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भौगोलिक स्थिति-


जोधपुर जिला राजस्थान के पश्चिमी भाग में 260'' से 27 37'' उत्तरी अक्षांश एवं 72 55'' से 73 52'' पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। जिला 197 किमी. उत्तर से दक्षिण तथा 208 किमी. पूर्व से पश्चिम की ओर फैला हुआ है। जिले का क्षेत्रफल 22850 वर्ग किमी. है। यहां छः अन्य जिलों की सीमाएं इससे लगती है। इसके उत्तर में बीकानेर व जैसलमेर, दक्षिण में बाड़मेर, जालोर व पाली और पूर्व में नागौर व पाली जिले हैं। पश्चिम में इसकी सीमा जैसलमेर जिले से होती हुई पाकिस्तान की सीमा तक जाती है। जोधपुर जिला समुद्र तल से 250-300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।




स्थलाकृति

यह जिला राजस्थान राज्य के शुष्क क्षेत्र में आता है। यह राज्य के शुष्क क्षेत्र के कुल क्षेत्रफल का 11.60 प्रतिशत है। भारत में थार रेगिस्तान के कुछ क्षेत्र इस जिले के भीतर आते हैं। इसके इलाके का सामान्य ढलान पश्चिम की ओर है। गर्मियों में अत्यधिक गर्मी और सर्दियों में अत्यधिक ठंड रेगिस्तान की विशेषता है और जोधपुर भी इसका अपवाद नहीं है। जिले में कोई बारहमासी नदी नहीं है। हालाँकि लूनी और मीठड़ी नदी जिले की महत्वपूर्ण नदियाँ हैं, जिनका आधार खारा पानी है। वर्षा जल के अलावा यहां सिंचाई के मुख्य स्रोत कुएँ और नलकूप हैं। जिले में सर्वाधिक सिंचित क्षेत्र बिलाड़ा तहसील में है और उसके बाद भोपालगढ़ और ओसियां तहसील है।

जिले की मिट्टी को मुख्य रूप से रेतीले और दोमट के रूप में वर्गीकृत किया गया है। जोधपुर में जिले के कई हिस्सों में उत्कृष्ट भूजल उपलब्ध है। खरीफ मौसम में बाजरा (मोती बाजरा) प्रमुख फसल है। रबी में गेहूं, दालें और जीरा, धनिया और लाल मिर्च जैसे कई प्रकार के मसाले भी उगाए जाते हैं। जोधपुर अपनी लाल मिर्च, प्याज और लहसुन के लिए भी जाना जाता है। यह जिला ग्वार के प्रमुख उत्पादन केंद्रों में से भी एक है। 

जिले के प्रमुख और महत्वपूर्ण खनिज बलुआ पत्थर और चूना पत्थर हैं। जिले के हलके पीले रंग और लाल रंग के बलुआ पत्थर बहुत लोकप्रिय है और यह यहाँ बहुतायत में पाया है। इसके अलावा जिले में इमारती पत्थर (खण्डे), पत्थर की पट्टी और शिलापट्ट का नियमित आधार पर खनन होता हैं। यहाँ विभिन्न रंगों की मिट्टी (क्ले) तथा डोलोमाइट व क्वार्ट्ज जैसे खनिज भी उपलब्ध हैं।

जिले में शुष्क जलवायु के कारण भूउपयोग के कुल रिपोर्टिंग क्षेत्र का नगण्य प्रतिशत वनों से आच्छादित है। केवल रेतीली मिट्टी होने के कारण, जिले के वन क्षेत्रों में वनस्पति की कांटेदार झाड़ियाँ ही पाई जाती हैं। पेड़ों की मुख्य प्रजातियाँ कुमट, कैर, खेजड़ी, बबूल, बेर, जल खार, पीलू आदि तथा फल देने वाले पेड़ अनार व अमरूद हैं। जिले के जीवों में सियार, जंगली बिल्ली, भारतीय लोमड़ी, काला हिरण, चिंकारा, खरगोश आदि हैं। आमतौर पर पाए जाने वाले पक्षी बया, कोयल, तोता, गिद्ध, चील, जंगली कौवा, बुलबुल, गोरैया, रेगिस्तानी मुर्गा, बटेर, भूरा तीतर, छोटा बगुला, आदि हैं।


जलवायु, तापमान और वर्षा -


जोधपुर की जलवायु सामान्यतः गर्म और शुष्क है, लेकिन जून के अंत से सितंबर तक बारिश का  मौसम रहता है। यद्यपि औसत वर्षा लगभग 360 मिलीमीटर (14 इंच) है, यह असाधारण रूप से परिवर्तनशील है। गर्मियों में तापमान 49 डिग्री से लेकर सर्दियों में 1 डिग्री तक होता है। सैंडस्टॉर्म (andhi) भारत के अन्य क्षेत्रों के लोगों के लिए एक तमाशा है। यहां बारिश के दिन एक वर्ष में अधिकतम 15 तक ही सीमित होते हैं। मॉनसून की बारिश के दिनों के घने बादल की अवधि को छोड़ कर मार्च से अक्टूबर तक की अवधि में तापमान चरम पर होता है। हालांकि, भारी बारिश की अवधि के दौरान, आमतौर पर आर्द्रता कम हो जाती है और यह गर्मी से सामान्य असुविधा बढ़ाती है।


वन, वनस्पति और जीव -


जिले में कुल उपयोग की 6948 हेक्टेयर भूमि का केवल 1999-2000 हेक्टेयर वनों से आच्छादित है। वन क्षेत्र पहाड़ियों के आसपास है और इसे झाड़ीदार वन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। जिले की रेतीली मिट्टी और शुष्क जलवायु के कारण, जिले के वन क्षेत्रों में केवल झाड़ियाँ और कांटेदार वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। यहां पेड़ पौधों की पाई  जाने  वाली  मुख्य प्रजातियां विलायती  खेजड़ा  (प्रोसोपिस  जूली फ्लोरा),  कुमट  (ऐकेसिया  येनेगल),  केर  (कैपेरिस डेंसिडउआ), खेजड़ी (प्रोसोपिस स्थिसिजेरा), बबूल (ऐकेसिया अरेविका), बैर (जीजीफा जुजुआ), बुखन (मार्किन्सोनिया एक्यूलिएटा), ढाक (न्यूटिया जोनोरूपाना), हिंगोटा (बेजेना ईटीज/एजिप्सऐका), जलखारा तथा पीलू (सेल्वाडोरा ओलियान्डेज एण्ड पर्सिक), जंगली जलेबी (झंगडूलिअस), पापड़ी अथवा विरोल (होलोटेलिया इंटग्रकोलिया), नीम (एजेडिरेक्टाइंडिका), सरेस काला (एज्बीजिया लेम्बेक  तथा रोहिड़ा (टेकोर्पेला अंडुलाला) शामिल है। फल और पौधों में अनार तथा आम पर्याप्त संख्या में लगाये जाते हैं। यहां खीरा, ककड़ी आदि की बेले भी लगाई जाती है।


जिले में उगने वाली प्रमुख झाड़िया तथा जड़ी बूटियां निम्नलिखित हैं:- 

आक  (बिेलोट्रोपिल  प्रोसेरा),  थोब  (यूकोरिया  निव्यूलिया),  झाड़बेर  (विजीप्सनम  मोराटोअसा),  खीप्रा  (लेप्टाडेनिया पायरोटेक्विका), नागफनी पेड़ (ओपेटिया डिलेन फोक/केलीग्रोनम पोलीमोनाइडस), सेजणा (कोटोलेरिया बरिया) तथा रूई (एरना डोमेटोसा)। 

इस क्षेत्र में पाई जाने वाली घास की प्रमुख किस्में हैं- 

अंजन तथा धावण (फेंकल सेंटीग्रेटस), करड़ डिंकथिम सेनुलेटस), ग्रामना (पेनिकल एंरिडोटेल), मूंज (ऐकेरम ग्रिफिमथी), तांतीया (इलेसिने फलगलिफेरा) तथा गंथिया (डैस्टीलोक्टेनिअस सिंडिकम) प्रमुख है। जिले मेंकोई बड़ा वन्य जीव अभ्यारण नहीं है। 

जिले में पाये जाने वाले जंगली पशुओं में प्रमुख हैं:- 

गीदड़ (जेकाल), जंगली बिल्ली (वाईल्डकेट), लोमड़ी (फोक्स),  नील गाय हिरण (डीयर), चिंकारा भारतीय  बारहसिंगा (स्टेग), खरगोश (डेयर), जंगली चूहा (वाइल्ड माऊस), सामान्य लंगूर (एप) तथा नेवला (मोंगूअ)।


जिले में पाये जाने वाले पक्षियों  में प्रमुख हैः- 

बया (वीवर बर्ड), कोयल (कुक्कु), तोता (पेरट), गिद्ध (वल्चर), जंगली कोआ (वाइल्ड क्रो), बुलबुल (नाइटिंगल), उल्लू (ओवल), चील (काईट), हरे कबूतर (ग्रीन पीजन), सामान्य कबूतर (पिजन),सेंड ग्राउस,  फीफाईल, मोर (पिकोक), बटेर (क्वेज) व जंगली बटेर- काला तीतर (ब्लेक पारटिज),  भूरा  तीतर  (ब्राउन  पारटीज),  सारस  (क्रेन),  टिटहरी,  लिटर  इंग्रेल,  ब्लाक  (फलेमिगों),  छोटी  बतख (मामनटोल), चाहा पक्षी (स्पस) तथा गोडावन प्रमुख है। जिले में रेंगने वाले कीड़ों में छिपकली (लिजार्ड) तथा सांप (स्नेक) महत्वपूर्ण हैं।

