से कृषि के संकेत मिलते हैं पर वास्तविक कृषि विधियों के विषय में स्पष्ट जानकारी मिलना कठिन है। मुहरों पर किए गए रेखांकन तथा मृण्मूर्तियां यह इंगित करती हैं कि वृषभ के विषय में जानकारी थी और इस आधार पर पुरातत्वविद यह मानते हैं कि खेत जोतने के लिए बैलों का प्रयोग होता था। साथ ही चोलिस्तान के कई स्थलों और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी से बने हल के प्रतिरूप मिले हैं। इसके अतिरिक्त पुरातत्वविदों को कालीबंगा, राजस्थान नामक स्थान पर जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है जो आरंभिक हड़प्पा स्तरों से संबंध है। इस खेत में हल रेखाओं के दो समूह एक-दूसरे को समकोण पर काटते हुए विद्यमान थे, जो दर्शाते हैं कि एक साथ दो अलग-अलग फसलें उगाई जाती थीं।
पुरातत्वविदों ने फसलों की कटाई के लिए प्रयुक्त औजारों को पहचानने का प्रयास भी किया है। क्या हड़प्पा सभ्यता के लोग लकड़ी के हत्थों में बिठाए गए पत्थर के फलकों का प्रयोग करते थे या फिर वे धातु के औजारों का प्रयोग करते थे?
अधिकांश हड़प्पा स्थल अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में स्थित हैं जहाँ संभवतः कृषि के लिए सिंचाई की आवश्यकता पड़ती होगी। अफगानिस्तान में शोर्तुघई नामक हड़प्पा स्थल से नहरों के कुछ अवशेष मिले हैं, परंतु पंजाब और सिंध में नहीं। ऐसा संभव है कि प्राचीन नहरें बहुत पहले ही गाद से भर गई थीं। ऐसा भी हो सकता है कि कुओं से प्राप्त पानी का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाता हो। इसके अतिरिक्त गुजरात के धौलावीरा में मिले जलाशयों का प्रयोग संभवतः कृषि के लिए जल संचयन हेतु किया जाता था।
भोजन तैयार करने की प्रक्रिया में अनाज पीसने के यंत्र तथा उन्हें आपस में मिलाने, मिश्रण करने तथा पकाने के लिए बरतनों की आवश्यकता थी। इन सभी को पत्थर, धातु तथा मिट्टी से बनाया जाता था। यहाँ एक महत्वपूर्ण हड़प्पा स्थल मोहनजोदड़ो में हुए उत्खननों पर सबसे आरंभिक रिपोर्टां में से एक से कुछ उद्वरण दिए जा रहे हैं-
''अवतल चक्कियाँ ... बड़ी संख्या में मिली हैं ... और ऐसा प्रतीत होता है कि अनाज पीसने के लिए प्रयुक्त ये एकमात्र साधन थीं। साधारणतः ये चक्कियाँ स्थूलतः कठोर, कंकरीले, अग्निज अथवा बलुआ पत्थर से निर्मित थीं और आमतौर पर इनसे अत्यधिक प्रयोग के संकेत मिलते हैं। चूँकि इन चक्कियों के तल सामान्यतया उत्तल हैं, निश्चित रूप से इन्हें जमीन में अथवा मिट्टी में जमा कर रखा जाता होगा जिससे इन्हें हिलने से रोका जा सके। दो मुख्य प्रकार की चक्कियाँ मिली हैं। एक वे हैं जिन पर एक दूसरा छोटा पत्थर आगे-पीछे चलाया जाता था, जिससे निचला पत्थर खोखला हो गया था, तथा दूसरी वे हैं जिनका प्रयोग संभवतः केवल सालन या तरी बनाने के लिए जड़ी-बूटियों तथा मसालों को कूटने के लिए किया जाता था। इन दूसरे प्रकार के पत्थरों को हमारे श्रमिकों द्वारा ‘सालन पत्थर’ का नाम दिया गया है तथा हमारे बावर्ची ने एक यही पत्थर रसोई में प्रयोग के लिए संग्रहालय से उधार माँगा है।
अर्नेस्ट मैके, फर्दर एक्सकैवेशन्स एट मोहनजोदड़ो, 1937 से उधृत

मोहनजोदड़ो - एक नियोजित शहरी केंद्र

संभवतः हड़प्पा सभ्यता का सबसे अनूठा पहलू शहरी केन्द्रों का विकास था। ऐसा ही एक केंद्र, मोहनजोदड़ो था। मोहनजोदड़ों को ‘सिंध का बांग’ भी कहा जाता है। हालाँकि मोहनजोदड़ो सबसे प्रसिद्ध पुरास्थल है, लेकिन सबसे पहले खोजा गया स्थल हड़प्पा था।

