11/02/2018 06:00:00 am
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रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ : एक परिचय- 

Ramnehi Sampradaya 'Ren': An Introduction-

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‘रामस्नेही’ नाम के तीन स्वतंत्र सम्प्रदाय है। जिनमें से रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ भी एक स्वतंत्र सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन स्थान ‘रेण’ नामक गाँव रहा है और आज भी इस सम्प्रदाय की आचार्य गद्दी परम्परा तथा सम्प्रदाय का सम्पूर्ण संचालन ‘रेण’ से ही हो रहा है, इसलिए इसे रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ के नाम से ही जाना जाता है।

1. ‘रेण’ का भौगोलिक परिचय :-

‘रेण’ राजस्थान राज्य के मारवाड़ क्षेत्र के नागौर जिले में प्रसिद्ध संत मीराबाई के जन्म स्थान ‘मेड़ता’ तहसील के अन्तर्गत एक ग्राम है। यह मेड़ता शहर से 15 किमी. दूरी पर उत्तर दिशा में, मेड़ता नागौर सड़क मार्ग पर स्थित है। मोटर-बस सेवा के साथ-साथ यहाँ रेल सेवा भी उपलब्ध है। ‘रेण’ कस्बे की आबादी लगभग बीस हजार है। इसका क्षेत्रफल लगभग एक वर्ग किमी. है। इस कस्बे में लगभग सभी आधुनिक सुविधाएँ देखने को मिलती है।

2. ‘रेण’ शाखा की स्थापना और विकास :-

रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ के प्रवर्त्तक संत दरियाव साहब का जन्म स्थान राजस्थान राज्य के पाली जिले के जैतारण ग्राम में हुआ था। किन्तु जब ये सात वर्ष के थे तब इनके पिता का देहान्त हो जाने के कारण ये अपनी माता के साथ अपने ननिहाल ‘रेण’ में आ गये थे। इनका लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा रेण में ही हुई और ये स्थाई रूप से रेण में ही बस गये। इन्होंनें रेण में ही अपनी साधना आदि सम्पन्न की और आजीवन इसी स्थान पर रहकर राम-नाम स्मरण का उपदेश देते हुए संवत 1815 में निर्वाण प्राप्त किया।
‘रेण’ न केवल दरिया साहब का साधना स्थल रहा अपितु अपने गुरु प्रेमदास से दीक्षा भी इन्होंनें यही ग्रहण की तथा कठिन तपस्या के उपरान्त इन्हें ‘परम तत्व’ की अनुभूति भी ‘रेण’ में ही हुई। इतना ही नहीं, अपने शिष्य समुदाय को ‘राम’ नाम रटने का उपदेश भी इन्होंनें ‘रेण’ में ही दिया। जब ये अपने शिष्यों सहित ‘राम’ नाम के श्वासोच्छवास स्मरण में मग्न हो अपने उपदेश रूपी कथनी और करनी को एक कर रहे थे कि तत्कालीन जन-मानस के द्वारा इन्हें और इनकी शिष्य मंडली को ‘रामस्नेही सभा’ से उपमित भी ‘रेण’ में ही किया गया -
“रामस्नेही जकै सभा सरब संगत बेठी।“
संभवतः इसी कारण से संत दरियाव साहब द्वारा अपने ज्येष्ठ शिष्य पूरणदास को ‘रामस्नेही तात’ कहकर सम्बोधित किये जाने का उल्लेख भी मिलता है :-
“कृपा कर सतगुरु कहे, पूरण सुन मम बात।
निश्चल मन धारण करो, सुन रामस्नेही तात।।”
यही रामस्नेही सभा कालांतर में ‘रेण’ में ही ‘रामस्नेही सम्प्रदाय’ के रूप में विकसित हुई।
दरियाव साहब के प्रथम शिष्य पूरणदास जिन्हें दरिया साहब ने ‘रामस्नेही तात’ कहकर सम्बोधित किया था, के द्वारा वि.सं. 1772 अश्विन पूर्णिमा को दीक्षा ग्रहण किये जाने का उल्लेख मिलता है। जिससे स्पष्ट संकेतित होता है कि इनके शिष्यों ने वि.सं. 1772 के बाद ही दीक्षा ग्रहण की। इससे सिद्ध होता है कि इन्हें और इनकी शिष्य-मंडली को ‘रामस्नेही सभा’ की संज्ञा से संबोधित वि.सं. 1772 के बाद ही कभी किया गया और तभी से संत दरिया साहब और इनके शिष्य ‘रामस्नेही’ के रूप में पुकारे जाने लगे।
‘रेण’ में ही दरिया साहब का समाधि स्थान है जो ‘राम-धाम’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान रेण स्थित ‘लाखासागर’ के पश्चिमी तट पर स्थित है। इसके बाह्य परिसर के मुख्य द्वार पर निम्न शिलालेख मिलता है:-

“श्री दरियाव नमः।। श्री दरियाव ट्रस्ट रेण ।। श्री हरिनारायणाय नमः
अखिल भारतीय रामस्नेही सम्प्रदाय प्रधान पीठ रेण जगद्गुरु आदि आचार्य श्री दरियाव महाराज का प्रादुर्भाव वि.सं. 1733 कृष्ण जन्माष्टमी; दीक्षा वि.सं. 1769 कार्तिक शुक्ल एकादसी मोक्ष वि.सं. 1815 मार्गशीर्ष पूर्णिमा।।”