 

जोधपुर जिले में माचिया सफारी पार्क नामक मृगवन है जिसकी स्थापना 1985 में की गई थी। यह देश का प्रथम राष्ट्रीय वानस्पतिक उद्यान है। खेजड़ली गांव में विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के लोगों द्वारा राज्‍यवृक्ष खेजड़ी की रक्षा हेतु प्राण न्‍यौछावर कर दिया गया था।


जोधपुर के खेजड़ली ग्राम में 1730 ई. में खेजड़ी वृक्षों को बचाने के लिए अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों के साथ अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। इनकी याद में विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भाद्रपद शुक्ल दशमी को खेजड़ली ग्राम में लगता है, जबकि खेजड़ी दिवस 12 सितम्बर को मनाया जाता है। अमृता देवी के बलिदान को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने राजस्थान में अमृता देवी विश्नोई पुरस्कार की शुरुआत 1994 में की जिसका प्रथम पुरस्कार गंगा विश्नाई को प्राप्त हुआ था। राज्य में जीवों की रक्षार्थ पहला बलिदान सन् 1604 में जोधपुर रियासत के रामसड़ी ग्राम में गौरा व कर्मा ने दिया। अमृतादेवी के सम्मान में ही जोधपुर जिले के खेजड़ली गाँव में ''अमृतादेवी मृगवन'' बनाया गया है, जिसकी स्थापना-1994 में की गई थी। इस मृगवन की मरु लोमड़ी प्रसिद्ध है। जोधपुर जिए के धावा डोली अभयारण्य में सर्वाधिक कृष्ण मृग पाये जाते है। जोधपुर जन्तुआलय की स्थापना सन 1936 में की गई जो जन्तुआलय गोडावण पक्षी के कृत्रिम प्रजनन के लिए प्रसिद्ध है। वन संरक्षण के लिए इसी प्रकार गुढ़ा विश्नोइयाँ नामक प्रसिद्ध गाँव में ''गुढ़ा विश्नोइयाँ कन्जर्वेशन रिजर्व'' की स्थापना 15.12.2011 को तथा सुन्धामाता कन्जर्वेशन रिजर्व की स्थापना 25-11-2008 को जोधपुर जिले में की गई हैं।

जल संसाधन -


बालसमंद झील जोधपुर शहर के उत्तर में स्थित है। कायलाना झील और उम्मेद सागर भी यहाँ के उल्लेखनीय जलस्रोत हैं। जिले में बेरी गंगा और बाण गंगा दो प्राकृतिक झरने हैं। इसके अलावा, कुछ महत्वपूर्ण तालाब सुरपुरा और गोलेजोर बांध, पिचियाक (जसवंत सागर) और बिराई तालाब हैं, जो सिंचाई विभाग द्वारा अनुरक्षित है। बालसमन्द झील 1159 ई. में बालक राव द्वारा निर्मित है। यह झील जोधपुर-मण्डोर मार्ग पर है। बालसमन्द झील में अष्ट खम्भा स्थित है। कायलाना झील में इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना का पानी ‘राजीव गाँधी लिफ्ट केनाल’ द्वारा डाला जाता है। इसे प्रतापसागर झील भी कहते है क्योंकि सर प्रताप ने इसका आधुनिकीकरण करवाया था। जोधपुर शहर को जल की आपूर्ति कायलाना झील से होती है। जोधपुर जिले में खारे पानी की फलौदी झील है जिससे नमक प्राप्त होता है।

भूविज्ञान और खनिज -

जिले में खनिज संपदा के पर्याप्त भंडार हैं। निर्माण में प्रयुक्त रेत व बलुआ पत्थर जोधपुर तहसील में बहुतायत में पाई जाती है। इस बलुआ पत्थर के अलावा, 'छितर पत्थर' और भूरा पत्थर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैं। 'छितर पत्थर' का उपयोग मुख्य रूप से छत निर्माण के लिए किया जाता है। इमारतों के निर्माण के लिए उपयोग में होने वाले पत्थर के पत्थर (खांडे), पत्थर की पट्टी और शिलापट्ट जोधपुर के शहर और बालेसर के पास पाए जाते हैं। फलोदी तहसील में संगमरमर व डोलोमाइट पत्थर की कुछ खदानें पाई जाती हैं। एमरी स्टोन के लिए प्रयुक्त खनिज और पत्थर भोपालगढ़ में पाया जाता है। सफेद मिट्टी पीपाड़ सिटी के पास पाई जाती है, जिसे मकान निर्माण में दो पत्थरों को जोड़ने के लिए पेस्ट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ चूना पत्थर की 156 खानें हैं। चूना पत्थर का उपयोग चूना, सीमेंट, रबर, स्टील और रासायनिक उद्योगों में किया जाता है। इसके अलावा जिले में जैस्पर (सूर्यकान्त मणि, जबरजद) की खानें भी पाई जाती हैं।

 

जलवायु -

जिले की जलवायु की विशेषता में चरम सीमा का तापमान, अनिश्चित वर्षा और सूखापन  है। नवंबर से मार्च तक फैले सर्दियों के मौसम के बाद अप्रैल से जून तक तथा गर्मियों का मौसम चलता है। जुलाई से मध्य सितंबर तक की अवधि दक्षिण-पश्चिम मानसून के बरसात मौसम के रूप में होती है।

कुल मिलाकर, जिले की जलवायु शुष्क लेकिन स्वस्थ है। गर्म मौसम के दौरान, दिन में गर्म हवाएँ चलती हैं, लेकिन रातें आमतौर पर ठंडी और सुखद होती हैं। जिले में जोधपुर और फलोदी में दो मौसम संबंधी वेधशालाएँ हैं, जो जिले के दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भागों की मौसम स्थितियों पर नजर रखती है।

मृदा - एक प्राकृतिक आर्थिक संसाधन -

केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) और राज्य मृदा सर्वेक्षण विभाग ने जिले में ग्यारह प्रकार की मिट्टी का वर्गीकरण किया है। जो आगे दिए गए हैं:-
  1. गहरी से ज्यादा गहरी मिट्टी जिसमें पानी का रिसाव बहुत है तथा रेतीले टीलों के क्षेत्र में।

  2. गहरी रेतीली मिट्टी जिसमें पानी का रिसाव ज्यादा है।

  3. गहरी हल्की टैक्सचराइज्ड मिट्टी जिसमें कुछ नमी रखने की क्षमता है, लेकिन हवा से भूमि का कटाव होता है।

  4. ऊथली से सामान्य रूप से गहरी हल्की टैक्सचराइज्ड मिट्टी जिसके नीचे सख्त भूमि है एवं आर्द्रता कम रखने की क्षमता है।

  5. सामान्य से गहरी मध्यम टैक्सचराईज्ड मिट्टी जिसमें नमी की क्षमता ठीक है।

  6. गहरी अच्छी टैक्सचराइज्ड मिट्टी जिसमें नमी की अच्छी क्षमता है।

  7. मैदानी ऊथली चट्टानी मिट्टी जो कृषि योग्य नहीं है।

  8. गहरी टैक्सचराइज्ड भूमि जिसमें नमी है, जिसमें भूमि क्षारीय एवं लवणीय है एवं भूजल का स्तर ऊंचा है।

  9. बहुत गहरी हल्की टैक्सचराइज्ड उपजाऊ मिट्टी।

  10. ऊथलीमिट्टी।

  11. पहाड़ियां

फसल पैटर्न-

जिले में कृषि गतिविधियाँ मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर हैं। खरीफ जिले की मुख्य फसल है। रबी फसल की खेती मुख्य रूप से बिलाड़ा, भोपालगढ़ और ओसियां तहसीलों में की जाती है। बाजरा, मूंग, मोठ, तिल, ज्वार और कपास खरीफ की मुख्य फसलें हैं, जबकि जिले में रबी की मुख्य फसलें गेहूं, जौ, चना, सरसों, रायड़ा, तारामीरा आदि हैं। सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण केवल 15 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि पर ही बुवाई की जाती है।

सिंचाई-

जिले में कोई बारहमासी नदी नहीं है। जिले में कम और अल्प वर्षा के कारण भूजल का स्तर नहीं बढ़ता है। भूजल के अत्यधिक निष्कर्षण के कारण, इसका स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। यहाँ सिंचाई हेतु जल के प्राकृतिक स्रोत जैसे नदी, तालाब आदि बहुत कम हैं। दूसरी ओर, वाष्पीकरण की उच्च दर के कारण सिंचाई में बहुत कठिनाई होती है। यहाँ के सिंचाई के मुख्य स्रोत कुएं और रियासत काल में निर्मित कुछ तालाब हैं। सिंचाई के लिए उपयुक्त तालाबों एवं बांधों में सुरपुरा तालाब और पिचियाक (जसवंत सागर) उल्लेखनीय हैं। हालांकि, जिले के कई गांवों में छोटे छोटे तालाब व नाड़ियां उपलब्ध हैं, लेकिन अपर्याप्त बारिश के कारण ये सूख गए हैं।


