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राजस्थान में शिबि जनपद -


मौर्य के बढ़ते हुए प्रभाव, सिकंदर के आक्रमण और इंडो-यूनानियों के आक्रमण से बाध्य होकर कई गण जातियाँ पंजाब छोड़कर राजस्थान आई थीं। उनमें से शिवि गण के लोग मेवाड़ के नगरी नामक स्थान पर राजस्थान में स्थानान्तरित हुए। काशीप्रसाद जायसवाल का मत है कि गण जातियों का पलायन उनका स्वतंत्रता के प्रति प्रेम को दर्शाता है। यूनानी क्लासिकल लेखकों, कर्टिअस, स्ट्रेबो तथा एरियन के अनुसार चौथी शताब्दी ई.पू. में सिकंदर के विदेश लौटते समय सिब्रोई (शिबि) जनजाति द्वारा उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया गया था। एरियन के अनुसार शिबिजन के निवासी वीर और साहसी थे। उनके पास 40 हजार पदाति तथा 3000 घुड़सवार सैनिक थे। वे जंगली जानवरों की खाल पहनते थे और उनके युद्ध पद्धति विचित्र थी। युद्ध में वे गदा और लाठियों का प्रयोग करते थे। क्लासिकल लेखकों के विवरण से तो ऐसा लगता है कि शिबि जाति के लोग असभ्य तथा बर्बर थे। संभवत: यह विवरण उनके पंजाब निवास का है, जबकि राजस्थान के शिबि सुसंस्कृत और संस्कार संपन्न थे। शिबि जाति का उल्लेख ऋग्वेद में अलिनो, पक्यो, भलानसो, और विषनियो के साथ आया है जिन्हें सुदास ने पराजित किया था। ऐतरेय ब्राह्मण में शिबि राजा अमित्रतनय का उल्लेख आया है । महात्मा बुद्ध (महाजनपद युग) के समय के सोलह महाजन पदों की सूची जो अंगुत्तरनिकाय में मिलती है उसमें शिबि जनपद का उल्लेख नहीं है परन्तु महावस्तु में बुद्ध ज्ञान को जिन देशों और जनपदों में वितरित किए जाने के बात कही गई है, उनमें शिवि देश सम्मिलित है। महावस्तु की सूची में गांधार और कंबोज जनपदो का नाम न देकर उसके जगह शिबि और दर्शाण का नाम मिलता है। विनयपिटक के अनुसार शिबि देश बहुमूल्य और सुन्दर दशालो के लिये प्रसिद्ध था। अवंती नरेश चंडप्रद्योत ने शिबि देश का एक दशाले का जोड़ा वैद्य जीवक को भेंट किया था और उसने उसे भगवान् बुद्ध को अर्पित कर दिया। उम्मदंती जातक से ज्ञात होता है कि शिबियों के राज्य में 'शिबि धर्म' नामक नैतिक विधान प्रचलित था जिसका पालन करना राज्य के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य था। शिबि जातक, उम्मदंती जातक और वेसंतर जातक में शिबि देश तथा उसके राजाओं का वर्णन मिलता है।