मोहनजोदड़ो की बस्ती (दुर्ग और निचला शहर) -

यहाँ की बस्ती दो भागों में विभाजित है, एक छोटा लेकिन ऊँचाई पर बनाया गया भाग जबकि दूसरा कहीं अधिक बड़ा लेकिन नीचे बनाया गया भाग। पुरातत्वविदों ने इन्हें क्रमशः दुर्ग और निचला शहर का नाम दिया है। दुर्ग की ऊँचाई का कारण यह था कि यहाँ की संरचनाएँ कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बनी थीं। दुर्ग को दीवार से घेरा गया था जिसका अर्थ है कि इसे निचले शहर से अलग किया गया था।
निचला शहर भी दीवार से घेरा गया था। इसके अतिरिक्त कई भवनों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया था जो नींव का कार्य करते थे। अनुमान लगाया गया है कि यदि एक श्रमिक प्रतिदिन एक घनीय मीटर मिट्टी ढोता होगा, तो मात्र आधारों को बनाने के लिए ही चालीस लाख श्रम-दिवसों, अर्थात् बहुत बड़े पैमाने पर श्रम की आवश्यकता पड़ी होगी।
एक बार चबूतरों के यथास्थान बनने के बाद शहर का सारा भवन-निर्माण कार्य चबूतरों पर एक निश्चित क्षेत्र तक सीमित था। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि पहले बस्ती का नियोजन किया गया था और फिर उसके अनुसार कार्यान्वयन किया होगा। नियोजन के अन्य लक्षणों में ईंटें शामिल हैं जो भले ही धूप में सुखाकर अथवा भट्टी में पकाकर बनाई गई हों, एक निश्चित अनुपात की होती थीं, जहाँ लंबाई और चौड़ाई, ऊँचाई की क्रमशः चार गुनी और दोगुनी होती थी। इस प्रकार की ईंटें सभी हड़प्पा बस्तियों में प्रयोग में लाई गई थीं।
धौलावीरा तथा लोथल (गुजरात) जैसे स्थलों पर पूरी बस्ती किलेबंद थी तथा शहर के कई हिस्से भी दीवारों से घेर कर अलग किए गए थे। लोथल में दुर्ग दीवार से घिरा तो नहीं था पर कुछ ऊँचाई पर बनाया गया था।

नियोजित जल निकास प्रणाली के लिए नालों का निर्माण-

हड़प्पा नगरों की सबसे अनूठी विशिष्टताओं में से एक ''नियोजित जल निकास प्रणाली'' थी। निचले शहर के नक्शे को देखने पर हम यह पाते हैं कि सड़कों तथा गलियों को लगभग एक ‘ग्रिड’ पद्धति में बनाया गया था और ये एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि पहले नालियों के साथ गलियों को बनाया गया था और फिर उनके अगल-बगल आवासों का निर्माण किया गया था। यदि घरों के गंदे पानी को गलियों की नालियों से जोड़ना था तो प्रत्येक घर की कम से कम एक दीवार का गली से सटा होना आवश्यक था।

अब तक खोजी गई प्राचीनतम जल निकास प्रणाली-

नालियों के विषय में मैके लिखते हैं- ‘‘निश्चित रूप से यह अब तक खोजी गई सर्वथा संपूर्ण प्राचीन प्रणाली है।’’ हर आवास गली की नालियों से जोड़ा गया था। मुख्य नाले गारे में जमाई गई ईंटों से बने थे और इन्हें ऐसी ईंटों से ढका गया था जिन्हें सफाई के लिए हटाया जा सके। कुछ स्थानों पर ढकने के लिए चूना पत्थर की पट्टिका का प्रयोग किया गया था। घरों की नालियाँ पहले एक हौदी या मलकुंड में खाली होती थीं जिसमें ठोस पदार्थ जमा हो जाता था और गंदा पानी गली की नालियों में बह जाता था। बहुत लंबे नालों में कुछ अंतरालों पर सफाई के लिए हौदियाँ बनाई गई थीं।
जल निकास प्रणालियाँ केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं थीं बल्कि ये कई छोटी बस्तियों में भी मिली थीं। उदाहरण के लिए, लोथल में आवासों के निर्माण के लिए जहाँ कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ था, वहीं नालियाँ पकी ईंटों से बनाई गई थीं।

मोहनजोदड़ो का गृह स्थापत्य -

मोहनजोदड़ो का निचला शहर आवासीय भवनों के उदाहरण प्रस्तुत करता है। इनमें से कई घर एक आँगन पर केंद्रित थे जिसके चारों ओर कमरे बने थे। यह आँगन संभवतः खाना पकाने और कताई करने जैसी गतिविधियों का केंद्र था, जिसका उपयोग खास तौर से गर्म और शुष्क मौसम में किया जाता होगा। यहाँ का एक अन्य रोचक पहलू ये भी है कि लोगों द्वारा अपनी एकांतता को महत्त्व दिया जाता था, क्योंकि यहाँ भूमि तल पर बनी दीवारों में खिड़कियाँ नहीं हैं।
इसके अतिरिक्त घर ऐसा होता था कि इसके मुख्य द्वार से घर के आंतरिक भाग अथवा आँगन का सीधा अवलोकन नहीं होता है। प्रत्येक घर में ईंटों के फर्श से बना अपना एक स्नानघर होता था जिसकी नालियाँ दीवार के माध्यम से सड़क की नालियों से जुड़ी हुई थीं। कुछ घरों में दूसरे तल या छत पर जाने हेतु बनाई गई सीढ़ियों के अवशेष मिले थे। कई आवासों में कुएँ थे जो अधिकांशतः एक ऐसे कक्ष में बनाए गए थे जिसमें बाहर से आया जा सकता था और जिनका प्रयोग संभवतः राहगीरों द्वारा किया जाता था। विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि मोहनजोदड़ो में कुओं की कुल संख्या लगभग 700 थी।

मोहनजोदड़ो के दुर्ग अन्य संरचनाएं -

मोहनजोदड़ो के दुर्ग पर हमें ऐसी संरचनाओं के साक्ष्य मिलते हैं जिनका प्रयोग संभवतः विशिष्ट सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए किया जाता था। इनमें मालगोदाम और विशाल स्नानागार सम्मिलित हैं।

मोहनजोदड़ो का मालगोदाम -

मालगोदाम एक ऐसी विशाल संरचना है जिसके ईंटों से बने केवल निचले हिस्से शेष हैं, जबकि ऊपरी हिस्से जो संभवतः लकड़ी से बने थे, जो बहुत पहले ही नष्ट हो गए थे।