जोधपुर का इतिहास -

जोधपुर के इतिहास का प्रारम्भ पाषाण युग से माना जाता है। लूणी नदी के किनारे प्रारम्भिक पाषाण युग के जीवाश्म पाए गए हैं। लूणी, पिचियाक, पीपाड़, शिकारपुरा आदि स्थानों पर मध्य पाषाण युग के औजार पाए गए हैं, जबकि प्राचीन पाषाण युगीन सभ्यता के अवशेष बिलाड़ा के आसपास के क्षेत्र में मिले हैं। 1933-34 में पुरातत्व खुदाई से गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल के 4 से 8 वीं शताब्दी के अवशेष प्राप्त हुये। खनन से प्राप्त वस्तुओं में पाषाणों की मूर्ति, गढा हुआ मिट्टी का घड़ा एवं अरब आक्रमणकारियों के तीस छोटे सिक्के शामिल थे। दो खुबसूरत स्तम्भ भी अजायबघर में सुरक्षित है, जो यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में श्री कृष्ण की पूजा अत्यन्त प्राचीन एवं लोकप्रिय थी। चौथी-पांचवी शताब्दी के इन स्तम्भों पर श्री कृष्ण लीला के प्रारम्भिक प्रसंग उत्कीर्ण है। राठौड़ राजपूतों के अधिकार में आने के बाद जोधपुर ने मध्यकाल में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

'सूर्यनगरी' व ''थार मरूस्थल का प्रवेश-द्वार'' के नाम से प्रसिद्ध जोधपुर शहर व आसपास के क्षेत्र प्राचीनकाल में 'मरू देश' कहलाता था, जो बाद में 'मारवाड़' के नाम से जाना गया।


जोधपुर में इतिहास प्रसिद्ध परिहार, चौहान व राठौड़ राजपूतों का राज्य रहा है। परिहार राजपूतों के समय की विशेषता धार्मिक सहिष्णुता रही है, जो यहाँ के विष्णु, शिव व देवी (सच्चियाय माता एवं पीपलाद माता) को समर्पित विभिन्न मंदिरों से परिलक्षित होती है। यहाँ जैन मंदिरों के अलावा अन्य मंदिर 8 से 12 वीं सदी के समय के हैं, जो औसियां, घंटियाली, मण्डोर, बुचकला, पीपाड़ व सोयला में स्थित है। भोपालगढ के समीप ओस्तरा में प्राचीन जैन मन्दिर एवं कुछ देवलियां स्थित है जो 12 वीं शताब्दी की है। यहाँ से प्राप्त शिलालेखों से ज्ञात होता है कि गोहिल वंशीय राणा तिहुणपात के साथ उनकी रानियां सती हुई थी। पीपाड़ में 8 वीं शताब्दी का प्रतिहार कालीन पीपलाद माता का मन्दिर दर्शनीय स्थित है। जिले के खेडापा में संत रामदास जी (1726-1798 ई.) ने रामस्नेही सम्प्रदाय की पीठ की स्थापना की थी, जो आज रामस्नेही सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द बना हुआ है।

जोधपुर का इतिहास राठौड़ वंश के आसपास घूमता है। राठौड़ वंश के प्रमुख राव जोधा को जोधपुर की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने 12 मई 1459 में जोधपुर की स्थापना की। शहर का नाम राव जोधा के नाम पर ही जोधपुर रखा गया है। इसे पहले मारवाड़ के नाम से जाना जाता था। राव जोधाजी ने पुरानी राजधानी मण्डोर को नागरिक दृष्टि से अनुपयुक्त व असुरक्षित समझकर ''चिड़ियानाथजी की टूक'' पहाड़ी पर ज्येष्ठ सुदी 11 शनिवार 12 मई 1459 ई. को विशाल दुर्ग (मेहरानगढ़) की नींव डालकर जोधपुर की स्थापना की। इस दुर्ग के उपनाम ''मयूरध्वजगढ़/गढ़ चिन्तामणी/ कागमुखी'' हैं। 


अफगानों के कारण राठौड़ों को अपनी मूल मातृभूमि, कन्नौज से बाहर आना पड़ा। वे वर्तमान जोधपुर के निकट पाली में आ गए। सिहाजी राठौड़ ने वहां एक स्थानीय राजकुमार की बहन से विवाह कर लिया। इससे राठौड़ों को इस क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने और मजबूत बनाने में मदद मिली। कुछ समय बाद में उन्होंने जोधपुर से सिर्फ 9 किमी दूर मंडोर में प्रतिहारों को हटा दिया। 1459 तक, मंडोर राठौड़ों राजधानी रही, लेकिन राठौरों को एक सुरक्षित स्थान की आवश्यकता महसूस हुई। तब राव जोधा द्वारा सूर्यनगरी जोधपुर का निर्माण किया गया। राठौड़ों ने औरंगज़ेब को छोड़कर सभी मुगल बादशाहों के साथ अच्छे संबंध बनाए। महाराजा जसवंत सिंह ने उत्तराधिकार के संघर्ष में भी शाहजहाँ का साथ दिया था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद, महाराजा अजीत सिंह ने अजमेर से मुगलों को निकाल दिया और इसे मारवाड़ (अब जोधपुर) में मिला लिया। महाराजा उम्मेद सिंह के शासनकाल में जोधपुर एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ था। ब्रिटिश राज के दौरान भू क्षेत्र के हिसाब से जोधपुर रियासत राजपूताना में सबसे बड़ी रियासत थी। ब्रिटिश राज के तहत जोधपुर समृद्ध हुआ। इसके  मारवाड़ी व्यापारी,, नितांत फल-फूल रहे थे। उन्होंने सम्पूर्ण भारत में व्यापार में एक प्रमुख स्थान पर कब्जा कर लिया। वर्ष 1949 में राजस्थान में सम्मिलित होने से पूर्व जोधपुर तत्कालीन मारवाड़ राज्य की राजधानी थी। 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद वर्ष 1949 जोधपुर का भारत संघ में विलय हो गया। जोधपुर राजस्थान का दूसरा शहर बना।



राव जोधाजी द्वारा निर्मित ऐतिहासिक मेहरानगढ़ दुर्ग आज 555 वर्षों के बाद भी उसी वैभव एवं शान के साथ खड़ा है। राव जोधा के समय जोधपुर भागीपोल, फुलेराव की पोल, भोमियों जी के घाटी वाली पोल एवं सिंहपोल के चार दरवाजों के भीतर बहुत ही छोटे भू-भाग में समाया हुआ था। सोलहवीं शताब्दी में राव मालदेव के समय इसका काफी विस्तार हो चुका था। इसलिए 24000 फुट लम्बी, 9 फुट चौड़ी एवं 39 फुट ऊंची दीवाऋण से युक्त नगर का परकोटा बनाया गया, महाराजा तखतसिंह ने बाद में उसमें जालोरी गेट, सोजती गेट, मेड़ती गेट, नागौरी गेट एवं सिंवाची गेट बनाए। जोधपुर का किला अपने आप में कला का अनूठा नमूना है। यहाँ राठौड़ शासकों की छतरियां जो मण्डोर एवं जसवन्तथड़ा में स्थित है, जो कला एवं स्थापत्य के अनूठे नमूनों में गिनी जाती है। जोधपुर शहर के मन्दिरों, बावड़ियों एवं मस्जिदों में सुन्दर शिल्पकारी पाई जाती है। उम्मेद भवन वर्तमान शताब्दी की स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है, जहां शाही परिवार के वंशज आज भी निवास करते हैं। जोधपुर शासकों द्वारा शहर के आस-पास अनेक तालाब, बावडियां आदि बनवाई गई, जिनमें बालसमन्द, कायलाना झील, उम्मेद सागर, तख्त सागर, गुलाब सागर, फतेह सागर, रानीसर-पदमसर, तापी बावड़ी, चान्द बावड़ी, सुरपुरा बांध आदि प्रमुख हैं। ये सभी रमणीक जल स्रोतों के रूप में विख्यात होने के साथ साथ पेयजल के प्रमुख स्रोत भी है। मालदेव, जोधा, उदयसिंह, जसवन्तसिंह एवं अजीतसिंह जैसे शासकों का नाम इतिहास में प्रसिद्ध है। जोधपुर वीरों की भूमि त्याग, तपस्या व बलिदान के लिये विश्व के मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाये हुये है। यह ऐतिहासिक स्वामी भक्त कर्मस्थली है जहां गोराधाय द्वारा अपने स्वामी की रक्षा हेतु किया गया अपने पुत्र का बलिदान भी त्याग और बलिदान का गौरव गाथा कहलाता है। जोधपुर जिले में ही अमृतादेवी ने खेजड़ी वृक्ष की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