इस प्रकार से यह स्थान रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ का मूल रामद्वारा और आचार्य पीठ है। समाधि स्थल के प्रवेश द्वार पर एक लोह-पत्र पर यह दोहा अंकित है।
“देह पड़ता दादू कहै, सौ बरसां एक संत।
प्रगट राहण नगर में, तारै जीव अनंत।।”
दरिया साहब का समाधि स्थल मकराना के सफेद संगमरमर पत्थर से निर्मित है। इसके चारों ओर एक परिक्रमण शाला है, जो संगमरमर पत्थर ही के बीस थंबों पर टिकी हुई है।
समाधि स्थल के भीतर दरियाव जी की मूल समाधि पर उनके चरण-चिह्न बने हुए है, जिन पर एक ‘वाणी जी’ रखी हुई है। समाधि के पृष्ठ भाग के एक शिलाखंड पर दरियाव जी के तीन चित्र स्थापित है। इनमें से एक चित्र पर लिखा है -
“सकल ग्रंथ का अरथ है, सकल बात की बात ..
दरिया सुमिरन राम को, कर लीजे दिन रात।।”
सम्पूर्ण समाधि स्थल बेल-बूटों से चित्रित है। समाधि-स्थल पर एक अखण्ड ज्योति निरन्तर प्रज्वलित रहती है। ‘रामधाम’ परिसर में रामस्नेही दर्शनार्थियों हेतु सुविधाओं से युक्त 150 से अधिक विश्राम कक्ष हैं तथा एक वृहत् सत्संग भवन भी है। जिसमें 1200 से अधिक श्रद्धालु बैठ सकते हैं। इन सबका निर्माण वर्तमान पीठाधीश्वर स्वामी श्री हरिनारायण शास्त्री जी की प्रेरणा से गतिमान है। समाधि स्थल के उत्तर दिशा में ‘राम रसोड़ा’ (रसोई घर) है। इसमें सभी आगंतुक हेतु भोजनादि की व्यवस्था आठों पहर रहती है। ‘राम रसोड़ा’ भवन की ऊपर वाली मंजिल में वर्तमान ‘रेण’ पीठाचार्य निवास करते है। रामधाम परिसर में दरियाव जी की समाधि के अतिरिक्त परवर्ती विभिन्न रामस्नेही संतों की समाधियाँ हैं। जिनमें अंभाबाई जी की समाधि इस पर लगे शिलालेख के कारण महत्वपूर्ण हैं :-

“वि.सं. 1854 मिति चेत।।, साधा, म्हाराज श्री 108 श्री दरियाव साहब जी रा सिष महाराज श्री श्री टेमदास जी रे श्री पाद पर देवल बाई अंबा के साधारी अस्थान देवल रेण।”

रामधाम परिसर के बाहर भी दो समाधि स्थल बने हुए हैं जो क्रमशः इस सम्प्रदाय में विरक्त भेष के प्रवर्तक संत शिरोमणि श्री गुलाबदास जी तथा भूतपूर्व पीठाचार्य श्री बलरामदास जी की स्मृति में निर्मित हुए है।
रामधाम के समीप पूर्व में एक सरोवर है जिसें ‘लाखा सागर’ कहते है। किंवदंती है कि दरिया साहब अपने किसी शिष्य द्वारा उनकी (दरिया साहब की) अनुभव वाणी का यशगान करते हुए उनके सम्मुख रख दिये जाने पर बहुत खिन्न हुए और यह कहते हुए -
“अनुभव झुठा भोथरा, निर्गुण सच्चा ज्ञान।
ज्योति सेती परचा भया, धुँए से क्या काम।।”
अपनी सम्पूर्ण वाणी, जिसकी संख्या एक लाख बताई जाती है, को इस सरोवर में फेंक दिया। जिससे इसका नाम ही ‘लाखासागर’ पड़ गया। यह ‘लाखा सागर’ रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ के रामसनेहियों के लिए पावन एवं पवित्र तीर्थ है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी सम्प्रदाय के प्रत्येक पर्व पर इसमें स्नान कर अपने को धन्य समझते है और इसे गंगा स्नान से भी बढ़कर मानते है। यहाँ तक कि इस सम्प्रदाय के अनुयायी अपने स्वजनों की मृत्यु के पश्चात उनकी अस्थियों का विसर्जन भी इसी सरोवर में श्रद्धा पूर्वक करते है। इसका महत्व इसलिए भी अधिक है कि इसमें संत दरिया साहब नित्य स्नान करते थे।
‘रेण’ ग्राम के मध्य में एक ‘रामसभा’ भवन स्थित है। इसका निर्माण वि.सं. 1856 में दरिया साहब के प्रमुख शिष्यों में से एक संत हरखाराम जी ने करवाया था। इस भवन के पूर्व इस स्थान पर दरिया साहब का मूल निवास स्थान था। इस भवन के भीतर एक ‘पाटगादी’ के भी दर्शन होते हैं। जिस पर बैठकर संत दरिया साहब उपदेश, भजनादि किया करते थे। ‘रामसभा’ भवन की ऊपरी मंजिल पर गहन साधना हेतु एक गुफा भी बनी हुई है। छत की भितियों पर चौबीस तीर्थकरों के चित्र तथा महाराजा बख्तसिंह, महाराजा विजयसिंह को उपदेश देते हुए संत दरिया साहब एवं इनके प्रमुख शिष्यों के चित्र भी बने हुए है।