मोहनजोदड़ो का स्नानागार -

यहाँ पर प्राप्त विशाल स्नानागार आँगन में बना एक आयताकार जलाशय है जो चारों ओर से एक गलियारे से घिरा हुआ है। जलाशय के तल तक जाने के लिए इसके उत्तरी और दक्षिणी भाग में दो सीढ़ियाँ बनी थीं। जलाशय के किनारों पर ईंटों को जमाकर तथा जिप्सम के गारे के प्रयोग से इसे जलबद्ध किया गया था। इसके तीनों ओर कक्ष बने हुए थे जिनमें से एक में एक बड़ा कुआँ था। जलाशय से पानी एक बड़े नाले में बह जाता था। इसके उत्तर में एक गली के दूसरी ओर एक अपेक्षाकृत छोटी संरचना थी जिसमें आठ स्नानघर बनाए गए थे। एक गलियारे के दोनों ओर चार-चार स्नानघर बने थे। प्रत्येक स्नानघर से नालियाँ, गलियारे के साथ-साथ बने एक नाले में मिलती थीं। इस संरचना का अनोखापन तथा दुर्ग क्षेत्र में कई विशिष्ट संरचनाओं के साथ इनके मिलने से इस बात का स्पष्ट संकेत मिलता है कि इसका प्रयोग किसी प्रकार के विशेष आनुष्ठानिक स्नान के लिए किया जाता था।
             मोहनजोदड़ो का स्नानागार                                                          हड़प्पा का शवाधान                     एक नर्तकी

हड़प्पा में शवाधान -

हड़प्पा स्थलों से मिले शवाधानों में आमतौर पर मृतकों को गर्तों में दफनाया गया था। कभी-कभी शवाधान गर्त की बनावट एक-दूसरे से भिन्न होती थी, कुछ स्थानों पर गर्त की सतहों पर ईंटों की चिनाई की गई थी। कुछ कब्रों में मृदभाण्ड तथा आभूषण मिले हैं जो संभवतः एक ऐसी मान्यता की ओर संकेत करते हैं जिसके अनुसार इन वस्तुओं का मृत्योपरांत प्रयोग किया जा सकता था। पुरुषों और महिलाओं, दोनों के शवाधानों से आभूषण मिले हैं।
1980 के दशक के मध्य में हड़प्पा के कब्रिस्तान में हुए उत्खननों में एक पुरुष की खोपड़ी के समीप शंख के तीन छल्लों, एक प्रकार का उपरत्न जैस्पर के मनके तथा सैकड़ों की संख्या में सूक्ष्म मनकों से बना एक आभूषण मिला था। कहीं-कहीं पर मृतकों को ताँबे के दर्पणों के साथ दफनाया गया था। परंतु कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि हड़प्पा सभ्यता के निवासियों का मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफनाने में विश्वास नहीं था।

‘विलासिता’ की वस्तुओं की अनुपलब्धता -

सामाजिक भिन्नता को पहचानने की एक अन्य विधि है ऐसी पुरावस्तुओं का अध्ययन जिन्हें पुरातत्वविद मोटे तौर पर, उपयोगी तथा विलास की वस्तुओं में वर्गीकृत करते हैं। पहले वर्ग में रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन्हें पत्थर अथवा मिट्टी जैसे सामान्य पदार्थां से आसानी से बनाया जा सकता है। इनमें चक्कियाँ, मृदभाण्ड, सुइयाँ, झाँवा आदि शामिल हैं। ये वस्तुएँ सामान्य रूप से बस्तियों में सर्वत्र पाई गई हैं। पुरातत्वविद उन वस्तुओं को कीमती मानते हैं जो दुर्लभ हों अथवा मँहगी, स्थानीय स्तर पर अनुपलब्ध पदार्थां से अथवा जटिल तकनीकों से बनी हों। इस प्रकार फयॉन्स (घिसी हुई रेत अथवा बालू तथा रंग और चिपचिपे पदार्थ के मिश्रण को पका कर बनाया गया पदार्थ) के छोटे पात्र संभवतः कीमती माने जाते थे क्योंकि इन्हें बनाना कठिन था। यहाँ फयॉन्स जैसे दुर्लभ पदार्थ से बनी रोजमर्रा के प्रयोग की वस्तुएँ जैसे तकलियाँ भी मिलती हैं।
यदि हम ऐसी पुरावस्तुओं के वितरण का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि मँहगे पदार्थों से बनी दुर्लभ वस्तुएँ सामान्यतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में केंद्रित हैं और छोटी बस्तियों में ये विरले ही मिलती हैं। उदाहरण के लिए, फयॉन्स से बने लघुपात्र जो संभवतः सुगंधित द्रव्यों के पात्रों के रूप में प्रयुक्त होते थे, अधिकांशतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से मिले हैं और कालीबंगा जैसी छोटी बस्तियों से बिलकुल नहीं। सोना भी दुर्लभ तथा संभवतः आज की तरह कीमती था, हड़प्पा स्थलों से मिले सभी स्वर्णाभूषण संचयों से प्राप्त हुए थे।

 

शिल्प-उत्पादन -

सिन्धु घाटी सभ्यता की चहुँदडों नामक स्थान मोहनजोदड़ों की तुलना में एक बहुत छोटी बस्ती है लेकिन यह लगभग पूरी तरह से शिल्प-उत्पादन में संलग्न थी। शिल्प कार्यां में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण तथा बाट बनाना सम्मिलित थे।