राजस्थान राज्य में जोधपुर रियासत के विलय तक यहां ‘‘मारवाड़‘‘ राज्य का शासन था, जिसे स्थानीय भाषा में ‘‘नवकोटी मारवाड़‘‘ के नाम से जाना जाता है। इसे स्थानीय भाषा में ‘‘जोधाणा‘‘ भी कहा जाता है।  1949 में  राजस्थान में विलय के पश्चात् मारवाड़ रियासत को पांच जिलों जोधपुर, बाड़मेर, जालोर, पाली तथा नागौर में विभाजित किया गया तथा कुछ इलाके जैसलमेर, सिरोही तथा अजमेर जिलों में मिला दिये गये।


भूतपूर्व जोधपुर रियासत के वृहद राजस्थान में विलय के बाद एक पृथक जोधपुर जिला बनाया गया। उस समय इसमें चार तहसीलें- फलोदी, शेरगढ़, जोधपुर एवं बिलाड़ा शामिल थी। 1951-61 दशक में ओसियां एक नई तहसील बनाई गई, जिसमें 118 गांव जोधपुर तहसील से व 18 गांव फलोदी से स्थानान्तरित किये गये। जिले के अन्तर्गत हुए सीमा परिवर्तनों के फलस्वरूप 33 गांव जैसलमेर की बाप तहसील सहित इस जिले की फलोदी तहसील में शामिल किये गये। कस्बा पोकरण सहित फलोदी के 47 गांव व शेरगढ़ तहसील के 17 गांव को मिलाकर जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील को वर्तमान स्वरूप दिया गया। 1961-71 के दौरान इस जिले में कोई सीमा परिवर्तन नहीं हुआ, किन्तु 1971 से 1981 की अवधि में एक गांव छायण, जो फलोदी तहसील में स्थित था एवं उसका क्षेत्रफल 79.16 वर्ग किमी. है, को जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील में स्थानान्तरित किया गया। इसके पश्चात् ओसियां एवं बिलाड़ा तहसील के कुछ गांवों को अलग कर एक नई तहसील भोपालगढ़ बनाई गई।

वर्ष 1996 में जोधपुर तहसील के कुछ गांवों को अलग कर एक नई तहसील लूणी बनाई गई। वर्ष 2012 में भोपालगढ़ व औसियां से बावडी को, बिलाडा व भोपालगढ़ से पीपाड़ शहर को, फलोदी से बाप तथा शेरगढ़ से बालेसर को अलग कर 4 तहसीले बनाई गई। वर्ष 2013 में औसियां से तिंवरी को अलग कर तथा फलोदी से लोहावट को अलग कर 2 तहसीले बनाई गई। वर्तमान में जोधपुर जिले में कुल 13 तहसीलें है। जो निम्नानुसार है-


वर्तमान में जिले को प्रशासनिक दृष्टि से निम्नानुसार उपखण्डों, तहसीलों, पंचायत समितियों में बांटा गया है।

जोधपुर जिले की तहसीलें व पंचायत समितियां -



क्र.सं.  उपखंड  तहसील  उप तहसील  पंचायत समिति  शहर
1 जोधपुर जोधपुर आऊ मंडौर जोधपुर
2 फलौदी ओसियां  मतोड़ा लूणी बिलाड़ा
3 शेरगढ़ फलौदी डांगियावास ओसियां फलौदी
4 ओसियां बिलाड़ा घंटियाली बाप पीपाड़सिटी
5 पीपाड़सिटी भोपालगढ़  शेत्रावा फलौदी
6 बिलाड़ा शेरगढ़ शेखासर शेरगढ़
7 भोपालगढ़ लूणी बालेसर
8 बाप पीपाड़सिटी भोपालगढ़
9 लूणी बावड़ी बिलाड़ा
10 बालेसर बालेसर बावड़ी
11 बाप लोहावट
12 लोहावट  देचु
13 तिंवरी शेखला
14 बापिणी
15 पीपाड़सिटी
16 तिंवरी
                                             

जोधपुर के मेले और उत्सव -

जोधपुर के मेले और त्यौहार राजस्थान की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को व्यक्त करते हैं। जोधपुर में कई त्योहार मनाए जाते हैं। जोधपुर के सबसे प्रसिद्ध मेले और त्योहार हैं:-

शीतला माता का मेला-

यह जोधपुर शहर में स्थानीय स्तर पर 'कागा' के रूप में जाना जाता है। यह मेला हर साल चैत्र बदी 8 (मार्च-अप्रैल) को आयोजित होता है। शीतला माता की प्रतिमा को श्रद्धा सुमन व्यक्त करने व पूजा अर्चन करने के लिए इस मेले में लगभग तीस हजार लोग इकट्ठा होते हैं।



चामुंडा माता का मेला -


चामुंडा माता का मंदिर जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में स्थित है। चामुंडा माता राठौडो (जोधपुर राज्य के पूर्व शासकों) की कुलदेवी हैं। यहाँ हर साल दोनों नवरात्रों में मेला लगता है, जिसमें चामुंडा माता के 50,000 से अधिक भक्त मेले में भाग लेकर देवी की पूजा करते हैं। यह माता प्रतिहार वंश की कुलदेवी है। 

इस माता के मन्दिर में 2008 के नवरात्रों में भगदड़ मचने से 227 लोगों की मृत्यु हो गई थी, जिसकी जाँच के लिए जसराज चौपड़ा आयोग गठित किया गया था। 1857 में बिजली गिरने से मंदिर को काफी क्षति हुई। इसका पुनर्निर्माण राजा तख्तसिंह ने करवाया जिसका जीर्णोद्धार दिवस प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है।


मंडोर का वीरपुरी मेला -


यह मेला राजस्थान के नायकों की याद में जोधपुर शहर से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित मंडोर में प्रतिवर्ष श्रावण मास के सोमवार को लगता है। इसमें गणेश, भैरों, चामुंडा और कंकाली आदि देवताओं की मूर्तियों के समक्ष रुपये, नारियल और मिठाई का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस मेले में सभी समुदायों के हजारों लोग एकत्र होते हैं।



मसूरिया पहाड़ी का दशहरा का मेला-


मसूरिया पहाड़ी को एक सुंदर पिकनिक स्थल के रूप में विकसित किया गया है। मसूरिया पहाड़ी के पास ‘रावण-का चबूतरा’ नामक स्थान पर प्रतिवर्ष अश्विन सुदी 10 (सितंबर-अक्टूबर) को यह मेला आयोजित किया जाता है। 



नौ सती का मेला


यह मेला बिलाड़ा शहर में बाण गंगा के नाम से जाना जाता है। यह हर साल चैत्र बदी अमावस्या (मार्च अप्रैल) को आयोजित होता है। यह उन नौ महिलाओं की याद में आयोजित किया जाता है जो इस स्थान पर सती हो गई थी। इस मेले में हजारों लोग बाण गंगा नदी में डुबकी लगाने के लिए आते हैं।

 

राता भाकर वाला का मेला -


यह मेला संत जालंधरनाथ के सम्मान में ग्राम बालेसर सता (शेरगढ़ तहसील) से 3 किलोमीटर की दूरी पर आयोजित किया जाता है। यह मेला भाद्रपद सुदी 2 (अगस्त-सितंबर) को आयोजित होता है। इस अवसर पर हजारों लोग इकट्ठा होते हैं। 


बाबा रामदेव मेला - 

जोधपुर शहर के मसूरिया पहाड़ी पर प्रत्येक वर्ष भाद्रपद सुदी 2 (अगस्त-सितम्बर) में यह मेला लगता है। इस स्थान पर बाबा रामदेव का मंदिर स्थित है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोग इस अवसर पर दर्शन हेतु आते हैं। इस मेले को मसूरिया बाबा का मेला के नाम से भी जानते हैं।


करपंदा का मेला -


करपंदा बिलाड़ा तहसील का एक छोटा सा गाँव है। जोधपुर से इसकी दूरी लगभग 52 किलोमीटर है। यहाँ पर 1603-1621 ई. में बना पार्श्वनाथ जैन मंदिर है जिसमें कई तीर्थंकरों की मूर्तियाँ हैं। चैत्र-शुक्ल पंचमी (मार्च-अप्रैल) को यहाँ मेला लगता है।




मारवाड़ महोत्सव-

ब्लू सिटी ऑफ जोधपुर में राजस्थान के नायकों की स्मृति में अश्विन महीने में (सितंबर-अक्टूबर) में मारवाड़ महोत्सव आयोजित किया जाता है यह इस शहर का सबसे लोकप्रिय उत्सव है। मारवाड़ महोत्सव को मूल रूप से मांड महोत्सव के रूप में जाना जाता था। 'मांड ’लोक संगीत का एक पारंपरिक तरीका है जो राजस्थान के शासकों के रोमांस और विनम्रता पर केंद्रित है। शरद पूर्णिमा के दौरान मनाया जाने वाला यह महोत्सव दो दिनों तक चलता है। विभिन्न मजेदार गतिविधियाँ जैसे कि कैमल टैटू शो, हॉर्स राइडिंग, मैजिक शो, पपेट शो और हॉर्स पोलो भी इस दौरान होते हैं। उम्मेद भवन पैलेस, मंडोर और मेहरानगढ़ किला मारवाड़ महोत्सव के आयोजन स्थल हैं। प्रतिभाशाली लोक नर्तक और गायक यहां इकट्ठा होते हैं एवं उत्कृष्टता के साथ अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। ये कलाकार साहसी नायकों की याद में गीत गाते हैं और क्षेत्र के मिथक और परंपराओं को जीवंत करते हैं।