3. ‘रेण’ की आचार्य परम्परा :-

रेण रामस्नेही सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित है। एक, संत बलरामदास शास्त्री द्वारा प्रतिपादित मत तथा दूसरा डॉ. राधिकाप्रसाद त्रिपाठी द्वारा प्रतिपादित मत। संत बलरामदास शास्त्री जहाँ अपनी साम्प्रदायिका पुस्तकों क्रमशः ‘श्री रामस्नेही संतवाणी एवं भजन संग्रह’ तथा ‘श्री रामस्नेही अनुभव आलोक’ में दरिया साहब के पश्चात तथा संत भगवतदास जी द्वारा आचार्य पद ग्रहण करने से पूर्व तक 123 वर्षों की अवधि में क्रमशः संत हरखाराम जी तथा संत रामकरण जी को आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित करके, इस सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा को अखंडित दर्शाते है। वहीं, डॉ. राधिकाप्रसाद त्रिपाठी इन 123 वर्षों तक इस सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा को खंडित बतलाते हैं तथा संत हरखाराम जी और संत रामकरण जी को उपर्युक्त काल खण्ड की अवधि में आचार्य रूप में स्वीकार न कर के, ‘रामद्वारा रामधाम रेण’ के मात्र प्रबंधक के रूप में ही उल्लेख करते है।3 संत बलरामदास शास्त्री एवं डॉ. राधिकाप्रसाद त्रिपाठी दोनों के मतों का विश्लेषण करने पर दोनों के मत उचित लगते हैं। किन्तु परवर्ती साम्प्रदायिक विद्वानों श्री हरिनारायण शास्त्री, स्वामी भगवानदास, शास्त्री ओम केवलिया तथा साहित्यिक विद्वानों डॉ. चैतन्य गोपाल निर्भय, डॉ. शिवाशंकर पाण्डेय, डॉ. गोपीकिशन चितारा ने एकमत से संत बलरामदास द्वारा रचित पुस्तक ‘श्री रामस्नेही अनुभव आलोक’ में प्रतिपादित आचार्य परम्परा सम्बन्धी मत को स्वीकार किया है।
डॉ. चैतन्य गोपाल निर्भय ने अपने ग्रंथ ‘रामस्नेही सम्प्रदाय और साहित्य’ में लिखा है कि संत बलरामदास ने अपनी पुस्तक में श्री हरखाराम जी और रामकरण जी को बिना पर्याप्त आधार के आचार्य घोषित करना लेखक का साम्प्रदायिक आग्रह ही समझा जा सकता है जबकि इन्हीं लेखक ने ‘श्री रामस्नेही संतवाणी एवं भजन संग्रह’ में विवरणित आचार्य परम्परा में न तो इनके लिए कहीं ‘आचार्य’ शब्द का प्रयोग ही किया है और न ही इन्हें स्पष्टतः आचार्य के रूप में स्वीकार किया है।
डॉ. राधिका प्रसाद त्रिपाठी का मानना है कि श्री हरखाराम व श्री रामकरण जी ने पीठाचार्य के रूप में ‘रेण’ में स्थायी निवास नहीं किया तथा श्री हरखाराम जी का रेण पीठ की थंभायत रामद्वारा, नागौर की महंत गाद्दी के संस्थापक के रूप में परिचय प्राप्त होता है और श्री रामकरण जी इसी महंत परम्परा में श्री हरखाराम जी के परवर्ती महंत हुए है। श्री हरखाराम जी व रामकरण जी महाराज की समाधियाँ भी नागौर में स्थापित है।
उपर्युक्त आपत्तियाँ गलत नहीं है। परन्तु यह भी सत्य है कि यदि हरखाराम जी गुरु धर्म का पालन करते हुए सम्प्रदाय का जीर्णोद्धार नहीं करते और रामकरण जी इसे संवार कर नही रखते तो आज ‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय का संभवतः अस्तित्व ही दिखाई नही देता। यदि हरखाराम जी की गुरु निष्ठा, गुरु धाम सेवा तथा सम्प्रदाय के प्रति इनके द्वारा किये गये योगदान पर निगाह डाली जाये तो समस्त आपत्तियाँ समाप्त हो जाती है।
वस्तुतः हरखाराम जी दरिया साहब के सभी प्रमुख शिष्यों में सबसे युवा परिश्रमी एवं निष्ठावान शिष्य हुए। गुरु एवं गुरुधाम ‘रेण’ में इनकी पूर्ण निष्ठा थी। इसी कारण से सम्प्रदाय का समस्त कार्यभार इन्होंनें अपने हाथों में लिया और ‘रामसभा’ का निर्माण कराकर ‘गुरुधाम रेण’ का जीर्णोद्धार किया। गुरु के सम्प्रदाय को नागौर में प्रचारित एवं प्रसारित किया। इन्होंने रेण में प्रतिवर्ष फूल डोल मेला महोत्सव आदि का आयोजन कर गुरुधाम की शोभा में वृद्धि करते हुए सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार किया। इसके प्रमुख एवं उत्तराधिकारी शिष्य श्री रामकरण जी ने इनके उपरांत इसी भांति गुरुधर्म का पालन पूर्ण लगन एवं निष्ठा से किया।
अगर उपर्युक्त तथ्यों का विश्लेषण तटस्थता से किया जाए तो ‘श्री हरखाराम जी’ एवं रामरकण जी का व्यक्तित्व इस सम्प्रदाय के आचार्य के रूप में ही उभर कर सामने आता है। इस कारण इन्हें ‘आचार्य’ मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। किन्तु बलरामदास शास्त्री तथा इनके मत के समर्थक सभी विद्वानों ने संत हरखाराम के द्वारा वि.सं. 1861 में परमधाम प्राप्त करने के पश्चात संतरामकरण जी से वि.सं. 1938 में श्री भगवतदास जी द्वारा आचार्य पद ग्रहण करने तक लगभग 77 वर्षों का जो कार्यकाल दिखाया है।6 वह युक्तियुक्त नहीं जान पड़ता है। डॉ. सतीश कुमार ने अपने शोध ग्रंथ में रामकरण जी के चित्र में अंकित निर्वाण तिथि वि.सं. 1913 मानी है। जो उन्हें राममोहल्ला, नागौर में देखने को मिला था।7 जिससे संत रामकरण जी का कार्यकाल वि.सं. 1861 से वि.सं. 1938 तक 77 वर्षों का न होकर वि.सं. 1861 से वि.सं. 1913 तक 52 वर्षों का होना सिद्ध होता है और वि.सं. 1913 से वि.सं. 1938 तक 25 वर्ष की कालावधि में इस सम्प्रदाय के आचार्य के रूप में किसी नाम का पता न चल पाने के कारण यह कालखंड आचार्य परमपरा के सम्बन्ध में व्यवधान पूर्ण सिद्ध होता है। इस प्रकार डॉ. राधिका प्रसाद त्रिपाठी के द्वारा इस सम्बन्ध में लगभग 125 वर्षों का जो समय व्यवधान पूर्ण माना गया है। वह 125 वर्षों का न माना जाकर मात्र 25 वर्ष का अवश्य स्वीकार किया जा सकता है। अतः यहाँ की आचार्य परम्परा निम्नवत रही है।
दरिया साहब -
(वि.सं. 1765-1815)
हरखाराम
(वि.सं. 1815-1861)
रामकरण
(वि.सं. 1861-1913)
भगवतदास
(वि.सं. 1938-1956)
रामगोपाल
(वि.सं. 1956-1998)
क्षमाराम
(वि.सं. 1998-2029)
बलरामदास शास्त्री
(वि.सं. 2029-2029)
हरिनारायण शास्त्री
(वि.सं. 2029 से अब तक)

4. रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ की थंभायते व उनके रामद्वारे :-

रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ के प्रवर्त्तक संत दरिया साहब के अनेक शिष्य एवं शिष्याएँ थी। उनमें से उनके जो योग्य शिष्य थे, उन्होंने अपने पृथक स्थानों की स्थापना की और उनकी शिष्य परंपरा भी चली, उन शिष्यों द्वारा स्थापित स्थान ‘थांभायत रामद्वारा’ कहलाते है। इस दृष्टि से दरिया साहब के छः शिष्य क्रमशः पूरणदास, किसनदास, नानकदास, सुखराम, हरखाराम, और टेमदास जी प्रमुख हुए। इनमें से किसनदास जी की साधना स्थली ‘टाँकला’ (नागौर) रही, ने टाँकला की थांभायत रामद्वारा के रूप में स्थापना नहीं की। किन्तु उनके एक शिष्य मेघोदास ने चाड़ी तथा दो प्रशिष्यों सांवलदास तथा मदाराम जी ने क्रमशः भोजास और डेह नामक स्थानों पर तीन थांभायत रामद्वारों की स्थापना की इस प्रकार ‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय में कुल आठ थांभायत रामद्वारों की स्थापना हुई। जिनका विवरण निम्न प्रकार से है-

थांभायत रामद्वारा, चाड़ी :-

थांभायत रामद्वारा चाड़ी की स्थापना किसनदास जी के प्रमुख शिष्य मेघोदासजी ने 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में की थी। चाड़ी राजस्थान प्रांत के नागौर जिले में है।

थांभायत रामद्वारा ‘डेह’ :-

थांभायत रामद्वारा, ‘डेह’ को ‘साधां की जांगा’ के नाम से ही जाना जाता है इसकी स्थापना किसनदास के पौत्र शिष्य तथा बुधाराम के शिष्य मदाराम जी ने वि.सं. 1866 के लगभग की थी।

थांभायत रामद्वारा, ‘भोजास’ :-

यह स्थान राजस्थान में बीकानेर जिले की सीमा के नजदीक नागौर जिले का एक गाँव है। इस थांभायत रामद्वारा की स्थापना किशनदास जी के प्रशिष्य तथा हरिदास के शिष्य संत सांवलदास ने की थी।

