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राजपूताना मध्य भारत सभा -


  • इस सभा का कार्यालय अजमेर में था। इसकी स्थापना 1918 ई. को दिल्ली कांग्रेस अधिवेशन के समय चाँदनी चौक के मारवाड़ी पुस्तकालय में की गई थी। यही इसका पहला अधिवेशन कहलाता है।
  • इसका प्रथम अधिवेशन महामहोपाध्याय पंडित गिरधर शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस संस्था का मुख्यालय कानपुर रखा गया, जो उत्तरी भारत में मारवाड़ी पूंजीपतियों और मजदूरों का सबसे बड़ा केन्द्र था। 
  • देशी राज्यों की प्रजा का यह प्रथम राजनैतिक संगठन था। इसकी स्थापना में प्रमुख योगदान गणेश शंकर विद्यार्थी, विजयसिंह पथिक, जमनालाल बजाज, चांदकरण शारदा, गिरधर शर्मा, स्वामी नरसिंह देव सरस्वती आदि के प्रयत्नों का था। 
  • राजपूताना मध्य भारत सभा का अध्यक्ष सेठ जमनालाल बजाज को तथा उपाध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी को बनाया गया।
  • इस संस्था के माध्यम से जनता को जागीरदारी शोषण से मुक्ति दिलाने, रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना करने तथा जनता में राजनैतिक जागृति लाने का प्रयास किया गया। 
  • इस कार्य में संस्था के साप्ताहिक समाचार पत्र ''राजस्थान केसरी'' व सक्रिय कार्यकर्ताओं की भूमिका उल्लेखनीय है। 
  • इस सभा के अग्रणी कार्यकर्ता निम्नलिखित व्यक्ति थे -

1. श्री विजय सिंह पथिक - अजमेर

2. श्री चाँदकरण शारदा - अजमेर

3. श्री गणेशनारायण सोमानी - जयपुर

4. श्री स्वामी नरसिंह देव - जयपुर

5. डा. अम्बालाल दाधीच - अजमेर

6. कुंवर मदन सिंह - करौली

7. श्री राजा बहादूर गोविन्द लाल - बम्बई

8. श्री ठाकुर केसरी सिंह पित्री - कोटा

9. श्री कन्हैया लाल कलयंत्री - फलौदी

10. श्री सुख सम्पतिरायभण्डारी - इन्दौर

11. श्री जमनालाल बजाज - सीकर

12. श्री अर्जुनलाल सेठी - जयपुर

13. श्री गणेश शंकर - जयपुर

14. श्री केसरी सिंह बारहट - शाहपुरा

सभा का मुख्य उद्देश्य-

इसका मुख्य उद्देश्य रियासतों की जनता में जागृति लाना तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्देश्यों व गतिविधियों से यहाँ की जनता को अवगत करवाना था।
इस सभा ने अपने कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए विभिन्न स्थानों पर 'सेवा समितियों' की स्थापना की। इन समितियों के माध्यम से राजस्थान से बाहर रहने वाले राजस्थानियों से सहयोग लिया जाता था तथा जनता के विरूद्ध किये जाने वाले अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठायी जाती थी।

अधिवेशन- 

  • इसका दूसरा अधिवेशन 29 दिसम्बर 1919 में अमृतसर में आयोजित  गया, जबकि मार्च 1920 में तीसरा अधिवेशन जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में अजमेर में आयोजित किया गया।
  • दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के समय सभा ने देशी राज्यों के 400 प्रतिनिधियों का एक विशाल सम्मेलन (चौथा अधिवेशन) आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता गणेश नारायण सोमानी ने की थी। इस सम्मेलन से प्रभावित होकर गाँधीजी ने रियासती प्रतिनिधियों को कांग्रेस में सम्मिलित कर लिया अर्थात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में हो रहा राजपूताना मध्य भारत सभा को कांग्रेस की सहयोगी संस्था मान लिया गया। साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि राजाओं के अत्याचारों के विरूद्ध कांग्रेस में प्रस्ताव पास हो सकेगें, लेकिन कांग्रेस रियासतों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी। 
  • काँग्रेस के नागपुर अधिवेशन के समय 1920 में राजपूताना मध्य भारत सभा को कांग्रेस की सहयोगी संस्था मान लिया गया। राजपूताना मध्य भारत सभा के चौथे अधिवेशन के अध्यक्ष नरसिंह चिंतामणि केलकर निर्वाचित हुए थे किन्तु कुछ कारणों से वह नागपुर नहीं पहुंच पाए तथा इस कारण जयपुर के गणेश नारायण सोमानी को सर्वसम्मति से सभा का अध्यक्ष चुना गया। 
  • कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में एक प्रदर्शनी भी लगाई थी जो किसानों की दयनीय स्थिति को दर्शाती थी। राजस्थान के नेताओं के दबाव के कारण कांग्रेस में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें राजस्थान के राजाओं से आग्रह किया गया कि वह अपनी प्रजा को शासनमें भागीदार बनाएं।