मारवाड़ महोत्सव न केवल जोधपुर में आयोजित किया जाता है, बल्कि जोधपुर के बाहरी इलाके में केवल 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मंडोर में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। मंडोर ऐतिहासिक महत्व का महान स्थल है जो पारंपरिक रूप से मारवाड़ की राजधानी था। मंडोर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता हॉल ऑफ हीरोज (देवताओं की साल) है, जहां चमकीले रंगों में लोकप्रिय हिंदू लोक देवताओं का चित्रण करते हुए एकल चट्टान पर उत्कीर्ण सोलह विशाल प्रतिमाएं हैं।


ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल-



मेहरानगढ़ का किला -

मेहरानगढ़ का किला राजस्‍थान में जोधपुर शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर है। नीचे शहर की रक्षा करते हुए एक समानान्‍तर क्लिफ है, इस किले की स्‍थापना राव जोधा द्वारा 1459 ई. में कराई गई थी, जब उन्‍होंने अपनी राजधानी मंडौर से यहां स्‍थानांतरित की। इसमें तराशी गई कृतियों और लाल सैंड स्‍टोन से अदभुत बारीक जालियों वाली खिड़कियों से युक्‍त महल है।

इसके अंदर स्थित मोती महल, फूल महल, शीश महल, आदि महलों का अपना एक अलग आकर्षण है, जिनका अपना एक विविध समृद्ध इतिहास है।  सिलेह खाना, दौलत खाना में ऐतिहासिक महत्त्व की पालकियां, शाही पालने, विभिन्न शैलियों के लघु चित्र, परिधान, फर्नीचर, लोक संगीत, उपकरण और एक प्रभावशाली शस्त्रागार का भण्‍डार उपलब्ध है। किले में शंभुबाण तोप (इसे अभयसिंह सरबुलन्द खाँ से को युद्ध में परास्त करके छीनकर लाया था), किलकिला तोप (अजीत सिंह ने बनवाई थी जब वह अहमदाबाद का सूबेदार था) तथा गजनी खां तोप (गजसिंह ने 1607 में जालोर युद्ध जीत कर से प्राप्त की थी), कड़क बिजली तोप (560 किलो की इस तोप को अभय सिंह द्वारा घाणेराव से मंगाया था) आदि रखी गई हैं। किले के चामुंडा मंदिर के पास प्राचीर पर ब्रिटिश काल की तोपों का प्रदर्शन किया गया है, जो भारत में सबसे दुर्लभतम तोपों में है। किले पर जैसे ही ऊपर चढ़ते हैं, लोक संगीत बजाने वाले कलाकार एक बीते युग की भव्यता को पुनर्जीवित करते हैं। दुर्ग के लोहापोल दरवाजे के समीप धन्ना व भींवा (मामा-भान्जा) की 10 खम्भों की छतरी है, इसका निर्माण अजीत सिंह ने करवाया था। इस दुर्ग के संग्रहालय में अकबर की तलवार भी रखी हुई है। कीरत सिंह की छतरी भी मेहरानगढ़ में है।

यह दुर्ग धरातल से करीब चार सौ फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।  इसकी दीवार 10 से 120 फीट ऊंची तथा 70 फीट चौड़ी है। इस दुर्ग की लम्‍बाई 500 गज और चौड़ाई 200 गज है। 

किले के बारे में विद्वानों के कथन—

जैकलिन कैनेडी ने इसे विश्व का आठवाँ आश्चर्य बताया जबकि रूपयार्ड क्लिपिंग ने कहा कि ”दुर्ग का निर्माण शायद परियों व फरिश्तों ने करवाया।”

दुर्ग के दौलत खाने के आँगन में राजा बख्त सिंह द्वारा निर्मित संगमरमर का विशाल सिंहासन ''श्रृंगार चौकी (सिणगारी)'' स्थित हैं। इस पर जोधपुर के शासकों का राजतिलक होता था।


जसवंत थडा -


जोधपुर दुर्ग मेहरानगढ़ के पास ही सफ़ेद संगमरमर का एक स्मारक बना है जिसे जसवंत थड़ा कहते हैं। इसे सन 1899 में जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह जी (द्वितीय)(1888-1895) की यादगार में उनके उत्तराधिकारी महाराजा सरदार सिंह जी ने बनवाया था। इस स्मारक को बनाने में 2,84,678 रूपए का खर्च आया था। यह स्थान जोधपुर राजपरिवार के सदस्यों के दाह संस्कार के लिये सुरक्षित रखा गया है। इससे पहले राजपरिवार के सदस्यों का दाह संस्कार मंडोर में हुआ करता था। इस विशाल स्मारक में संगमरमर की कुछ ऐसी शिलाएँ भी दीवारों में लगी है जिनमे सूर्य की किरणे आर-पार जाती हैं। इस स्मारक के लिये जोधपुर से 250 कि, मी, दूर मकराना से संगमरमर का पत्थर लाया गया था। स्मारक के पास ही एक छोटी सी झील है जो स्मारक के सौंदर्य को और बढा देती है इस झील का निर्माण महाराजा अभय सिंह जी (1724-1749) ने करवाया था। जसवंत थड़े के पास ही महाराजा सुमेर सिह जी, महाराजा सरदार सिंह जी, महाराजा उम्मेद सिंह जी व महाराजा हनवन्त सिंह जी के स्मारक (छतरियां) बने हुए हैं। 



उम्मेद भवन (छित्तर पैलेस) -


महाराजा उम्मेद सिंह (1929-1942) द्वारा निर्मित, और उनके नाम पर बने उम्मेद भवन को छित्तर पैलेस के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि इसका इस्तेमाल स्थानीय छित्तर बलुआ पत्थर से किया गया है। यह 30 के दशक की इंडो-औपनिवेशिक कला और डेको कला शैली का एक शानदार उदाहरण है। इस महल की एक अनूठी विशेषता यह है कि हाथ से गढ़े हुए बलुआ पत्थर को इंटरलॉकिंग की एक विशेष प्रणाली में एक साथ रखा गया है तथा इनमें कोई मोर्टार बंधन नहीं है। इस महल के एक हिस्से को होटल में बदल दिया गया है, जबकि दूसरे भाग में पर्यटकों के लिए उत्कृष्ट संग्रहालय है, जिसमें मॉडल हवाई जहाज, अस्त्र-शस्त्र, प्राचीन घड़ियाँ और लोलक घड़ियाँ, अनमोल क्रॉकरी, और शिकार ट्राफियां प्रदर्शित हैं। ये दोनों खंड शाही वैभव का माहौल बनाए रखते हैं। वर्तमान में इस पैलेस में 347 कमरे है।


सरकारी संग्रहालय -

उम्मेद पब्लिक बाग के मध्य में स्थित इस संग्रहालय में शस्त्रागार, वस्त्र, स्थानीय कला और शिल्प, लघु चित्रकला, शासकों के चित्र, पांडुलिपियां और जैन तीर्थंकरों के चित्र आदि का एक समृद्ध संग्रह है। उम्मेद पब्लिक गार्डन में एक चिड़ियाघर भी है।


घंटा घर-


जोधपुर शहर में स्थित घंटा घर, जिसे क्लॉक टावर (Clock tower) के नाम से भी जाना जाता है, का निर्माण जोधपुर के राजा "सरदार सिंह" ने करवाया था।




गिरदीकोट और सरदार मार्केट-


घंटाघर के पास मानव गतिविधि के साथ धड़कते हुए संकीर्ण गलियों में यह रंगीन बाज़ार स्थित है, जहाँ छोटी दुकानों में उत्तम राजस्थानी वस्त्र, हस्तशिल्प, ऊंट और हाथियों की मृणमूर्तियाँ, संगमरमर कलाकृतियां, तारकशी की कलाकृतियाँ, अति सुंदर उत्तम राजस्थानी चांदी के आभूषणों  आदि की बिक्री होती है।




ओसियां के मंदिर -


यह जोधपुर से करीब 66 किमी दूरी पर है। औंसिया को 24 मन्दिरों की स्वर्ण नगरी भी कहते है। ओसियां जोधपुर जिले में स्थित ऐसा आध्यात्मिक क्षेत्र है, जहां का प्राचीन इतिहास यहाँ की धरोहरों में देखा जा सकता है। प्राचीनकाल में उत्केशपुर या उकेश के नाम से लोकप्रिय ओसियां के 16 वैष्णव, शैव व जैन मंदिर 8 वीं से 12 वीं शताब्दी में निर्मित माने गए हैं। ये प्रतिहारकालीन स्थापत्य कला व संस्कृति के उत्कृष्ट प्रतीक है। ओसियां प्रारंभ में वैष्णव और शैव संप्रदाय का केन्द्र था किंतु कालांतर में यह जैन धर्म का केंद्र बन गया तथा यहां पर महिषासुरमर्दिनी मंदिर के पश्चात सच्चिया माता का मंदिर निर्मित हुआ, जिसकी वजह से यह हिन्दू एवं जैन दोनों धर्मावलंबियों का तीर्थ बना।