मनकों का निर्माण -

मनकों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थां की विविधता उल्लेखनीय हैः कार्नीलियन (सुंदर लाल रंग का), जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज तथा सेलखड़ी जैसे पत्थर, ताँबा, काँसा तथा सोने जैसी धातुएँ तथा शंख, फयॉन्स और पकी मिट्टी का प्रयोग मनके बनाने में होता था। कुछ मनके दो या उससे अधिक पत्थरों को आपस में जोड़कर बनाए जाते थे और कुछ सोने के टोप वाले पत्थर के होते थे। इनके कई आकार होते थे जैसे- चक्राकार, बेलनाकार, गोलाकार, ढोलाकार तथा खंडित। कुछ को उत्कीर्णन या चित्रकारी के माध्यम से सजाया गया था और कुछ पर रेखाचित्र उकेरे गए थे।
मनके बनाने की तकनीकों में प्रयुक्त पदार्थ के अनुसार भिन्नताएँ थीं। सेलखड़ी जो एक बहुत मुलायम पत्थर है, इस पर आसानी से कार्य हो जाता था। कुछ मनके सेलखड़ी चूर्ण के लेप को साँचे में ढाल कर तैयार किए जाते थे। इससे ठोस पत्थरों से बनने वाले मनके केवल ज्यामितीय आकारों के विपरीत कई विविध आकारों के बनाए जा सकते थे। सेलखड़ी के सूक्ष्म मनके कैसे बनाए जाते थे, यह प्रश्न प्राचीन तकनीकों का अध्ययन करने वाले पुरातत्वविदों के लिए एक पहेली बना हुआ है। पुरातत्वविदों द्वारा किए गए प्रयोगों ने यह दर्शाया है कि कार्नीलियन का लाल रंग, पीले रंग के कच्चे माल तथा उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पका कर प्राप्त किया जाता था। पत्थर के पिंडों को पहले अपरिष्कृत आकारों में तोड़ा जाता था, और फिर बारीकी से शल्क निकाल कर इन्हें अंतिम रूप दिया जाता था। घिसाई, पॉलिश और इनमें छेद करने के साथ ही यह प्रक्रिया पूरी होती थी। चन्हुदड़ो, लोथल और हाल ही में धौलावीरा से छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं।
समुद्र-तट के समीप स्थित दोनों बस्तियाँ नागेश्वर तथा बालाकोट शंख से बनी वस्तुओं- चूड़ियाँ, करछियाँ तथा पच्चीकारी की वस्तुओं के निर्माण के विशिष्ट केंद्र थे, जहाँ से यह माल दूसरी बस्तियों तक ले जाया जाता था। यह भी संभव है कि चन्हुदड़ो और लोथल से तैयार माल (जैसे मनके) मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े शहरी केन्द्रों तक लाया जाता था।

उत्पादन केन्द्रों की पहचान-

शिल्प-उत्पादन के केन्द्रों की पहचान के लिए पुरातत्वविद सामान्यतः निम्नलिखित को ढूँढ़ते हैं- प्रस्तर-पिंड, पूरे शंख तथा ताँबा-अयस्क जैसा कच्चा माल, औजार, अपूर्ण वस्तुएँ, त्याग दिया गया माल तथा कूड़ा-करकट। यहाँ तक कि कूड़ा-करकट शिल्प कार्य के सबसे अच्छे संकेतकों में से एक हैं। उदाहरण के लिए, यदि वस्तुओं के निर्माण के लिए शंख अथवा पत्थर को काटा जाता था तो इन पदार्थां के टुकड़े कूड़े के रूप में उत्पादन के स्थान पर फेंक दिए जाते थे। कभी-कभी बड़े बेकार टुकड़ों को छोटे आकार की वस्तुएँ बनाने के लिए प्रयोग किया जाता था परंतु बहुत छोटे टुकड़ों को कार्यस्थल पर ही छोड़ दिया जाता था। ये टुकड़े इस ओर संकेत करते हैं कि छोटे, विशिष्ट केन्द्रों के अतिरिक्त मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा जैसे बड़े शहरों में भी शिल्प उत्पादन का कार्य किया जाता था।

माल प्राप्त करने संबंधी नीतियाँ-

यहाँ पर शिल्प उत्पादन के लिए कई प्रकार के कच्चे माल का प्रयोग होता था। हालाँकि कुछ, जैसे कि मिट्टी, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध थे, कुछ अन्य जैसे पत्थर, लकड़ी तथा धातु जलोढ़ मैदान से बाहर के क्षेत्रों से मँगाने पड़ते थे। मिट्टी से बने बैलगाड़ियों के खिलौनों के प्रतिरूप संकेत करते हैं कि यह सामान तथा लोगों के लिए स्थल मार्गां द्वारा परिवहन का एक महत्वपूर्ण साधन था। संभवतः सिन्धु तथा इसकी उपनदियों के बगल में बने नदी-मार्गां और साथ ही तटीय मार्गां का भी प्रयोग किया जाता था।

उपमहाद्वीप तथा उसके आगे से आने वाला माल-

हड़प्पावासी शिल्प-उत्पादन हेतु माल प्राप्त करने के लिए कई तरीके अपनाते थे। उन्होंने ऐसे स्थानों पर बस्तियां स्थापित की जहाँ माल आसानी से उपलब्ध हो जाए। जैसे उन्होंने नागेश्वर और बालाकोट में बस्तियाँ स्थापित की, जहाँ शंख आसानी से उपलब्ध था। ऐसे ही कुछ अन्य पुरास्थल थे- सुदूर अफगानिस्तान में शोर्तुघई, जो अत्यंत कीमती माने जाने वाले नीले रंग के पत्थर लाजवर्द मणि के सबसे अच्छे स्रोत के निकट स्थित था तथा लोथल नगर कार्नीलियन (गुजरात में भड़ूच), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात से) और धातु (राजस्थान से) के स्रोतों के निकट स्थित था।
कच्चे माल के लिए अभियान भेजने की नीति- 
यहाँ के लोग कच्चा माल प्राप्त करने के लिए कच्चा माल वाले क्षेत्रों में अपने अभियान भेजने की एक अन्य नीति  का प्रयोग करते थे, जैसे ताँबे के लिए राजस्थान के खेतड़ी अँचल में तथा सोने के लिए दक्षिण भारत में अभियान भेजना। इन अभियानों के माध्यम से स्थानीय समुदायों के साथ संपर्क स्थापित किया जाता था। इन इलाकों में यदा-कदा मिलने वाली हड़प्पाई पुरावस्तुएँ ऐसे संपर्को की संकेतक हैं। खेतड़ी क्षेत्र में मिले साक्ष्यों को पुरातत्वविदों ने गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का नाम दिया है। इस संस्कृति के विशिष्ट मृदभाण्ड हड़प्पाई मृदभाण्डों से भिन्न थे तथा यहाँ ताँबे की वस्तुओं की असाधारण संपदा मिली थी। ऐसा संभव है कि इस क्षेत्र के निवासी हड़प्पा सभ्यता के लोगों को ताँबा भेजते थे।