थांभायत रामद्वारा, ‘मेड़ता’ :-

यह थांभायत रामद्वारा मेड़ता में ‘श्री देवल’ के नाम से जाना जाता है। इसके संस्थापक संत दरिया सांहब के परम शिष्य संत सुखरामजी थे। इसकी स्थापना सं. 1880 के लगभग हुई थी।
थांभायत मेड़ता के रामद्वारे राजस्थान एवं अन्य प्रांतों में स्थित है। जो निम्न है -
मेवाड़ अंचल में - उदयपुर, भिंडर (उदयपुर), बड़ी सादड़ी (चित्तौड़गढ़), फौज मुहल्ला, नाथद्वारा  (राजसमंद)।
मारवाड़ अंचल में - गुलाबसागर (जोधपुर), मदारगेट (अजमेर), आलनियावास आदि में।
बागड़ क्षेत्र में - गलियाकोट, डूंगरपुर, सागवाड़ा, बांसवाड़ा, परतापुर, गढ़ही आदि में।
गुजरात में- गुजरात के दोहद, संतरामपुर, झालौद, मुवाड़ा, और लीमड़ी में।
मध्यप्रदेश में- मध्यप्रदेश के कान्नौड़, उज्जैन, झाबुआ, रतलाम, धार, राणापुर, आष्य, शाहजहाँपुर तथा महीपुर आदि में।

थांभायत रामद्वारा, ‘कुचेरा’ :-

कुचेरा राजस्थान के नागौर जिला में स्थित एक कस्बा है। थांभायत रामद्वारा कुचेरा की स्थापना दरिया साहब के प्रमुख शिष्य नानकदास जी ने वि.सं. 1774 के लगभग की थी।
यहाँ के रामद्वारे रामसभा (जोधपुर), भाकरोटा (जयपुर), तबिजी (पुष्कर), रेण (नागौर), खेजड़ी (नागौर) आदि स्थानों पर हैं।

थांभायत रामद्वारा, ‘डीडवाना’ :-

यह रामद्वारा दरिया साहब के शिष्य टेमदास के द्वारा 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में किसी समय स्थापित किया गया था। यहाँ की महंत परम्परा में-टेमदास अंभाबाई- मानाराम आदूराम जी हुए। आदूराम जी के बाद यहाँ की महंत परम्परा खण्डित हो गई है। यहाँ का स्थान भी विलुप्त हो गया है। इस समय टेमदास संस्थापित रामद्वारा का कोई चिह्न तक दिखाई नहीं पड़ता है। डॉ. सतीश कुमार के मतानुसार यहाँ के अतिमं महंत आदूराम जी ने किसी संजय सिंह नामक स्थानीय राजपूत को बेच दिया। अंभाबाई की पारगादी आदि बताई जाती है। लेकिन इसके अवशेष भी उपलब्ध नहीं है। यहाँ से सम्बन्धित एक रामद्वारा ‘भानपुरा’ (मध्यप्रदेश) में बताया जाता है।

थांभायत रामद्वारा, ‘रामपोल नागौर’ :-

इस रामद्वारा की स्थापना दरिया साहंब के परम शिष्य हरखाराम जी द्वारा की गई थी। इसकी स्थापना वि.सं. 1816 के लगभग हुई।  यहाँ के रामद्वारे जेरवाड़ी (नागौर), फिड़ोद (नागौर), इन्याला (नागौर), रामसभा (डीडवाना), ताऊसर, पुष्कर आदि में स्थित है।

5. रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ का साम्प्रदायिक स्वरूप :-

“सकल ग्रंथ का अर्थ है, सकल बात की बात।
दरिया सुमिरन राम का, कर लीजे दिन रात।।”

के उद्घोषक संत दरिया साहब किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक बंधन से परे थे। उनके अनुसार तो ‘राम-नाम’ का सुमिरन ही साधन और साध्य था। इसके लिए किसी प्रकार के सिद्धान्त या शास्त्रीय ज्ञान की अवश्यकता नहीं है। इसलिए शास्त्रज्ञान रूपी ‘रंजी’ को ये उड़ा देने की बात करते है :-
“रंजी शास्तर ग्यान की अंग रहीलिपटाय।
सत गुरु एक ही सबद से, दीन्हीं तुरत उड़ाय।।”
दरिया साहब ने अपने-आपको दूसरों से अलग या विशिष्ट दिखाने के लिए किसी प्रकार के बाह्य एवं कृत्रिम नियमों में नहीं बांधा। इसलिए वे किसी सम्प्रदाय की परिधि में नहीं आ सकते। तथापि यहाँ के परवर्ती संत बाह्य जगत के ऐहिक प्रभाव से पूर्ण रूपेण मुक्त नहीं रह सके और काल प्रभाव से इन संतों में भी साम्प्रदायिक पहचान खोजी जा सकती है। जिसका विवेचन निम्न प्रकार से किया जा सकता है :-





6. रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’के संतों की दिनचर्या :-

‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय के संत ब्रहम मुहूर्त में उठकर गुरुजन को तीन बार दंडवत प्रणाम करते हैं। रामद्वारे के साधु परस्पर ‘राम जी महाराज’ कहकर अभिवादन करते है। बाहर से भी कोई गृहस्थ रामद्वारा में प्रवेश करता है तो वह भी ऊँची आवाज में ‘राम जी राम महाराज’ कहकर पुकारता है तथा उत्तर में रामद्वारा का कोई भी साधु ‘राम’ कहकर प्रतिउत्तर देता है। नित्यकर्म से निवृत्त होने के पश्चात गुरु प्रदत्त साधना-विधि के अनुसार यथासामर्थ्य ‘राम’ नाम का स्मरण किया जाता है। तत्पश्चात गुरुवाणी का पाठ एवं आरती कर पुनः गुरुजन को तीनबार दंडवत् प्रणाम किया जाता है। गुरुद्वारा का प्रमुख साधु या संत भी गुरुसमाधि की ओर उन्मुख होकर तीन या अधिक बार दंडवत प्रणाम करता है। इसके बाद 8 बजे से 10 बजे तक लगभग दो घंटे वाणी-पाठ सत्संग, प्रवचन एवं भगवद् चर्चा से श्रद्धालु लाभान्वित होते है। इसके बाद भोजनादि से निवृत्त  होकर पुनः गुरुजन को तीन बार दंडवत् प्रणाम किया जाता है। सांयकाल में निर्गुण आरती करते है जिसमें संत और गृहस्थ सभी भाग लेते है। रात्रि में आठ-दस बजे तक सत्संग एवं राम-नाम का स्मरण एवं ध्यान किया जाता है।

साधना स्थल :-

इस सम्प्रदाय के साधना या उपासना स्थल को रामद्वारा कहा जाता है। रामद्वारा का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है तथा राम द्वारा के ऊपर तीन कलश स्थापित रहते है। किन्तु ‘रेण’ रामद्वारा में दरिया साहब के समाधि-स्थल पर एक ही कलश स्थापित है। ‘रेण’ रामद्वारा में दरिया साहब तथा परवर्ती संतों के अतिरिक्त नित्य-पाठ-पूजन हेतु ‘गुरु-वाणी’ को पाट पर कपड़े में लपेट कर सुसज्जित कर रखा जाता है। निर्गुण ब्रह्म के उपासक होने के बावजूद राम, कृष्ण, विष्णु आदि सगुण भक्ति के अराध्य देवी-देवताओं के चित्र भी रामद्वारों में प्रायः देखे जाते है। रामद्वारा रामचौकी, बिराई तथा रामद्वारा टालनपुर यद्यपि इसके अपवाद है। इन रामद्वारों में निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हुए वाणी-पाठ के चिंतन-मनन पर ही बल दिया जाता है।

वेशभूषा :-

‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय के संतों की वेशभूषा में भिन्नता पाई जाती है। कुछ संत गुलाबी रंग की चादर के दोनों छोरों के पार्श्वों से लाकर गर्दन पर बांध लेते है तथा ऊपर से एक गुलाबी रंग की अतिरिक्त चादर लपेट लेते है और कोपीन धारण करते है। रेण पीठाधीश्वर व मेड़ता के महन्त इसी वेश को धारण करते हैं। जबकि इन्हीं स्थानों के अन्य साधु तथा नागौर के महन्त गुलाबी रंग का लंबा कुर्ता एवं नीचे गुलाबी तहमंद बांधे रखते है। इनमें कुछ कोपीन धारण करते हैं तो कुछ गुलाबी रंग का कच्छा पहनते है। डेह, भोजास, टांकला के संत साधारण जन जैसे कपड़े पहने हुए मिलते है और भजन-ध्यान में मग्न रहते है। विरक्त संत काले या सफेद वस्त्र धारण करते हैं तथा पैसा आदि को नहीं छूते। साध्वी गुलाबी, सफेद या काले रंग की धोती अथवा लहंगा-कुर्ती पहनती है। अधिकतर संत सिर मुंडवाकर रखते है तथा ‘शिखा’ धारण करते हैं। रामद्वारा रामचौकी बिराई के सभी संत श्वेत वस्त्र धारण करते हुए कोपीन धारण करते हैं, ऊपर श्वेत रंग का कुर्ता पहनते हैं।
पैरो में साधारणतः कपड़े के जूते पहनते है। सम्पूर्ण रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ की वेशभूषा में जो सर्वमान्य बात पाई जाती है वह सिर मुंडवाने एवं शिखा रखने की है।
अधिकांशतः सम्प्रदाय के साधु अविवाहित होते हैं परन्तु कहीं-कहीं अपवाद भी देखने को मिल जाता है। यद्यपि स्वयं दरिया साहब एवं उनके सभी प्रमुख शिष्य गृहस्थ थे। किन्तु बाद में अविवाहित रहने की परम्परा रूढ़ हो गई।

तिलक :-

सगुणोपासना में तिलक का बड़ा महत्व है। इस सम्प्रदाय में तिलक का व्यवहार सामान्य रूप में होता है। इसे रामानन्दी वैष्णव परम्परा का अवशेष माना जा सकता है। रामस्नेही सम्प्रदाय में कुल मिलाकर तीन प्रकार के तिलक प्रचलित है।
(1) स्वामी रामानन्द का तिलक, सिंहासन सहित श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र, मध्य में श्री की विल्व पत्राकार पतनी रेखा।
(2) गोपीचन्द का श्री तिलक।
(3) महात्मा परशुराम का रामनामी तिलक, पत्राकार पुण्ड्र के भीतर ‘राम’।
रामस्नेही सम्प्रदाय ‘रेण’ के साधु गोपीचन्द का श्री तिलक लगाते है। कुछ साधु तिलक नहीं भी लगाते।