विद्वान भंडारकर ने ओसियां के प्राचीनतम 3 वैष्णव मंदिरों को हरिहर नाम दिया, जो एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। पुरातन विश्लेषणों के अनुसार वास्तव में ये तीनों मंदिर हरिहर के न होकर, विष्णु भगवान के थे। वर्तमान में किसी भी मंदिर के गर्भगृह में जैन धर्म के तीर्थंकर की कोई प्रतिमा मौजूद नहीं है, जबकि प्रत्येक गर्भगृह के बाहर वैष्णव प्रतिमाएं जैसे कृष्ण लीला एवं विष्णु वाहन गरूड़ की प्रतिमाएं अंकित हैं। किनारे के मंदिरों में शिव, शक्ति व सूर्य की प्रतिमाएं भी विष्णु मंदिर के प्रमाण की पुष्टि करती हैं। प्रथम हरिहर मंदिर के तले में भगवान बुद्ध की प्रतिमा भी स्थित हैं,जो इस बात का संकेत करती हैं कि 8 वीं शताब्दी तक बुद्ध को भी हिन्दूओं में मान्यता दी गई। 

इस परिसर में वैष्णव मंदिरों के पास ही पंचायतन स्वरूप में एक सूर्य मंदिर भी स्थित है जिसके गर्भगृह में कोई प्रतिमा प्रतिष्ठित नहीं है। मंदिर के ललाट बिम्ब पर लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा स्थित है, जिसके दोनों ओर गणेश, ब्रह्मा, कुबेर एवं शिव का सुंदर अंकन है। गर्भगृह के बाहर की ओर महिषासुरमर्दिनी, सूर्य एवं गणेश प्रतिमाओं का मनभावन अंकन भी है। राजस्थान के इस सबसे प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर को ”राजस्थान का ब्लैक पैगोड़ा” या ‘राजस्थान का कोणार्क” के नाम से भी जाना जाता है। 

ओसियां में शक्ति मंदिर पीपला माता एवं सच्चिया माता मंदिरों के नाम से जाने जाते हैं। सूर्य मंदिर के पास ही पीपला माता का मंदिर स्थित है, जिसके गर्भगृह में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है तथा इसके दोनों ओर कुबेर एवं गणेश की प्रतिमाएं स्थित हैं। बाहर की ओर भी महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा के अलावा गजलक्ष्मी एवं क्षमकरी की प्रतिमाएं स्थित हैं। इस मंदिर के सभामंडप में 30 अलंकृत स्तंभ हैं।

पास ही पहाड़ी पर 12 वीं शताब्दी में निर्मित सच्चिया माता अर्थात महिषमर्दिनी का देवालय है, जिसके मंडप में 8 तोरण अत्यंत आकर्षक एवं भव्य हैं। मंदिर पर लेटिन शिखर स्थित है तथा चारों ओर छोटे-छोटे वैष्णव मंदिर निर्मित हैं। यहीं महिषमर्दिनी बाद में सच्चिया माता के नाम से लोकप्रिय हुई, जिससे ओसियां हिन्दू एवं जैन दोनों धर्मावलंबियों का तीर्थस्थल बन गया। पश्चिममुखी इस मंदिर का विशाल सभामंडप 8 बड़े खम्भों पर टिका है,जिनकी कलात्मकता अत्यंत मनोहारी है। यह माना जाता है कि यहां के वैष्णव मंदिर 8 वीं शताब्दी के हैं, लेकिन सच्चिया माता मंदिर के 10 वीं शताब्दी में निर्मित होने के प्रमाण मिले हैं, जिसका 12 वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार किया गया। सच्चियाय माता की पूजा ओसवाल, जैन, परमार, पंवार, कुमावत , राजपूत , चारण तथा पारिक इत्यादि जातियों के लोग पूजते हैं। 

राई का बाग पैलेस -

इसका निर्माण महाराजा जसवन्त सिंह प्रथम की रानी जसवंतदे हाड़ी ने 1663 में करवाया था। रानी जसवंतदे ने ही कल्याण सागर नामक तालाब बनवाया था जिसे रातानाड़ा कहा जाता है। यह तालाब अब नष्ट हो गया है और यहाँ शहर की रातानाड़ा बस्ती बस  गई है। महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय को राईका बाग महल अति प्रिय था।  वह प्रायः इसके अष्ट्कोणीय बंगले में रहा करते थे। उनके काल में सन् 1883 ई. में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने उपदेश शासक को इसी महल में सुनाये थे।

मंडोर उद्यान-

मंडोर में एक सुन्दर उद्यान बना है, जिसमें 'अजीत पोल', 'देवताओं की साल' व 'वीरों का दालान', मंदिर, बावड़ी, 'जनाना महल', 'एक थम्बा महल', नहर, झील व जोधपुर के विभिन्न महाराजाओं के स्मारक बने है, जो स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। अपने ऊची चट्टानी चबूतरों के साथ, अपने आकर्षक बगीचों के कारण यह प्रचलित पिकनिक स्थल बन गया है। इस उद्यान में देशी-विदेशी पर्यटको की भीड़ लगी रहती है। उद्यान में बनी कलात्मक इमारतों का निर्माण जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह व उनके पुत्र महाराजा अभय सिंह के शासन काल के समय सन 1714 से 1749 ई. के बीच किये गए थे। उसके पश्चात् जोधपुर के विभिन्न राजाओं ने इस उद्यान की मरम्मत आदि करवाकर शनै: शनै: इसे आधुनिक ढंग से सजाया और इसका विस्तार किया। मारवाड़ की इस प्राचीन राजधानी के प्राचीन स्मारकों में से एक ''हॉल ऑफ हीरो'' (देवताओं की साल व वीरों का दालान) में चट्टान से दीवार में तराशी हुई पन्द्रह आकृतियां हैं जो हिन्दु देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती है। राजस्थानी भाषा में साल का अर्थ कक्ष और दालान का अर्थ बरामदा है। अजीत पोल से प्रवेश करते ही एक लम्बा बरामदा दिखाई पड़ता है इसे ही देवताओं की साल व वीरों का दालान कहा जाता है। 

उद्यान में स्थित जनाना महल में वर्तमान समय में राजस्थान के पुरातत्त्व विभाग ने एक सुन्दर संग्रहालय बना रखा है, जिसमें पाषाण प्रतिमाएँ, शिलालेख, चित्र एवं विभिन्न प्रकार की कलात्मक सामग्री प्रदर्शित है। जनाना महल का निर्माण महाराजा अजीत सिंह (1707-1724 ई.) के शासन काल में हुआ था, जो स्थापत्य कला की दृष्टि से एक बेजोड़ नमूना है। जनाना महल के प्रवेश द्वार पर एक कलात्मक द्वार का निर्माण झरोखे निकाल कर किया गया है। इस भवन का निर्माण राजघराने की महिलाओं को राजस्थान में पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी से निजात दिलाने हेतु कराया गया था। इसके प्रांगण में फव्वारे भी लगाये गए थे। महल प्रांगण में ही एक पानी का कुंड है, जिसे 'नाग गंगा' के नाम से जाना जाता है। 

इस कुंड में पहाडों के बीच से एक पानी की छोटी-सी धारा सतत बहती रहती है। महल व बाग़ के बाहर एक तीन मंजिली प्रहरी ईमारत बनी है। इस बेजोड़ ईमारत को 'एक थम्बा महल' कहते हैं। इसका निर्माण भी महाराजा अजीत सिंह के शासन काल में भूरे रंग के धाटू के पत्थरों से हुआ था। एक थम्बा महल को 'प्रहरी मीनार' भी कहते हैं।

मंडोर उद्यान के मध्य भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर एक ही पंक्ति में जोधपुर के महाराजाओं के स्मारक (छतरियां) ऊँची प्रस्तर की कुर्सियों पर बने हैं, जिनकी स्थापत्य कला में हिन्दू स्थापत्य कला के साथ मुस्लिम स्थापत्य कला का उत्कृष्ट समन्वय देखा जा सकता है। इनमें महाराजा अजीत सिंह का स्मारक सबसे विशाल है। स्मारकों के पास ही एक फव्वारों से सुसज्जित नहर बनी है, जो नागादडी झील से शुरू होकर उद्यान के मुख्य दरवाजे तक आती है। नागादडी झील का निर्माण कार्य मंडोर के नागवंशियों ने कराया था, जिस पर महाराजा अजीत सिंह व महाराजा अभय सिंह के शासन काल में बांध का निर्माण कराया गया था। 

इस झील से आगे सूफ़ी संत तनापीर की दरगाह है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहाँ दूर-दूर से यात्री दर्शनार्थ आते हैं। इस दरगाह के दरवाजों व खिड़कियों पर सुन्दर नक्काशी की हुई है। दरगाह पर प्रतिवर्ष उर्स के अवसर पर मेला लगता है। दरगाह के पास ही फ़िरोज़ ख़ाँ की मस्ज़िद है।