सुदूर क्षेत्रों से संपर्क-

हाल ही में हुई पुरातात्विक खोजें इंगित करती हैं कि ताँबा संभवतः अरब प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित ओमान से भी लाया जाता था। रासायनिक विश्लेषण दर्शाते हैं कि ओमानी ताँबे तथा हड़प्पाई पुरावस्तुओं दोनों में निकल के अंश मिले हैं जो दोनों के एक ही स्थान के होने की ओर संकेत करते हैं।
पुरातत्वविदों को सुदूर क्षेत्रों से संपर्क के और भी संकेत मिलते हैं। ओमानी स्थलों से भी एक बड़ा हड़प्पाई मर्तबान जिसके ऊपर काली मिट्टी की एक मोटी परत चढ़ाई गई थी, मिला है। ऐसी मोटी परतें तरल पदार्थों के रिसाव को रोक देती हैं। हमें यह नहीं पता कि इन पात्रों में क्या रखा जाता था पर यह संभव है कि हड़प्पा के लोग इनमें रखे सामान का ओमानी ताँबे से विनिमय करते थे।
तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में दिनांकित मेसोपोटामिया के लेखों में मगान जो संभवतः ओमान के लिए प्रयुक्त नाम था, नामक क्षेत्र से ताँबे के आगमन के संदर्भ मिलते हैं। यहाँ रोचक बात यह है कि मेसोपोटामिया के स्थलों से मिले ताँबे में भी निकल के अंश मिले हैं। लंबी दूरी के संपर्कों की ओर संकेत करने वाली अन्य पुरातात्विक खोजों में हड़प्पाई मुहरें, बाट, पासे तथा मनके शामिल हैं। इस संदर्भ में यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि मेसोपोटामिया के लेख में मेलुहा (संभवतः हड़प्पाई क्षेत्र के लिए प्रयुक्त शब्द) प्रयुक्त हुआ है जिससे हड़प्पा के मेसोपोटामिया से संपर्क की जानकारी मिलती है। यह लेख मेलुहा से प्राप्त निम्नलिखित उत्पादों का उल्लेख करते हैं: जैसे - कार्नीलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना तथा विविध प्रकार की लकड़ियाँ।

मुहरें और मुद्रांकन -

मुहरों और मुद्रांकनों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था। माना जाता है कि ये लोग सामान से भरा एक थैला एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए उसका मुँह रस्सी से बाँध कर उसकी गाँठ पर थोड़ी गीली मिट्टी जमा कर एक या अधिक मुहरों से दबाते होंगे, जिससे मिट्टी पर मुहरों की छाप पड़ जाती होंगी। यदि इस थैले के अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने तक मुद्रांकन अक्षुण्ण रहा तो इसका अर्थ था कि थैले के साथ किसी प्रकार की छेड़-छाड़ नहीं की गई थी। मुद्रांकन से भेजने वाले की पहचान का भी पता चलता था।

हड़प्पाई मुहरों की रहस्यमय लिपि -

सामान्यतः हड़प्पाई मुहरों पर एक पंक्ति में कुछ लिखा है जो संभवतः मालिक के नाम व पदवी को दर्शाता है। विद्वानों ने यह सुझाव भी दिया है कि इन पर बना चित्र (आमतौर पर एक जानवर) अनपढ़ लोगों को सांकेतिक रूप से इसका अर्थ बताता था। अधिकांश अभिलेख संक्षिप्त हैं। सबसे लंबे अभिलेख में लगभग 26 चिह्न हैं। हालाँकि यह लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है, पर निश्चित रूप से यह वर्णमालीय (जहाँ प्रत्येक चिह्न एक स्वर अथवा व्यंजन को दर्शाता है) नहीं थी क्योंकि इसमें चिह्नों की संख्या कहीं अधिक है, जो लगभग 375 से 400 के बीच है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह लिपि दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी क्योंकि कुछ मुहरों पर दाईं ओर चौड़ा अंतराल है और बाईं ओर यह संकुचित है जिससे लगता है कि उत्कीर्णक ने दाईं ओर से लिखना आरंभ किया और बाद में बाईं ओर स्थान कम पड़ गया।
विभिन्न प्रकार की वस्तुओं मुहरें, ताँबे के औजार, मर्तबानों के अँवठ, ताँबे तथा मिट्टी की लघुपट्टिकाएँ, आभूषण, अस्थि-छड़ें और यहाँ तक कि एक प्राचीन सूचना पट्ट पर भी लिखावट मिली है। हो सकता है कि नष्टप्राय वस्तुओं पर भी लिखा जाता हो।

बाट -

यहाँ की विनिमय क्रिया चर्ट नामक पत्थर से बनाए गए बाटों की एक सूक्ष्म या परिशुद्ध प्रणाली द्वारा नियंत्रित था। ये बाट सामान्यतः घनाकार और किसी भी तरह के निशान से रहित होते थे। इन बाटों के निचले मानदंड द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32 इत्यादि 12,800 तक) थे जबकि ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे। छोटे बाटों का प्रयोग संभवतः आभूषणों और मनकों को तौलने के लिए किया जाता था। धातु से बने तराजू के पलड़े भी मिले हैं।

शिव आकृति और शिव लिंग- 

सिन्धु घाटी सभ्यता में कुछ मुहरें प्राप्त हुई हैं जिनमें पालथी मार कर ‘योगी’ की मुद्रा में बैठी एक आकृति है   और जिसे कभी-कभी जानवरों से घिरा भी दर्शाया गया है, जिसको विद्वान हिन्दू धर्म के प्रमुख देव ‘आद्य शिव’ (शिव का एक का आरंभिक रूप) या ''पशुपति शिव'' (पशुओं के स्वामी) मानते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ पर लाजवर्द मणि, जैस्पर, चाल्सेडनी तथा अन्य पत्थरों से बने छोटे आकार के लिंग भी प्राप्त हुए हैं।

