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भूकंप से संबंधित मुख्य तथ्य-
भूकम्प पृथ्वी के आन्तरिक भागों में विवर्तनिक घटनाओं एवं तापीय दशाओं में परिवर्तन से उत्पन्न होते हैं
प्रतिवर्ष पृथ्वी पर लगभग 80 हज़ार भूकम्प आते हैं।
प्लेट विवर्तन सिद्धांत के माध्यम से भूकम्पों के उत्पन्न होने की सम्पूर्ण प्रक्रिया की भली-भांति व्याख्या संभव हो सकी है।
धरातलीय सतह के जिस भाग पर सबसे पहले भूकम्पीय तरंगों को अंकित किया जाता है, उसे इपीसेन्टर कहते हैं।
भूकम्प का अभिलेखन सीस्मोग्राफ द्वारा करते हैं।
भूकम्प की तीव्रता एवं परिमाण का मापन रिक्टर स्केल द्वारा करते हैं।
रिक्टर स्केल की रचना चार्ल्स एफ. रिक्टर ने की थी।
रिक्टर स्केल पर अंकित अंक 0 से 9 के बीच होते हैं।
रिक्टर स्केल का मापक लघुगणकीय (लोग्रिथिमिक) होता है।
रिक्टर स्केल की रचना सन् 1935 में हुई थी।
रिक्टर स्केल पर 8 या इससे ऊपर के परिमाप के भूकम्प से सर्वनाश हो जाता है
भारत के भूकम्पीय इतिहास में 21वीं सदी में आया प्रथम विनाशकारी भूकम्प 'भुज का भूकम्प' था
भुज का भूकम्प 26 जनवरी 2001 को आया था।
भुज (गुजरात) भूकम्प का इपीसेन्टर भुज शहर के पास था।
भुज भूकम्प में अनुमानतः एक लाख लोग मारे गये थे
भुज के भूकम्प में अंजार एवं भचाऊ नामक दो कस्बे पूरी तरह नष्ट हो गये।
भुज के भूकम्प का रिक्टर पैमाने पर परिमाण 8.1 था।
भूकम्पों की तीव्रता एवं परिमाण मापन का एक अन्य मापक मरकेल स्केल है।
मरकेली स्केल पर 1 से 12 तक अंक अंकित होते हैं।
मरकेली स्केल पर 'एक'  इकाई पर निर्युक्त ऊर्जा 3×1012 अर्ग होती है
सर्वनाश करने वाले भूकम्प में निर्मुक्त ऊर्जा लगभग 1025 अर्ग होती है
भूकम्प उत्पत्ति के केन्द्र को उसका फोकस कहते हैं
फोकस के ठीक ऊपर स्थित बिन्दु को इपीसेन्टर कहते हैं।
भूकम्प से प्रभावित क्षेत्रों में फोकस से सर्वाधिक करीब इपीसेन्टर बिन्दु होता है
भूकम्प के इपीसेन्टर बिन्दु पर तरंगों की तीव्रता सर्वाधिक होती है
फोकस सदा सदैव धरातलीय सतह के नीचे पाया जाता है।
अत्यधिक गहरे भूकम्पों के फोकस लगभग 700 किमी गहराई पर होते हैं।
सामान्य भूकम्प के फोकस साधारणतः  50 किमी. तक गहराई पर होते हैं
प्लूटॉनिक भूकम्पों के फोकस 250 किमी. से 700 किमी. तक गहराई पर पाये जाते हैं
फोकस से उत्पन्न होकर भूकम्पीय तरंगें चारों ओर अग्रसर होती हैं।
हिमालय क्षेत्र के प्रमुख भूकम्पों के फोकस लगभग 20 से 30 किमी गहराई तक पाए जाते हैं।
विश्व भूकम्पों की 3 मेखलायें पाई जाती हैं
विश्व भूकम्पों की तीनों भूकम्प मेखलाओं के नाम है - परिप्रशांत मेखला, मध्य महाद्वीपीय मेखला तथा मध्य अटलांटिक मेखला
सर्वाधिक विनाशकारी भूकम्प अभिसारी प्लेट किनारों के सहारे पाए जाते हैं।
भूकम्पीय तरंगें 3 प्रकार की होती हैं- P, S एवं L  तरंग
P तरंग का अर्थ प्राथमिक तरंग (Primary waves) है।
P तरंग ध्वनि की लहर के समान तरंगें होती हैं।
P- भूकम्पीय तरंगों को 'अनुदैर्ध्य तरंग' भी कहा जाता है क्योंकि इन तरंगों के कम्पनों की दिशा तरंग की गति की दिशा में ही होती है।
S तरंग का अर्थ द्वितीयक तरंग (Secondary waves) है।
L तरंग का अर्थ अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudnal waves) है।
L  तरंग केवल सतह पर गमन करने वाली भूकम्पीय तरंग है
P तरंग सर्वाधिक वेगवान भूकम्पीय लहर होती है। इनकी औसत गति 8  किमी/सेकंड होती है।
भूकम्पीय S-तरंग की गति जल तरंगों के समान होती है।
S-  भूकम्पीय तरंगों के कम्पनों की दिशा तरंग की गति की दिशा के समकोण पर होती है। अतः इन तरंगों को 'अनुप्रस्थ तरंग' भी कहते हैं।
भूकम्पीय L  तरंग की गति सबसे कम होती है। इन तरंगों की औसत गति 3  किमी/सेकंड होती है
भूकम्पीय L  तरंग सर्वाधिक भयंकर होती है।
P तरंग पृथ्वी के ठोस भाग में अत्यधिक गति से प्रवाहित होने वाली तरंग है।
S-तरंगें तरल भाग (सागरीय भाग) में लुप्त हो जाती हैं।
L - तरंगों को सर्वाधिक लम्बा मार्ग तय करना पड़ता है
L - तरंगों की विनाशलीला जल-थल दोनों जगह होती है।
P-तरंगें सबसे पहले धरातल पर पहुंचती हैं