माला :-

रामस्नेही सम्प्रदारय के सन्त सगुणोपासकों की भाँति माला का भी प्रयोग करते हैं। यद्यपि निर्गुण सन्तों ने माला की निन्दा भी की है। फिर भी इस सम्प्रदाय की तीनों शाखाओं में ‘तुलसी-माला’ का मुक्त रूप में प्रयोग होता है। ‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय के साधु-संत भी ‘तुलसी-माला’ को धारण करते हैं।

पर्व एवं उत्सव - ‘फूलडोल’:-

रामस्नेही सम्प्रदाय की तीनों शाखाओं में पर्व बहुत कम मनाये जाते है। इनके यहाँ एकमात्र पर्व ‘फूलडोल’ है। यह पर्व सम्प्रदाय की तीनों शाखाओं में समान रूप से मनाया जाता है। ‘रेण’ शाखा में चैत्र पूर्णिमा को मनाया जाता है। दरिया साहब के परम शिष्य संत हरखाराम जिन्हें तत्कालीन जोधपुर नरेश महाराज विजयसिंह के द्वारा देश-निष्कासन का राजदंड दिया गया था। नरेश के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर स्वदेश लौटे तो सर्वप्रथम ‘गुरु-भूमि’ के दर्शनार्थ रेण पधारे थे। तभी उन्होंने गुरुधाम रेण में ‘रामसभा’ का निर्माण करने का संकल्प किया था, जो वि.स. 1856 चैत्र पूर्णिमा को साकार हुआ था। तभी से प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा को बहुत बड़े महोत्सव का अयोजन किया जाता है। कालान्तर में यही महोत्सव ‘फूलडोल’ महोत्सव के नाम से जाना जाने लगा। इस उपलक्ष में विशाल रथयात्रा निकाली जाती है जिसमें दूर-दूर के त्यागी, तपस्वी, संत, महंत तथा सद्गृहस्थ सम्मिलित होते है और दरिया साहब की समाधी के दर्शन करते है। यह वार्षिक महोत्सव लगभग सप्ताह भर चलता है।
‘रेण’ रामसनेह सम्प्रदाय में एक पर्व दरिया साहब की निर्वाण तिथि पर मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस प्रकार इस सम्प्रदाय में सालभर में दो पर्व ही मनाये जाते है। इस प्रकार दोनों महोत्सवों पर ‘रेण’ रामस्नेही धर्मावलंबीजन ‘रेण’ रामधाम में एकत्रित होते है तथा संत-वचनामृत का पान करके भारत के कोने-कोने में ‘राम’ नाम का प्रचार करते हुए प्रस्थान करते है। ‘रेण’ के अतिरिक्त विभिन्न थांभायतों में भी प्रत्येक थांभायत के संस्थापकों की मोक्ष तिथि के दिन महोत्सव मनाया जाता है।

पीठाचार्य की निर्वाचन पद्धति :-

शाहपुरा और रेण में पीठाचार्य का चुनाव जनतांत्रिक तरीके से होता है। 18 वीं शताब्दी में यह प्रणाली आश्चर्य जनक है, क्योंकि उस समय भारतवर्ष में राजा का ज्येष्ठ पुत्र और सम्प्रदायाचार्य के प्रधान शिष्य ही गद्दी के अधिकारी होते थे। इस सम्प्रदाय की निर्वाचन पद्धति भिन्न प्रकार की है। नियम यह है कि दिवंगत आचार्य की 13 वीं तिथि या किसी निर्धारित समय पर समस्त रामस्नेही संत एवं गृहस्थ एकत्र होते है। साधुओं और गृहस्थों की अलग-अलग गोष्ठियाँ होती है और विचार-विमर्श करके सर्वसम्मत से किसी एक महात्मा को आचार्य बनाने का निर्णय किया जाता है। आचार्य बनने के लिए कोई आवश्यक नहीं है कि वह पीठ-स्थान का ही हो। पीठ स्थान, खालसा, थांभायत किसी स्थान का रामस्नेही साधु आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है। समिति के द्वारा निर्णय हो जाने पर निर्वाचित साधु को बारहद्वारी के ऊपर छात्रन्महल मे ले जाकर गद्दी या अलफी पर बैठा दिया जाता है। यही चुनाव की मूक घोषणा है। दूसरे दिन वह विधिवत आचार्य पद पर समासीन होता है।
‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय के पीठाचार्य की नियुक्ति में परम्परागत गुरु-शिष्य प्रणाली तथा निर्वाचन प्रणाली दोनों का प्रचलन पाया जाता है। दरिया साहब के बाद हरखाराम जी तथा हरखाराम जी के बाद रामकरण जी का पीठाचार्य के रूप में गद्दी संभालना गुरु-शिष्य परम्परा प्रणाली के उदाहरण है। तो भगवत दास, रामगोपाल एवं क्षमाराम जी जनतांत्रिक प्रणाली से चुने गये पीठाचार्य रहे। पुनः बलरामदास तथा वर्तमान पीठाचार्य श्री हरिनारायण शास्त्री जी गुरु-शिष्य परम्परा से पीठाचार्य पद पर सुशोभित हुए। यहाँ के पीठाचार्य की नियुक्ति में उदारता का व्यवहार किया जाता है और समयोचित किसी भी प्रकार की प्रणाली से पीठाचार्य को चुन लिया जाता है। थांभायतों के महन्तों तथा रामद्वारों में उत्तराधिकारी का चयन गुरु-शिष्य परम्परा द्वारा किया जाता है।