प्राचीन सत्ता : प्रासाद तथा शासक-

हड़प्पा में सत्ता के केंद्र अथवा सत्ताधारी लोगों के विषय में पुरातात्विक विवरण हमें कोई त्वरित उत्तर नहीं देते। पुरातत्वविदों ने मोहनजोदड़ो में मिले एक विशाल भवन को एक प्रासाद की संज्ञा दी परंतु इससे सम्बद्ध कोई भव्य वस्तुएँ नहीं मिली हैं। पुरातत्वविदों ने एक पत्थर की मूर्ति को ‘पुरोहित-राजा’ की संज्ञा दी है और यह नाम आज भी प्रचलित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पुरातत्वविद मेसोपोटामिया के इतिहास तथा वहाँ के ‘पुरोहित-राजाओं’ से परिचित थे और यही समानताएँ उन्होंने सिंधु क्षेत्र में भी ढूँढ़ी। लेकिन हड़प्पा सभ्यता की आनुष्ठानिक प्रथाएँ अभी तक ठीक प्रकार से समझी नहीं जा सकी हैं और न ही यह जानने के साधन उपलब्ध हैं कि क्या जो लोग इन अनुष्ठानों का निष्पादन करते थे, उन्हीं के पास राजनीतिक सत्ता होती थी।
कुछ पुरातत्वविदों का मत हैं कि हड़प्पाई समाज में कोई शासक नहीं होते थे तथा यहाँ के सभी लोगों की सामाजिक स्थिति समान थी। दूसरे पुरातत्वविद यह मानते हैं कि यहाँ कोई एक नहीं बल्कि कई शासक थे जैसे मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि के अपने अलग-अलग राजा होते थे। कुछ और यह तर्क देते हैं कि यह एक ही राज्य था जैसा कि पुरावस्तुओं में समानताओं, नियोजित बस्तियों के साक्ष्यों, ईंटों के आकार में निश्चित अनुपात, तथा बस्तियों के कच्चे-माल के स्रोतों के समीप संस्थापित होने से स्पष्ट है।
अभी तक की स्थिति में अंतिम परिकल्पना सबसे युक्तिसंगत प्रतीत होती है क्योंकि यह कदाचित् संभव नहीं लगता कि पूरे के पूरे समुदायों द्वारा इकट्टे ऐसे जटिल निर्णय लिए तथा कार्यान्वित किए जाते होंगे।

सभ्यता का अंत-

ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनके अनुसार लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थलों को त्याग दिया गया था। इसके साथ ही गुजरात, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नई  बस्तियों में आबादी बढ़ने लगी थी।
ऐसा लगता है कि उत्तर हड़प्पा के क्षेत्र 1900 ईसा पूर्व के बाद भी अस्तित्व में रहे। कुछ चुने हुए हड़प्पा स्थलों की भौतिक संस्कृति में बदलाव आया था जैसे सभ्यता की विशिष्ट पुरावस्तुओं जैसे बाटों, मुहरों तथा विशिष्ट मनकों का समाप्त हो जाना। लेखन, लंबी दूरी का व्यापार तथा शिल्प विशेषज्ञता भी समाप्त हो गई। सामान्यतः थोड़ी वस्तुओं के निर्माण के लिए थोड़ा ही माल प्रयोग में लाया जाता था। आवास निर्माण की तकनीकों का ह्रास हुआ तथा बड़ी सार्वजनिक संरचनाओं का निर्माण अब बंद हो गया। कुल मिलाकर पुरावस्तुएँ तथा बस्तियाँ इन संस्कृतियों में एक ग्रामीण जीवनशैली की ओर संकेत करती हैं। इन संस्कृतियों को ‘‘उत्तर हड़प्पा’’ अथवा ‘‘अनुवर्ती संस्कृतियाँ’’ कहा गया।
ये परिवर्तन कैसे हुए? इस विषय में कई व्याख्याएँ दी गई हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़, नदियों का सूख जाना और अथवा मार्ग बदल लेना तथा भूमि का अत्यधिक उपयोग सम्मिलित हैं। इनमें से कुछ ‘कारण’ कुछ बस्तियों के संदर्भ में तो सही हो सकते हैं परंतु पूरी सभ्यता के पतन की व्याख्या नहीं करते।
ऐसा लगता है कि एक सुदृढ़ एकीकरण के तत्व, संभवतः हड़प्पाई राज्य, का अंत हो गया था। मुहरों, लिपि, विशिष्ट मनकों तथा मृदभाण्डों के लोप, मानकीकृत बाट प्रणाली के स्थान पर स्थानीय बाटों के प्रयोग, शहरों के पतन तथा परित्याग जैसे परिवर्तनों से इस तर्क को बल मिलता है। उपमहाद्वीप को एक पूरी तरह से अलग क्षेत्र में नए शहरों के विकास के लिए एक सहस्त्राब्दी से भी अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