जोधपुर जिले की जनसंख्या Population



जोधपुर 2001 2011 वृद्धि


उपखंड संख्या
7 7 0


नगरों की संख्या
4 7 3


सांविधिक नगरों की संख्या
4 4 0


जनगणना शहरों की संख्या
0 3 3


गांवों की संख्या #
1063 1838 775


कुल जनसंख्या निरपेक्ष  प्रतिशत
संपूर्ण ग्रामीण शहरी संपूर्ण ग्रामीण शहरी

व्यक्ति 3687165 2422551 1264614 100.00 65.70 34.30
पुरुष 1923928 1260328 663600 100.00 65.51 34.49
स्त्री 1763237 1162223 601014 100.00 65.91 34.09
दशकीय वृद्धि 2001-2011 निरपेक्ष प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरी संपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 800660 513128 287532 27.74 26.87 29.43
पुरुष 410038 266156 143882 27.09 26.77 27.68
स्त्री 390622 246972 143650 28.46 26.98 31.41
लिंगानुपात 916 922 906
0-6 आयु वर्ग में बाल जनसंख्या निरपेक्ष कुल जनसंख्या का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरी संपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 606490 441955 164535 16.45 18.24 13.01
पुरुष 320731 233566 87165 16.67 18.53 13.14
स्त्री 285759 208389 77370 16.21 17.93 12.87
लिंगानुपात 891 892 888
साक्षर निरपेक्ष प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरी संपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 2031532 1158340 873192 65.94 58.48 79.38
पुरुष 1265753 765699 500054 78.95 74.57 86.75
स्त्री 765779 392641 373138 51.83 41.16 71.26
अनुसूचित जाति  जनसंख्या निरपेक्ष कुल जनसंख्या का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 608024 447037 160987 16.49 18.45 12.73
पुरुष 315199 232087 83112 16.38 18.41 12.52
स्त्री 292825 214950 77875 16.61 18.49 12.96
अनुसूचित जनजाति जनसंख्या निरपेक्षकुल जनसंख्या का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 118924 90825 28099 3.23 3.75 2.22
पुरुष 61969 47248 14721 3.22 3.75 2.22
स्त्री 56955 43577 13378 3.23 3.75 2.23
# अन-आबाद गांव शामिल
कुल श्रमिक निरपेक्ष कार्य सहभागिता दर
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 1489741 1079534 410207 40.40 44.56 32.44
पुरुष 965103 621142 343961 50.16 49.28 51.83
स्त्री 524638 458392 66246 29.75 39.44 11.02
मुख्य श्रमिक निरपेक्ष कुल श्रमिकों को प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 1056479 690911 365568 70.92 64.00 89.12
पुरुष 803328 486462 316866 83.24 78.32 92.12
स्त्री 253151 204449 48702 48.25 44.60 73.52
सीमांत श्रमिक निरपेक्षकुल श्रमिकों को प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 433262 388623 44639 29.08 36.00 10.88
पुरुष 161775 134680 27095 16.76 21.68 7.88
स्त्री 271487 253943 17544 51.75 55.40 26.48
सीमांत श्रमिक (3 -6 महीने) निरपेक्ष कुल सीमांत श्रमिकों को प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 364022 324048 39974 84.02 83.38 89.55
पुरुष 138588 114204 24384 85.67 84.80 89.99
स्त्री 225434 209844 15590 83.04 82.63 88.86
सीमांत श्रमिक (3 महीने से कम) निरपेक्षकुल सीमांत श्रमिकों को प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 69240 64575 4665 15.98 16.62 10.45
पुरुष 23187 20476 2711 14.33 15.20 10.01
स्त्री 46053 44099 1954 16.96 17.37 11.14
कुल किसान निरपेक्ष कुल श्रमिकों का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 592370 581220 11150 39.76 53.84 2.72
पुरुष 319170 312116 7054 33.07 50.25 2.05
स्त्री 273200 269104 4096 52.07 58.71 6.18
कुल कृषि मजदूर निरपेक्षकुल श्रमिकों का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 242017 232730 9287 16.25 21.56 2.26
पुरुष 106756 100532 6224 11.06 16.19 1.81
स्त्री 135261 132198 3063 25.78 28.84 4.62
कुल घरेलू उद्योग श्रमिक निरपेक्षकुल श्रमिकों का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 42412 21410 21002 2.85 1.98 5.12
पुरुष 29427 14007 15420 3.05 2.26 4.48
स्त्री 12985 7403 5582 2.48 1.61 8.43
कुल अन्य श्रमिक निरपेक्षकुल श्रमिकों का प्रतिशत
संपूर्णग्रामीणशहरीसंपूर्णग्रामीणशहरी

व्यक्ति 612942 244174 368768 41.14 22.62 89.90
पुरुष 509750 194487 315263 52.82 31.31 91.66
स्त्री 103192 49687 53505 19.67 10.84 80.77
Source:- Census of India - 2011


जिले के विधानसभा क्षेत्र-

क्र.सं. संसदीय क्षेत्र
विधानसभा क्षेत्र
संख्या/नाम
1 जोधपुर 122-फलोदी
2 123-लोहावट
3 124-शेरगढ़
4 127-सरदारपुरा
5 128-जोधपुर
6 129-सूरसागर
7 130-लूणी
8 133-पोकरण
 