मध्यमिका में भी था शिबि जनपद

पाणिनि ने उशीनर का बाहीक जनपद नाम से उल्लेख किया है । उसने शिबि का कहीं उल्लेख नहीं किया है। संभवत: बाद में उशीनर शिबि कहे जाने लगे महाभारत के वन पर्व में शिबि राष्ट्र और उसके राजा उशीनर का उल्लेख मिलता है। नन्दलाल डे ने महाभारत के इस शिबि राज्य को स्वात घाटी में स्थित बतलाया है। महाभारत में शिबि औशीनर की बाज हेतु बलिदान के कथा बड़ी लोकप्रिय है। फाहियान के अनुसार यह घटना उद्यान के दक्षिण या आधुनिक स्वात घाटी में घटी थी। महाभारत में बली शिबि राजा की कथा शिबि जातक में मिलती है। इस प्रकार पालि साहित्य के शिबि देश के राजधानी स्वात घाटी मानकर उसे वर्तमान सीवी (विलोचिस्तान) के आसपास माना जा सकता है या पश्चिमी पंजाब के शेरकोट के आसपास का प्रदेश और उसके राजधानी अरिथपुर मान सकते हैं। लेकिन वेसंतर जातक में जेतुतर को शिबि राज्य के राजधानी बतलाया गया है। यह बुद्धकालीन 20 बड़े नगरों में एक नगर था। वेसंतर जातक में जेतुतर को चेतरठ के मातुल नगर से 30 योजन के दूरी पर बताया गया है। नन्दलाल डे ने जेतुतर को आधुनिक चित्तौड़ से 11 मील उत्तर में स्थित नगरी नामक स्थान से अभिन्न माना है। अलबरुनी ने जिस जत्तरूर या जत्तरौर का उल्लेख किया है वह कुछ विद्वानो के अनुसार जेत्ततुर ही है। यह संभावना है कि बुद्धकालीन जेत्रातर से बिगडकर वर्तमान चित्तौड़ बना हो। नगरी में बहुत-सी ताम्र मुद्राएँ मिली है जिन पर 'मज्जिमिका य सिवि जनपदस' लिखा हुआ है। इससे स्पष्ट है कि चितौड़ के समीप मध्यमिका में भी शिबि लोगों का जनपद था। अत: जिस शिबि राज्य के राजधानी वेसंतर जातक में जेतुतर नामक नगरी बतलाई गई है, उसे भरतसिंह उपाध्याय (बुद्धकालीन भारतीय भूगोल) ने चित्तौड़ (राजस्थान) के आसपास का क्षेत्र माना है। इस प्रकार पालि साहित्य के आधार पर हमें शिबि लोगों के दो निवास स्थान मानने पड़ेंगे, एक स्वात घाटी में और दूसरा चितौड़ के आसपास। दशकुमारचरित से ज्ञात होता है कि शिबि जाति का एक जनपद दक्षिण में कावेरी नदी के तट पर भी स्थित था।



महाभारत में शिबियों के पंजाब से राजस्थान स्थानानान्तरित होने का प्रमाण उपलब्ध है। सभापर्व में शिबि, मालव और त्रिगर्त का एक स्थान पर मरू (राजस्थान) क्षेत्र में उल्लेख आया है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिबि गण मध्यमिका में महात्मा बुद्ध के समय विद्यमान था। 200 ई.पू. से 200 ई. के मध्य वहाँ लोग पंजाब से आए होंगे। शिबि जाति का राजस्थान में पदार्पण सिकंदर के आक्रमण के बाद न होकर इंडो-यूनानी आक्रमण के पश्चात् होना अधिक तर्कपूर्ण है। पुष्यमित्र शुंग द्वारा इंडो-यूनानी आक्रमण के बाद शिवि जाति लगभग 187 ई.पू. मध्यमिका में आकर पूर्णतया बस गई होगी। इसकी पुष्टि उनकी मुद्राओं से होती है। 

सिक्कों से संकेत -

प्रसिद्ध विद्वान एच.डी. सांकलिया ने नगरी से शिबिगण के 16 सिक्के एकत्रित किए थे, जिससे संकेत प्राप्त होता है कि यह क्षेत्र शिबिगण के अंतर्गत था। शिबियों की मुद्राओं का श्रीमती शोभना गोखले तथा एस.जे. मंगलम् ने अध्ययन किया था। शिबि-मुद्राओं पर सामान्य रूप से स्वस्तिक का वृषभ के साथ संयुक्त रूप से अंकन उसके चारों कोनो पर हुआ है। इन मुद्राओं पर वृक्ष का अंकन भी मिलता है। वृक्ष पूर्ण चक्र में उत्पन्न होता हुआ प्रदर्शित किया गया है। सिक्के के अग्रभाग पर अर्द्ध वर्तुलाकार उपाख्यान उत्कीर्ण है और छ: मेहराब युक्त पहाड़ के चिह्न का भी अंकन है। कुछ सिक्कों पर पहाड़ी संरचना के ऊपर अलंकरण युक्त नंदीपद है तथा पहाडी के नीचे नदी का अंकन सिक्कों के पृष्ठ भाग पर किया गया है। वृक्ष अंकन की परंपरा शिबिगण के सिक्कों में अन्य गणों के सिक्कों से भिन्न है। अन्य गणों के सिक्कों में 'ट्री इन रेलिंग' के विपरीत शिबि गण के सिक्के में वृक्ष वृत्ताकार या चक्राकार रचना के ऊपर अथवा उसमें से उत्पन्न होते हुए दिखलाया गया है।