एक ‘आक्रमण’ के साक्ष्य-

डैडमैन लेन एक सँकरी गली है, जिसकी चौड़ाई 3 से 6 फीट तक परिवर्ती है . . . . वह बिंदु जहाँ यह गली पश्चिम की ओर मुड़ती है, 4 फीट तथा 2 इंच की गहराई पर एक खोपड़ी का भाग तथा एक वयस्क की छाती तथा हाथ के ऊपरी भाग की अस्थियाँ मिली थीं। ये सभी बहुत भुरभुरी अवस्था में थीं। यह धड़ पीठ के बल, गली में आड़ा पड़ा हुआ था। पश्चिम की ओर 15 इंच की दूरी पर एक छोटी खोपड़ी के कुछ टुकड़े थे। इस गली का नाम इन्हीं अवशेषों पर आधारित है।
जॉन मार्शल, मोहनजोदड़ो एंड द इंडस सिविलाईशेशन, 1931 से उद्धृत।
1925 में मोहनजोदड़ो के इसी भाग से सोलह लोगों के अस्थि-पंजर उन आभूषणों सहित मिले थे जो इन्होंने मृत्यु के समय पहने हुए थे।
बहुत समय पश्चात 1947 में आर.ई.एम. व्हीलर ने जो भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल थे, इन पुरातात्विक साक्ष्यों का उपमहाद्वीप में ज्ञात प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के साक्ष्यों से संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने लिखाः
ऋग्वेद में पुर शब्द का उल्लेख है जिसका अर्थ है प्राचीर, किला या गढ़। आर्यां के युद्ध के देवता इंद्र को पुरंदर, अर्थात् गढ़-विध्वंसक कहा गया है।
ये दुर्ग कहाँ हैं .... या थे ....? पहले यह माना गया था कि ये मिथक मात्रा थे .... हड़प्पा में हाल में हुए उत्खननों ने मानो परिदृश्य बदल दिया है। यहाँ हम मुख्यतः अनार्य प्रकार की एक बहुत विकसित सभ्यता पाते हैं जिसमें अब प्राप्त जानकारी के अनुसार विशाल किलेबंदियाँ की गई थीं .... यह सुदृढ़ रूप से स्थिर सभ्यता कैसे नष्ट हुई?  हो सकता है जलवायु संबंधी, आर्थिक अथवा राजनीतिक ह्रास ने इसे कमजोर किया हो, पर अधिक संभावना इस बात की है कि जानबूझ कर तथा बड़े पैमाने पर किए गए विनाश ने इसे अंतिम रूप से समाप्त कर दिया। यह मात्रा संयोग ही नहीं हो सकता कि मोहनजोदड़ो के अंतिम चरण में आभास होता है कि यहाँ पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों का जनसंहार किया गया था। पारिस्थितिक साक्ष्यों के आधार पर इंद्र अभियुक्त माना जाता है।
आर.ई.एम. व्हीलर, हड़प्पा 1946, एंशिएंट इंडिया (जर्नल) 1947 से उद्धृत।
1960 के दशक में जॉर्ज डेल्स नामक पुरातत्वविद ने मोहनजोदड़ो में जनसंहार के साक्ष्यों पर सवाल उठाए।
उन्होंने दिखाया कि उस स्थान पर मिले सभी अस्थि-पंजर एक ही काल से सम्बद्ध नहीं थेः
हालाँकि इनमें से दो से निश्चित रूप में संहार के संकेत मिलते हैं, . . . . पर अधिकांश अस्थियाँ जिन संदर्भां में मिली हैं वे इंगित करती हैं कि ये अत्यंत लापरवाही तथा श्रमहीन तरीके से बनाए गए शवाधान थे। शहर के अंतिम काल से सम्बद्धविनाश का कोई स्तर नहीं है, व्यापक स्तर पर अग्निकांड के चिह्न नहीं हैं, चारों ओर फैले हथियारों के बीच कवचधारी सैनिकों के शव नहीं हैं। दुर्ग से जो शहर का एकमात्रा किलेबंद भाग था, अंतिम आत्मरक्षण के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं।
जी.एपफ.डेल्स, ‘द मिथिकल मैसेकर एट मोहनजोदड़ो’, एक्सपीडीशन, 1964 से उद्धृत।
सभ्यता के पतन के कारण –
  • पुरात्तविद गार्डन चाइल्ड, ह्लीलर के अनुसार आर्यों के आक्रमण, भयंकर बाढ के कारण सभ्यता का विनाश हुआ।
  • सर जॉन मार्शल, मैके, एस आर.राव के अनुसार प्राकृतिक आपदा के कारण सभ्यता नष्ट हुई।
  • स्टाइन, ए.एन.घोष के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण इस सभ्यता का पतन हुआ।
  • एम.आर.साहनी के अनुसार भू-तात्विक परिवर्तन के कारण हङपा सभ्यता का विनाश हुआ।
  • सर जॉन मार्शल के अनुसार प्रशासनिक शिथिलता के कारण सिंधु सभ्यता का नष्ट हो गई।

हड़प्पा सभ्यता की खोज की कहानी -

1826 में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता के बारे में पता लगाया था। 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बंधुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी थी। एलेक्जेंडर कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया था। इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (ASI) (Archaeological Survey of India) की स्थापना की गई तथा कनिंघम इसके प्रथम महानिदेशक (Director General) बनाए गए। 1904 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग का महानिदेशक (Director General) बनाया गया। फ्लीट ने इस पुरानी सभ्यता के बारे में एक लेख लिखा। 1921 में माधो स्वरुप वत्स तथा दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन प्रारम्भ किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया। इन्हीं खोजों के आधार पर 1924 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल ने पूरे विश्व के समक्ष सिन्धु घाटी में एक नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की। यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिए इसका नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया। प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण भी कहा जाता है। प्रथम बार कांसे के प्रयोग के कारण इसे कांस्य सभ्यता भी कहा जाता है।