जोधपुर से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य-


  • - जोधपुर क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा संभाग है।
  • - जोधपुर में प्रथम सहकारी डाकघर की 1839 में स्थापना की गई।
  • - छीतर (उम्मेद भवन) पैलेस को विश्व का सबसे बड़ा रिहायशी पैलेस कहा जाता है।
  • - राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर में स्थित है जिसका 29 अगस्त, 1949 को सवाई मानसिंह द्वारा उद्घाटन किया गया था। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश कमलकांत वर्मा थे।
  • - जोधपुर के अचलनाथ महादेव मंदिर का निर्माण राव गांगा की रानी नानक देवी ने 1531 में कराया था तथा इसके पास एक बावड़ी भी बनवाई थी जिसे ‘गंगा बावड़ी’ कहते है।
  • - मंडोर में स्थित रावण का मन्दिर उत्तरी भारत का पहला रावण मन्दिर है, माना जाता है कि रावण की पत्नी मन्दोदरी श्रीमाली ओझा जाति की मण्डोर की निवासी थी। रावण की मूर्ति को अनुग्रह मूर्ति कहा जाता है।
  • बीस खम्भों की छतरी/सिंघबियों की छतरियाँ- यहाँ की प्रमुख छतरियाँ-अखैराज, जैसलमेर रानी, अहाड़ा हिंगोला की छतरी है।
  • बड़े मिंया की हवेली, पाल हवेली, राखी हवेली, पोकरण हवेली, पच्चिसां हवेली, आसोप हवेली, सांगीदास धानवी की हवेली (फलौदी), लालचन्द ढड़्डा की हवेली (फलौदी), मोती लाल अमरचन्द कोचर हवेली, फूलचन्द गोलछा हवेली (फलौदी) जोधपुर जिले की प्रसिद्ध हवेलियाँ हैं। पुष्य हवेली विश्व की एकमात्र ऐसी हवेली माना जाता है, जिसका निर्माण पुष्य नक्षत्र में हुआ।
  • सीरवी जाति की कुल देवी आई माता का मन्दिर, बिलाड़ा (जोधपुर) में हैं जो माता नव दुर्गा का अवतार मानी जाती है। इनका बचपन का नाम जीजीबाई था। उन्होंने आई पंथ की स्थापना नीम के वृक्ष के नीचे की थी जहाँ मंदिर बना है। इनके गुरु रामदेवजी थे। आई माता के मन्दिर को दरगाह, थान या वडेर कहते हैं। माता के इस मन्दिर में कोई मूर्ति नहीं है तथा दीपक की ज्योति से केसर टपकती है। इस मन्दिर में गुर्जर जाति का प्रवेश निषेध है। माता की पूजा प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष द्वितीया को की जाती है।
  • ऊँटा माता का मंदिर भी जोधपुर में है।
  • नागणेची माता मण्डोर (जोधपुर) के राठौड़ों व लोकदेवता कल्लाजी की कुलदेवी। माता की प्रतिमा-18 भुजाओं की, इस माता का दूसरा रूप श्येन पक्षी या बाज या चील है।
  • लटियाल माता फलौदी (जोधपुर) में है। यह पुष्करणा ब्राह्मणों की कुल देवी है। माता के खेजड़ी वृक्ष की पूजा होती है, इसलिए इसे खेजड़ी बेरिराय भवानी कहते हैं।
  • लोकदेवता पाबूजी का जन्म कोलू गाँव (फलौदी) में हुआ था। पाबू जी को ऊँटों के देवता, लक्ष्मण का अवतार, हाड़-फाड़ का देवता कहा जाता है। पाबूजी बांई ओर झुकी हुई पाग के लिए प्रसिद्ध है। इनका मेला-चैत्र अमावस्या को कोलू गाँव में भरा जाता है। पाबूजी की घोड़ी का नाम केसर कालमी था। इन्होने देवली चारणी की गायों को छुड़ाते हुए जोधपुर के देंचू में प्राण त्यागे। सबसे लोकप्रिय फड़ पाबूजी की ही है, जिसे रावण हत्था वाद्य यन्त्र के साथ बाँची जाती है।
  • राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान संस्थान की स्थापना 1950 ई. में जोधपुर में की गई।
  • जोधपुर में एम्स मेडिकल कॉलेज सितम्बर 2012 से शुरु हुआ।
  • जोधपुरी कोट-पेन्ट को राष्ट्रीय पोशाक माना जाता है।
  • भारत समन्वित बाजरा अनुसंधान संस्थान परियोजना का मुख्यालय जोधपुर में है।
  • राजस्थान विधि विश्वविद्यालय तथा राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर में हैं।
  • स्टेट रिमोट सेसिंग एप्लीकेशन सेंटर जोधपुर में है।
  • राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर में सन 1957 में स्थापित हुई थी।
  • राज्य का प्रथम हज हाउस का लोकार्पण जोधपुर में 1 अप्रैल, 2012 को हुआ।
  • राज्य का दूसरा निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्क जोधपुर में स्थापित हुआ।
  • राज्य का प्रथम स्पाइस पार्क जोधपुर में शुरू हुआ।
  • केन्द्रीय शुष्क भूमि क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) जोधपुर में स्थित है।
  • शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI) जोधपुर में स्थित है।
  • खजूर पौध प्रयोगशाला जोधपुर के चौपासनी में है, जो देश की पहली व एशिया की दूसरी सबसे बड़ी प्रयोगशाला है जिसे राज्य सरकार व गुजरात की अतुल राजस्थान डेटपाम लिमिटेड की साझेदारी से बनाया गया।
  • जोधपुर के नारग गाँव में एशिया के सबसे बड़े जर्म प्लाज्म स्टेशन का शिलान्यास 14-08-07 को हुआ।
  • मीरां बाई अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जोधपुर में है।
  • भारत का प्रथम हैरिटेज होटल अजीत भवन (जोधपुर) है।
  • जोधपुर के पाल गाँव में राजस्थान की फिल्म सिटी अवस्थित है।
  • जोधपुर में राज्य की पहली फुटबॉल अकादमी की स्थापना की गई थी।
  • देश का तीसरा कारकस प्लांट में जोधपुर लगाया गया (प्रथम-दिल्ली, दूसरा-जयपुर)।
  • मुख्यमंत्री बालिका सम्बल योजना की शुरुआत 13-08-2007 को जोधपुर में हुई।
  • उम्मेद कला पीठ चित्रशैली जोधपुर की है (संस्थापक-लाल सिंह भाटी)।
  • राजस्थान का प्रथम फ्लाईंग क्लब जोधपुर में शुरू हुआ था।
  • देश का प्रथम कोयला आधारित बिजलीघर बाप (जोधपुर) है।
  • लोलावास नमक जोधपुर की इस पिछड़ी ढ़ाणी में विलायती बबूल को जलाकर बिजली बनाने का राजस्थान में अपनी तरह का पहला टेस्ट पायलट प्रोजेक्ट प्रारम्भ किया गया है।
  • राष्ट्रीय कला मण्डल की स्थापना जोधपुर में 1954 में संस्थापक गोवर्धन लाल काबरा द्वारा की गई।
  • लोककलाविद कोमल कोठारी द्वारा स्थापित रूपायन संस्थान बोरुंदा (जोधपुर 1960) में है।
  • कुरजां पक्षी (साईबेरियन) खींचन, गाँव (जोधपुर), शीतकाल में बहुतायत में साईबेरिया से आते है।
  • गोमठ (फलौदी, जोधपुर) का ऊँट बोझा ढ़ोने के लिए प्रसिद्ध है।
  • अश्व प्रजनन केन्द्र बिलाड़ा में है।
  • राजस्थान का दूसरा ‘एग्रो फूड पार्क’- बोरनाड़ा में है।
  • बादामी संगमरमर जोधपुर में पाया जाता है।
  • राज्य का प्रथम सौर ऊर्जा आधारित फ्रीज बालेसर में लगाया गया।
  • राज्य का प्रथम हेण्डीक्रॉफ्ट ‘सेज’ बोरनाड़ा, जोधपुर में है।
  • केन्द्र सरकार द्वारा जोधपुर में ‘ग्वारगम प्रयोगशाला’ की स्थापना की मंजूरी दे दी गई।
  • राज्य का दूसरा व सबसे बड़ा सफेद सीमेंट का कारखाना—बिरला व्हाइट सीमेंट वर्क्‍स-1998 में खारिया-खंगार, जोधपुर में है।
  • केन्द्रीय ऊन बोर्ड जोधपुर में है।
  • जोधपुर का रातानाड़ा हवाई अड्डा सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
  • रन क्षेत्र (लवणीय दल क्षेत्र)-बाप (जोधपुर)।
  • राजस्‍थान राज्य का सर्वाधिक शुष्क स्थान—फलौदी।
  • जनाना बाग—बालसमन्द झील के पास (सूरसिंह द्वारा अपनी रानी के लिए)
  • जोधपुर दुर्ग में कीलम जड़ि‍त मरकत मणि के दो गुलाबी प्यालेनुमा जलाशय विख्यात है—(i) गुलाबसागर (ii) गुलाब सागर का बच्चा।
  • जालौरिया का वास (अधरशिला, जोधपुर)—अधरशिला मंदिर का स्तम्भ जमीन से 0.5 ईंच ऊपर उठा हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है कि यह मन्दिर झूल रहा है। यह मन्दिर रामदेवजी का है।
  • दशहरा शोक पर्व—मण्डोर (जोधपुर) में मनाया जाता है।
  • दशहरा के अवसर पर मेहरानगढ़ (जोधपुर) से राम की सवारी निकाली जाती है।
  • रामड़ावास (जोधपुर) में जाम्भोजी का तीर्थ स्थल है।
  • खेड़ापा (जोधपुर) में रामस्नेही सम्प्रदाय की पीठ है, इसका संस्थापक रामदास। नाथ सम्प्रदाय की प्रधान पीठ—महामंदिर (जोधपुर) है। महामंदिर का निर्माण मानसिंह राठौड़ ने करवाया था।
  • जोधपुर के तैय्यब खान को बंधेज कार्य हेतु पद्मश्री से सम्मानित किया था।
  • मोठड़ा (जब लहरिये की लाइने एक-दूसरे को काटती है, तो वह मोठड़ा कहलाता है) जोधपुर का प्रसिद्ध है।
  • लकड़ी के झूले, चुनरी, लाख का काम, जस्ते की मूर्तियाँ व वस्तुएँ, बादला, चमड़े की मोजडिय़ाँ, मिनिएचर पेंटिग्स जोधपुर के प्रसिद्ध है।
  • फलौदी को पश्चिमी काशी कहा जाता है।
  • मलमल-मथानियाँ व तनसुख की प्रसिद्ध है। मथानिया मिर्ची उद्योग हेतु भी प्रसिद्ध है।
  • ईसबगोल अनुसंधान केन्द्र—जोधपुर।
  • राज्य की प्रथम हाइटेक जीरा मण्डी—भदवासिया।

जोधपुर के प्रसिद्ध व्‍यक्तित्‍व -



  • राव चन्द्रसेन— मारवाड़ का प्रताप, भूला-बिसरा राजा, ”मारवाड़ का विस्मृत नायक” आदि नामों से प्रसिद्ध है।

  • मुहणौत नैणसी - इनको ”राजपूताने का अबुल फजल”, जयपुर निवासी मुंशी देवी प्रसाद ने कहा। इन्होंने ”मुहणौत नैणसी री ख्यात” व ”मारवाड़ रा परगना री विगत” (राजस्थान का गजेटियर) की रचना की। मुहणौत नैणसी ने जालौर के शासक कीर्तिपाल को ”कित्तु एक महानराजा” की उपाधि दी थी।

  • ज्‍योति स्‍वरूप शर्मा - इन्‍होंने रेणुका आर्ट्स हस्‍तशिल्‍प शोध संस्‍थान की स्‍थापना की।

  • मेजर शैतान सिंह— द्वितीय परमवीर चक्र विजेता (1962)।

  • विजयदान देथा— जन्म बोरुन्दा, जोधपुर 1926 ई.। ग्रन्थ-बातां री फुलवारी 2007 में पद्म श्री से सम्मानित।

  • सुमनेश जोशी— ‘रियासती’ दैनिक समाचार पत्र के सम्पादक। इसी अखबार ने 26 मई, 1948 को जोधपुर के राजा हनुवंत सिंह के पाकिस्तान में मिलने के इरादों का भण्डाफोड़ किया।

  • डॉ. सीताराम लालस— नरेना, इनकी रचना ”राजस्थानी भाषा का शब्दकोश” है इसमें 10 खण्ड है, एन्साइक्लोपेडिया ऑफ ब्रिटेनिका ने इन्हें ‘राजस्थानी जुबान की मशाल’ कहकर सम्बोधित किया।

  • नारायण सिंह माणकलाव— राज्यसभा में मनोनीत प्रथम राजस्थानी।

  • कैलाश सांखला— पर्यावरणविद् सांखला ‘टाइगर मैन’ के उपनाम से प्रसिद्ध।

  • गवरी देवी— मांड गायिका।

  • लालसिंह भाटी— गैंडों की खाल से बनी ढ़ाल पर नक्काशी करने हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित।

  • महिपाल— प्रथम राजस्थानी फिल्म नजराना (1942) के अभिनेता।

  • गरिमा गुप्ता— शून्य गुरुत्वाकर्षण में प्रयोग करने वाली देश की प्रथम छात्रा (17-3-07)।

2 टिप्पणियाँ:

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