‘रेण’ रामस्नेही संतों के लक्षण :-

रामस्नेही सम्प्रदाय के तीनों शाखाओं के संतो ने रामस्नेहियों के लक्षणों एवं कर्त्तव्य-कर्मों का उल्लेख किया है। “दरियाव महाराज की अनुभव गिरा” नामक पुस्तक में दरिया साहब की दिव्यवाणी के आधार पर ‘रेण’ रामस्नेही संत के पन्द्रह लक्षणों का उल्लेख मिलता है। सर्वप्रथम निर्मल चित्त तथा राम से स्नेह होना उसकी पहली पहचान हैं एवं हृदय से कोमल, मुख से प्रेममय वाणी बोलने वाला, दर्शन से प्रसन्न होने वाला, श्रद्धापूर्वक नित्य नियम में रहने वाला, श्रद्धावान तथा दास्य भाव से युक्त होना रामस्नेही का लक्षण है। सत्य बोलना, गुरुप्रदत्त ज्ञान तथा भक्ति में तत्पर एवं देह, गेह आदि सम्पत्ति को भगवान को समप्रण करने वाला, वास्तव में मन, वचन और कर्म से और अभिमानियों से दूर रहने वाला रामस्नेही संत होता है।
रामस्नेही के लक्षणों में अंतरंग और बहिरंग दोनों प्रकार के लक्षण आ गये है। किन्तु फिर भी विशेष रूप से आचार-विचार रहन-सहन आदि का वर्णन भी दरियाव साहब और अन्य संतों की वाणियों में उपलब्ध होता है। रामस्नेही को अपना खान-पान और पहचान निर्मल रखने चाहिए। उसका भोजन सात्विक होना चाहिए तथा किसी प्रकार की हिंसा नहीं करनी चाहिए। पानी को छानकर पीना चाहिए तथा सभी जीवों पर दया रखनी चाहिए। ज्ञानपूर्वक विचार प्रकट करना आवश्यक है तथा असत्य किसी भी दशा में न बोले। श्रेष्ठ साधुजनों की संगति में रहना, अपने प्रण और व्रतों का दृढ़ता से निभाना, प्रेम एवं नेमसहित दास-भाव से तन-मन-धन का उपयोग करना रामस्नेही की पहचान है।
श्रद्धा से युक्त होना, राम-राम का सुमिरण करना, गुणग्राही एवं स्वयं गुणवान होना, अपनी देहादि को भगवान को समप्रित करना, अफीम, तम्बाकू, भांग, मद्य, माँस, द्यूतकर्म का त्याग करना तथा परस्त्री को माता समझना रामस्नेही का कर्त्तव्य है।

‘रेण’ रामस्नेहीयों की नैतिक नियमावली :-

‘रेण’ रामस्नेही सम्प्रदाय में ‘श्री रामस्नेही धर्म नियमेकादशी’ के रूप में ग्यारह नियमों का विधान पाया जाता है। जो निम्नानुसार है -

1. निर्गुण, निराकार, सच्चिदांनद श्रीराम का इष्ट रखना एवं उपासना करना।

2. गुरु वाणी, पूज्य ग्रंथ एवं वेद आदि का पठन, मनन एवं प्रचार करना।

3. सदगुरु और संतों के सम्पर्क में रहकर नित्य कर्यों का पालन करना।

4. साधु व्यवहार करना, हिंसा, असत्य से दूर रहकर सत्य धर्म पर चलना।

5. श्रीराम जी भोग लगाने के बाद ही प्रसाद को ग्रहण करना तथा अन्य आसुरी संपदा के देवों को न मानना।

6. दया, शील, संतोष, त्याग वैराग्य, सरल सात्विक वृत्ति सहित परोपकारी सत्य तथा मधुरभाषी रहना।

7. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, राग, द्वेष, निंदा, ईर्ष्यादि भावों को नष्ट करके अंतःकरण से मानापमान का त्याग करना।

8. नशीले वस्तुओं के सेवन से दूर रहना तथा मांस, मदिरा, जुआ आदि से दूर रहना और दुष्ट पुरूषों की संगत न करना।

9. जल छानकर पीना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, जीवमात्र की रक्षा करना तथा प्राणीमात्र को रामरूप समझना।

10. कपट, पक्षपात अभिमानादि से रहित साधुता, शांतिप्रिय, रामभक्ति परायण होना, निर्मल हृदय रखना एवं निजस्वरूप का यथार्थ बोध करना।

11. उस अखण्ड निर्विकार, अविनाशी, पूर्णव्यापक श्रीराम जी महाराज का अंतरंग वृत्ति से ध्यान समाधि एवं नाम जप करना तथा बाह्याडंबरों का परित्याग करना।

Source - Shodhganga की एक शोध से शैक्षिक प्रयोजन हेत साभार

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