कनिंघम का भ्रम-

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक कनिंघम ने उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब पुरातात्विक उत्खनन आरंभ किए, तब पुरातत्वविद अपने अन्वेषणों के मार्गदर्शन के लिए लिखित स्रोतों (साहित्य तथा अभिलेख) का प्रयोग अधिक पसंद करते थे। यहाँ तक कि कनिंघम की मुख्य रुचि भी आरंभिक ऐतिहासिक (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईसवी) तथा उसके बाद के कालों से संबंधित पुरातत्व में थी। आरंभिक बस्तियों की पहचान के लिए उन्होंने चौथी से सातवीं शताब्दी ईसवी के बीच उपमहाद्वीप में आए चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों द्वारा छोड़े गए वृतांतों का प्रयोग किया। कनिंघम ने अपने सर्वेक्षणों के दौरान मिले अभिलेखों का संग्रहण, प्रलेखन तथा अनुवाद भी किया। उत्खनन के समय वे ऐसी पुरावस्तुओं को खोजने का प्रयास करते जो उनके विचार में सांस्कृतिक महत्त्व की थीं। हड़प्पा जैसा पुरास्थल जो चीनी तीर्थयात्रियों के यात्रा-कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था और जो एक आरंभिक ऐतिहासिक शहर नहीं था, कनिंघम के अन्वेषण के ढाँचे में उपयुक्त नहीं बैठता था। इसलिए हालाँकि हड़प्पाई पुरावस्तुएँ उन्नीसवीं शताब्दी में कभी-कभी मिलती थीं और इनमें से कुछ तो कनिंघम तक पहुँची भी थीं, फिर भी वह समझ नहीं पाए कि ये पुरावस्तुएँ कितनी प्राचीन थीं।
एक अंग्रेज ने कनिंघम को एक हड़प्पाई मुहर दी। उन्होंने मुहर पर ध्यान तो दिया पर उन्होंने उसे एक ऐसे काल-खंड में, दिनांकित करने का असफल प्रयास किया जिससे वे परिचित थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि कई और लोगों की तरह ही उनका भी यह मानना था कि भारतीय इतिहास का प्रारंभ गंगा की घाटी में पनपे पहले शहरों के साथ ही हुआ था। उनकी सुनिश्चित अवधारणा के चलते यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वह हड़प्पा के महत्त्व को समझने में चूक गए।

एक नवीन प्राचीन सभ्यता के रूप में पहचान

कालांतर में बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में दयाराम साहनी जैसे पुरातत्वविदों ने हड़प्पा में मुहरें खोज निकाली, जो निश्चित रूप से आरंभिक ऐतिहासिक स्तरों से कहीं अधिक प्राचीन स्तरों से सम्बद्ध थीं। अब इनके महत्त्व को समझा जाने लगा। एक अन्य पुरातत्वविद राखल दास बनर्जी ने हड़प्पा से मिली मुहरों के समान मुहरें मोहनजोदड़ो से खोज निकालीं जिससे अनुमान लगाया गया कि ये दोनों पुरास्थल एक ही पुरातात्विक संस्कृति के भाग थे। इन्हीं खोजों के आधार पर 1924 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल ने पूरे विश्व के समक्ष सिन्धु घाटी में एक नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की। जैसा कि एस.एन. राव, द स्टोरी ऑफ़ इन्डियन आर्कियोलाजॅी, में लिखते हैं, ‘‘मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हजार वर्ष पीछे छोड़ा"। ऐसा इसलिए था क्योंकि मेसोपोटामिया के पुरास्थलों में हुए उत्खननों से हड़प्पा पुरास्थलों पर मिली मुहरों जैसी, पर तब तक पहचानी न जा सकीं, मुहरें मिली थीं। इस प्रकार विश्व को न केवल एक नयी सभ्यता की जानकारी मिली, पर यह भी कि वह मेसोपोटामिया के समकालीन थी।
भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महानिदेशक के रूप में जॉन मार्शल का कार्यकाल वास्तव में भारतीय पुरातत्व में एक व्यापक परिवर्तन का काल था। वे भारत में कार्य करने वाले पहले पेशेवर पुरातत्वविद थे और वे यहाँ यूनान तथा क्रीट में अपने कार्यां का अनुभव भी लाए।

कालरेखा -

हड़प्पाई पुरातत्व के विकास के प्रमुख चरण

                                उन्नीसवीं शताब्दी

1875 -      हड़प्पाई मुहर पर कनिंघम की रिपोर्ट

                      बीसवीं शताब्दी
1921 -  माधो स्वरूप वत्स द्वारा हड़प्पा में उत्खननों का आरंभ
1925 -  मोहनजोदड़ो में उत्खननों का प्रारंभ
1946 - आर.ई.एम. व्हीलर द्वारा हड़प्पा में उत्खनन
1955 - एस.आर. राव द्वारा लोथल में खुदाई का आरंभ
1960 - बी.बी. लाल तथा बी.के. थापर के नेतृत्व में कालीबंगन में उत्खननों का आरंभ
1974 - एम.आर. मुगल द्वारा बहावलपुर में अन्वेषणों का आरंभ
1980 - जर्मन-इतावली संयुक्त दल द्वारा मोहनजोदड़ो में सतह-अन्वेषणों का आरंभ
1986 - अमरीकी दल द्वारा हड़प्पा में उत्खननों का आरंभ
1990 - आर.एस. बिष्ट द्वारा धौलावीरा में उत्खननों का आरंभ 

सभ्यता का काल निर्धारण-

  • सर जॉन मार्शल के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 3250 ई.पू.से 2750 ई.पू.था।
  • अर्नेस्ट मैके ने सिंधु सभ्यता का काल 2800 ई.पू.से 2500 ई.पू.माना है।
  • माधो स्वरूप वत्स ने इस सभ्यता का काल 3500 ई.पू. से 2700 ई.पू. माना है।
  • सी.जे.गैड के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2350 ई.पू. से 1700 ई.पू. माना है।
  • मार्टीमर ह्लीलर ने इस सभ्यता का काल निर्धारण 2500 ई.पू. से 1500 ई.पू. माना है।
  • फेयर सर्विस के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2000 ई.पू. से 1500 ई.पू. माना है।
  • रेडियो कार्बन (C14) पद्धति के अनुसार (सर्वमान्य तिथि ) सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई.पू. से 1750 ई.पू.  है। 
  • N.C.E.R.T के अनुसार  सिंधु सभ्यता का काल 2600-1800 ई.पू. है।

स्रोत- एनसीईआरटी की इतिहास की पुस्तक

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