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Koftgiri art of Rajasthan - राजस्थान की कोफ्तगिरी कला

कोफ़्तगिरी एक पारंपरिक शिल्प है जिसका अभ्यास वर्षों से मेवाड़ के विभिन्न जिलों में किया जाता रहा है। वर्तमान यह शिल्प जयपुर, अलवर और उदयपुर में दृष्टिगोचर होता है। जयपुर में, आयात-निर्यात बाजार में कोफ़्तगिरी शिल्प के आर्टिकल्स देखे जा सकते हैं जबकि, उदयपुर में इसके क्लस्टर पाए जाते हैं। अलवर के तलवारसाज लोग इस कला से जुड़े हुए हैं। उदयपुर के सिकलीगर लोग इस कला में महारत रखते हैं। कोफ़्तगिरी एक मौसमी शिल्प नहीं है, बल्कि एक बार किसी कलाकार को जब इसमें उचित गुणवत्ता हासिल हो जाती है तो उसके कोफ़्तगिरी के उत्पाद की अत्यधिक मांग हो जाती है, जो वर्षभर बनी रहती है।





कोफ़्त गिरी हथियारों को अलंकृत करने की कला है, जो भारत में मुगलों के प्रभाव के कारण उभरी थी। इसमें जडाव (इनले) और ओवरले दोनों प्रकार की कला का कार्य होता है। फौलाद अथवा लोहे पर सोने की सूक्ष्म कसीदाकारी कोफ्त गिरी कहलाती है। कोफ़्तगिरी शब्द लोहे को "पीट-पीट कर" उस पर किसी कलात्मक पैटर्न को उभारने की क्रिया को कहते हैं। यह एक ओवरले कला है जिसमे विशेष उपकरण द्वारा सोने / चांदी के तार को दबाकर जड़ा जाता है और फिर इसे गरम किया जाता है। यह किसी एक गहरे रंग की धातु पर हलके रंग की धातु को जड़ने की कला है, जिसमें लोह धातु की सतह को सोने या चांदी के पत्ते का प्रयोग करके गहनों जैसी एक सजावटी भव्यता प्रदान की जाती है। 
  • इस कलाशिल्प के लिए कोफ़्त शब्द प्रयुक्त किया गया है,
  • इसके कलाकार को कोफ़्तगर कहा जाता है और 
  • इस व्यवसाय को कोफ्तगिरी के नाम से जाना जाता है।

कोफ़्तगिरि रूपांकन में सोने और चांदी के तारों की कई प्रकार की पारंपरिक रेखाएं और वक्र होती हैं। कॉफ्टगिरि की विशेषता है कि इसमें पूरे अलंकृत डिजाइन को मुख्य रूप से तार द्वारा निर्मित किया जाता है। इसकी मुख्य सामग्री अजमेर और भीलवाड़ा से प्राप्त की जाती है और फिर आवश्यक उपकरणों का उपयोग करके वांछित अलंकृत रूपान्कनों को मेंन्युअल रूप से बनाया जाता है। चूंकि इस शिल्प में गहन श्रम लगता है, इसके उत्पादन में महिलाएं और पुरुष दोनों ही कार्य करते हैं। पुरुष भारी मैनुअल श्रम करते हैं जबकि महिलाएं सामान की प्रारंभिक तैयारी, अंतिम फिनिश और पैकेजिंग का कार्य करती हैं।

  • मुख्य रूप से कोफ्त गिरी शिल्प का इस्तेमाल ढाल, तलवारों व खंजर और अन्य उपयोगी सामग्री जैसे डिब्बे, बक्से, भोजन काटने और खाने के कटलरी सामान, शिकार चाकू, छुरी इत्यादि के निर्माण में किया जाता है।
  • इसमें कटार के विभिन्न जानवरों के सिर के आकार में सुंदर हैंडल बनाए जाते हैं। 
  • हथियारों के कवर पर शिकार के दृश्य उत्कीर्ण किये जाते हैं। 
  • पुराने कोफ्त्गीर कारीगरों में अरबी शब्दों को उत्कीर्ण करने में बहुत बढ़िया कौशल हासिल था। अरबी अक्षरों की वक्रता में परिशुद्धता की आवश्यकता होती है, वक्र में भिन्नता के कारण संदेश का अर्थ बदल सकता है।
लगभग सौ वर्ष उससे भी पहले कोफ़्त गिरि का व्यापक रूप से उपयोग गाड़िया-लोहार द्वारा अपने राजपूत ग्राहकों के लिए पारंपरिक हथियारों और कवच के निर्माण में किया जाता था। ये परंपरा अब अप्रचलित हो गई है।

Koftgiri is traditional craft as it is practiced in Mewar district since decades. This craft can be seen in Jaipur and Udaipur nowadays. In Jaipur, Koftgiri can be seen in the import-export market. Whereas, Udaipur, is where clusters are found where Koftgiri is practiced. Koftgiri is not a seasonal craft. Once a proper quality is achieved the product is highly sought after.


Koftgiri is a type of decoration originating in India with the Mughals as a means to decorate arms and weaponry. It can be both an inlay and overlay art. The word Koftgiri refers to the action of “beating” the pattern into the iron, an art of inlaying light metal on a dark one to provide a surface with an ornamental appearance with elaborate and lavish chiselling gold or silver leaf. For this craft the term Koft is applied, and the work-person is known as a Koftgar (really a glider) and the trade as Koftgari.





Koftgiri motifs are traditional with lots of lines and curves which is possible with the handling of Gold and Silver wire. The specialty of Koftgiris that the whole design is produced mainly by wire. Main materials are sourced from karkhanasat Ajmer and Bhilwara, and then manually created into desired forms using the essential tools. As this craft is labour intensive both women and men are involved in the process. While the women do the initial preparation of the material, final finish and packaging of the objects, the men do most of the heavy manual labour.


Primarily Koftgiri craft was used in creating handles of swords and daggers and articles of utility such as boxes, cutlery, hunting knives, etc. Until a hundred years or so ago, Koftgiri, was widely used by the Gadi-Lohars, the traditional armourers of Rajasthan, to create a range of weaponry and armour for the use of their Rajput clientele, the tradition has become obsolete now.
Source- http://plan.rajasthan.gov.in

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