P- भूकम्पीय तरंगें पृथ्वी के प्रत्येक भाग में गमन करती हैं।
P- भूकम्पीय तरंगों को 'अनुदैर्ध्य तरंग' भी कहा जाता है
इपीसेन्टर से 120° कोण पर S- तरंगें लुप्त हो जाती हैं।
भारत मध्य महाद्वीपीय भूकम्प पेटी में पड़ता है।
विश्व के लगभग 21 प्रतिशत भूकम्प मध्य महाद्वीपीय पेटी में आते हैं
क्षति जोखिम के परिमाण के आधार पर भारत को 5 भूकम्प जोन (क्षेत्रों) में बांटा गया है
इन क्षेत्रों में अत्यधिक क्षति जोखिम वाला जोन 'पंचम जोन' है
पंचम ज़ोन में प्रमुखतः उत्तर व पूर्वोत्तर भारत के पर्वतीय भू-भाग से लगे क्षेत्र एवं  कच्छ क्षेत्र के भू-भाग शामिल हैं।
गंगा का मैदान प्रमुखतः प्रथम भूकम्पीय ज़ोन में आता है।
हिमालय क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा भूकम्प क्षेत्र है।
हिमालय क्षेत्र के भूकम्प एशियन एवं भारतीय प्लेटों के टकराव के प्रतिफल हैं।
जनहानि की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा भूकम्प सन् 1737 का कोलकाता भूकम्प था।
सन् 1737 के कोलकाता के भूकम्प में लगभग 3 लाख लोग मारे गये थे।
भारत में अब तक सर्वाधिक तीव्रता का भूकम्प सन् 1887 में शिलांग में रिकॉर्ड किया गया है
सन् 1887 के शिलांग भूकम्प की रिक्टर स्केल पर तीव्रता 8.7 थी
भारत में बीसवीं शताब्दी में सर्वाधिक तीव्रता का भूकम्प 1905 में कांगड़ा घाटी में आया था।
कांगड़ा घाटी भूकम्प की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.6 मापी गयी थी।
भूकम्पीय तरंगों की गति तथा भ्रमण पथ के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
एक ही स्वभाव वाले ठोस धरातलीय भाग में भूकम्पीय तरंगों की प्रकृति सीधी होती है।
पृथ्वी के भीतर तरंगें वक्राकार मार्ग का अनुसरण करती हैं, इससे पता चलता है कि पृथ्वी के भीतर घनत्व में भिन्नता है।
भूकम्पीय प्रमाणों के आधार पर पता चलता है कि पृथ्वी का क्रोड तरल अवस्था में है।
पृथ्वी का क्रोड लोहा व  निकल धातुओं से बना है।
धरातल से अत्यधिक गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकम्पों को प्लूटॉनिक भूकम्प कहते हैं।
जब भूकम्प का उद्भव प्राकृतिक कारणों से होता है, तो उसे प्राकृतिक भूकम्प कहते हैं।
जब भूकम्प के मूल सागरीय भाग के भूगर्भ में होते हैं, तो उन्हें सागरीय भूकम्प कहते हैं।
सागरीय भूकम्पों द्वारा उत्पन्न होने वाली विशाल विनाशकारी समुद्री लहरों को सुनामी कहा जाता है।
महासागरीय भूकम्प से उत्पन्न 'सुनामी' शब्द जापानी भाषा का शब्द है।
प्रमुख भूकम्पीय व ज्वालामुखीय मेखला के कारण प्रशांत महासागरीय तट पर सुनामी का सर्वाधिक ज़ोर रहता है।
अटलांटिक महासागरीय तट पर सुनामी का सबसे कम ज़ोर रहता है।
26 दिसम्बर 2004 में आए विनाशकारी भूकम्प व सुनामी का केन्द्र एसेह प्रांत (इण्डोनशिया) था।
सुनामी की पूर्व सूचना हेतु स्थापित 'प्रशान्त सुनामी चेतावनी केन्द्र' हवाई द्वीप पर स्थित है
भारत ने अपना प्रथम सुनामी चेतावनी केन्द्र हैदराबाद में स्थापित किया था, जिसने 1 अक्तूबर 2007 से कार्य करना प्रारम्भ किया। यह सुनामी चेतावनी केन्द्र हिन्द महासागर में उत्पन्न होने वाले सुनामी की आशंका का  30 मिनट की अवधि के अन्दर संकेत देगा।
भूकम्प विज्ञानियों द्वारा विश्व में 1961 से 1967 के मध्य की अवधि में आये भूकम्प के आधार पर भूकम्प वितरण मानचित्र तैयार किया है।
भारतीय मौसम विभाग भूकम्प के परिमाण के मापन के लिए बॉडी तरंग विधि का प्रयोग करता है।
विश्व में अत्यधिक भूकम्प वाला देश जापान है।
अत्यधिक भूकम्पों के कारण जापान में मकान लकड़ी व दफ्ती के बनाए  जाते हैं।
जापान में प्रतिवर्ष लगभग 1500 भूकम्प के झटके महसूस किये जाते हैं
विश्व के लगभग दो तिहाई भूकम्प प्रशांत महासागर तटीय क्षेत्र में आते हैं।
भारत में भूकम्पलेखी यंत्र दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, पुणे एवं देहरादून आदि प्रमुख शहरों में लगे हैं।
भूकम्पीय तरंगों द्वारा उत्पन्न समान आघात क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा को  आइसोसिस्मल रेखा कहते हैं।

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