इस प्रकार इस सभा के प्रयासों से रियासती मुद्दों को कांग्रेस में जगह मिल पायी तथा कांग्रेस के रचनात्मक आन्दोलन को रियासतों में भी लोकप्रियता मिली। साथ ही सभा की मध्यस्थता से जागीरदारी शोषण के कई मुद्दे सुलझाये गये। 
जैसे-
  • अजमेर के इस्तमरारी इलाके पीसांगन राजा के द्वारा नये कर लगाने व बेगार प्रथा के कारण जनता पीड़ित थी। सभा ने अजमेर कमिश्नर से निवेदन कर जनता को इससे मुक्ति दिलायी। 
  • जयपुर के तोरावाटी निजामत के भौमियों के विवाद को भी सुलझाया गया। 
  • मलसीसर (शेखावटी) के ठाकुर तथा रामगढ़ के कोतवाल द्वारा दरिद्रों व अस्पृश्य जातियों के लिए संचालित 7 पाठशालाओं पर प्रतिबंध लगाया गया जिसे सभा ने जयपुर स्टेट कौंसिल से अपील कर खारिज करवाया। 
  • सेठ जमनालाल बजाज, चाँदकरण शारदा, कन्हैयालाल कलयंत्री आदि ने जयपुर के विभिन्न भागों का दौरा कर खद्दर के प्रचार की आड़ में राजनैतिक आन्दोलन की तैयारी की। इसी प्रकार अन्य रियासतों का दौरा भी किया गया।

अमर सेवा समिति एवं  प्याऊ आन्दोलन-  

  • इसी प्रकार शेखावटी क्षेत्र में सार्वजनिक सेवा कार्यों के नाम पर स्थापित सेवा समितियों की आड़ में जागीरी अत्याचार का विरोध किया जाता था। खेतड़ी ठिकाने के किसानों को यहाँ के रावराजा के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए चिड़ावा में अमर सेवा समितिबनाई गई।  
  • गुलाबराय नेमाणी, धर्मकिशोर श्रीवास्तव व बाबू प्यारेलाल गुप्ता को स्वयंसेवक बनाया गया। इन्होंने यहाँ ’प्याऊ आन्दोलन’ चलाया। ये प्याऊ पर पानी पिलाने की आड़ में लोगों को विरोध व संघर्ष के तरीके सिखाते थे।  
  • खेतड़ी के रावराजा को इस पर शक हो गया था। उसने सेवा समिति भंग की दी तथा तीनों स्वयंसेवको को जेल भेज दिया। राजपूताना मध्य भारत सभा ने सभी समाचार पत्रों में इसकी तीव्र आलोचना की। सभा के मंत्री चाँदकरण शारदा तथा कन्हैयालाल कलयंत्री कुछ स्वयंसेवको को लेकर घटनास्थल पहुँचे। प्रारंभ में रावराजा ने इनसे समझौता करने से इन्कार कर दिया। लेकिन स्वयंसेवकों को सत्याग्रह व कष्ट भोगने को उद्यत देखकर चिड़ावा व रामगढ़ के स्वयंसेवकों को रिहा कर दिया गया। इस प्रकार सभा की यह बड़ी जीत हुई।
  • सभा के प्रयासों से सनातम धर्म सभा के मंत्री ज्योतिर्विद पं. शिवचंदन शर्मा को रिहा किया गया। इन्हें अकारण ही गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाये जेल में कैद कर दिया गया था।

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