सांकलिया को प्राप्त सिक्कों में से एक सिक्के पर वृक्ष का चित्र नहीं है तथा उसके पृष्ठ भाग पर कोई अंकन नहीं है। इस पर केवल उपाख्यान ही अंकित किया गया है। इसी प्रकार यहाँ से प्राप्त एक अन्य सिक्के के अग्रभाग पर सामान्य रूप से अंकित आठ या दस शाखाओं के वृक्ष और वृषभयुक्त स्वस्तिक के स्थान पर केवल वृक्ष की छोटी-सी शाखा ही उत्कीर्ण है। इसमें कोई वर्तुलाकार संरचना भी नहीं है। वृषभ युक्त स्वस्तिक या वृषभ युक्त क्रॉस की संख्या शिबिगण के मुद्राओं के विशेषता थी। कनिंघम छ: मेहराब युक्त पहाड को जो एक विस्तृत नंदीपद से ढका हुआ है, उसे धर्मचक्र मानते है। रोशनलाल सागर शिबिगण के प्राप्त सिक्के पर नंदीपद के आधार पर विद्वान शिबियों को शैव धर्मावलंबी मानते है। पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों को देखने से ऐसा लगता है कि मेहराब, पहाड, नदी का अंकन मानो उन्होंने शिबियों के नकल करके किया था।


शिबियो की मुद्राओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि-


(1) सभी मुद्राएँ 1.5 सेमी. से 200 से.मी. व्यास की है।

(2) इनकी मोटाई 0.1 सेमी. से 0.3 से.मी. के मध्य है।

(3) इनका भार 1.865 ग्राम से 6.442 ग्राम के मध्य है।

(4) इनके अग्रभाग पर (10 सिक्कों पर) स्वस्तिक चिह्न, 15 पर वृषभ अंकन, 16 पर वृक्ष का अंकन है। 

इन सिक्कों पर उपाख्यान शिबि, शिबिजनपदस्य, झामिकया, शिबिजा मझमिकय शिबिज उत्कीर्ण किया गया है। 13 सिक्कों पर मेहराब, पहाडी, नदी का अंकन है। एक सिक्के के पृष्ठ भाग पर रुभयुक्त स्वस्तिक चिह्न है। पाँच सिक्के दूषित या बिगड़े हुए हैं।



शिबियों के सिक्कों के भार में अंतर बतलाता है कि मुद्रा निर्माण पर कोई केन्द्रीय नियंत्रण नहीं था। कुछ सिक्के घिस गए तो भी चलन में थे जो मुद्रास्फीति फैलने का प्रमाण है। नगरी (चितौड़) से एक अभिलेख मिला था जिसे 200 ई.पू. से 150 ई.पू. का माना जाता है। इस अभिलेख के अनुसार एक पाराशर गौत्रीय महिला के पुत्र गज ने पूजा शिला-प्राकार का नारायण वाटिका में संकर्षण और वासुदेव की पूजा के लिए निर्माण करवाया था। नगरी के ही हाथी बाडा के ब्राह्मी अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रस्तर के चारों ओर दीवार का निर्माण नारायण वाटिका में संकर्षण और वासुदेव की पूजा के लिए सर्वतात जो गाजायन पाराशर गौत्रीय महिला का पुत्र था, ने बनवाया तथा उसने अश्वमेघ यज्ञ भी किया। डी.आर. भंडारकर के अनुसार उपयुक्त अभिलेख से सिद्ध होता है कि दक्षिणी राजस्थान में उन दिनों भागवत धर्म प्रचलित था।

वासुदेव कृष्ण का अब नारायण से तादात्मय स्थापित हो चुका था। इस प्रकार लगभग 200 ई.पू. से 100 ई.पू. के मध्य मध्यमिका क्षेत्र, जो शिबिगण के अधीन था, वहाँ संकर्षण और वासुदेव की पूजा प्रचलित थी। इसके पश्चात् शिबियों का विवरण वृहद् संहिता तथा दशकुमारचरित तथा दक्षिण भारत के अभिलेखों में मिलता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि 200 ई.पू. शिबियो का नगरी पर अधिकार था। बाद में वहाँ पश्चिमी क्षत्रपों के उत्थान के बाद वे लगभग 200 ई. के आसपास नगरी से भी पलायन करके दक्षिणी भारत में चले गए होंगे।

 





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