3/31/2014 05:43:00 pm
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        भारत में लघु चित्रकारी कला या मिनीएचर आर्ट का प्रारम्‍भ मुगलों द्वारा किया गया जो मुगल शैली के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस प्रसिद्ध कला को फ़राज (पर्शिया या ईरान) से लेकर आया जाना माना जाता है। सर्वप्रथम मुगल शासक हुमायूं ने फ़राज से लघु चित्रकारी में विशेषज्ञ कलाकारों को बुलवाया था। उनके उत्तराधिकारी मुगल बादशाह अकबर ने इस भव्‍य कला को बढ़ावा देने के लिए एक शिल्‍पशाला भी बनवाई थी। इन कलाकारों ने भारतीय कलाकारों को इस कला का प्रशिक्षण दिया जिन्‍होंने मुगलों के राजसी जीवन-शैली से प्रभावित होकर एक नई तरह की शैली के चित्र तैयार किए।


     मुगल शैली के चित्रकारों को बादशाह जहाँगीर एवं शाहजहाँ ने भी भरपूर प्रश्रय दिया। भारतीय कलाकारों द्वारा इस खास शैली में तैयार किए गए लघु चित्रों की राजपूत अथवा राजस्‍थानी लघु चित्रशैली कहा जाता है। मुगलकाल में राजस्थान में इस चित्रकला के कई स्कूल प्रारंभ हुए। भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक एवं शैलीगत विशेषताओं के आधार पर इन स्कूलों को निम्नांकित चार भागों में विभाजित किया जाता है-


1. मेवाड़ स्कूल-


चावंड, उदयपुर, नाथद्वारा, देवगढ़, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, शाहपुरा व सांवर आदि शैलियाँ एवं उप शैलियाँ।


2. मारवाड़ स्कूल-

जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर, पाली, अजमेर, किशनगढ़ आदि शैलियाँ एवं उप शैलियाँ।

3. हाड़ौती स्कूल-

बूँदी, कोटा, झालावाड़ आदि शैलियाँ एवं उप शैलियाँ।

4. ढूंढाड़ स्कूल-

आमेर, जयपुर, शेखावटी, अलवर, टौंक, उनियारा, भरतपुर, धौलपुर, करौली आदि शैलियाँ एवं उप शैलियाँ।

इस चित्रकारी में हर पहलू का अत्यंत सावधानी के साथ बारीकी से चित्रण किया जाता है। इसमें आवश्यकतानुसार मोटी व बारीक रेखाओं से बनाए गए चित्रों को बड़े सुनि‍योजित ढंग से गहरे रंगों से सजाया जाता है। इसमें चित्रांकन के लिए कागज़, हाथीदाँत (आइवरी), लकड़ी की तख्तियों (पट्टियों), चमड़े, संगमरमर, कपड़े या दीवारों का प्रयोग किया जाता हैं। इसमें प्रयोग किए जाने वाले रंग खनिज़ों, सब्जियों, कीमती पत्‍थरों तथा विशुद्ध चांदी व सोने से बनाए जाते हैं। रंगों को तैयार करना और उनका मिश्रण करना एक बड़ी लंबी प्रक्रिया है। इसमें कई सप्‍ताह लग जाते हैं और कई बार तो महीने भी लग जाते हैं। चित्रांकन के लिए बहुत उत्तम किस्‍म की कलमों (ब्रुशों) की आवश्यकता होती है और बहुत अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त करने के लिए तो ब्रुश आज भी, गिलहरी के बालों से बनाए जाते हैं। इस पारम्‍परिक चित्रशैली में राजदरबार और राजाओं के शिकार के दृश्‍यों का चित्रण किया जाता है। इसके अलावा कृष्ण की लीला व राजाओं के प्रणय चित्र भी बनाए गए हैं। राजस्थान में लघु चित्रकारों ने रामायण, महाभारत, भागवत पुराण, रसिकप्रिया, रागमाला, रागमंजरी ग्रंथों के अलावा जैन व बुद्ध धर्म के सिद्धांतों एवं घटनाओं को चित्रण का आधार बनाया है। इनमें महलों, बाग बगीचों व जंगल का बारीकी से चित्रण किया जाता है। इन चित्रों में पौधों, फूलों, पशु-पक्षियों की आकृतियों को भी बार-बार अत्यंत मनोहारी ढंग से चित्रित किया जाता है।

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