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राजस्थान की प्रमुख सिंचाई व नदी घाटी परियोजनाएं-

1. इन्दिरा गांधी नहर जल परियोजना IGNP-

यह परियोजना पूर्ण होने पर विश्व की सबसे बड़ी परियोजना होगी इसे प्रदेश की जीवन रेखा/मरूगंगा भी कहा जाता है। पहले इसका नाम राजस्थान नहर था। 2 नवम्बर 1984 को इसका नाम इन्दिरा गांधी नहर परियोजना कर दिया गया है। बीकानेर के इंजीनियर कंवर सैन ने 1948 में भारत सरकार के समक्ष एक प्रतिवेदन पेश किया जिसका विषय ‘ बीकानेर राज्य में पानी की आवश्यकता‘ था। 1958 में इन्दिरा गांधी नहर परियोजना का निर्माण कार्य की शुरूआत हुई लेंकिन उससे पहले सन् 1955 के अर्न्तराष्ट्रीय समझौते के दौरान रावी और व्यास नदियों से उपलब्ध 19,568 मिलियन क्यूबिक जल में से 9876 क्यूबिक जल राजस्थान को पहले ही आवंटित किया जाने लगा था। राजस्थान के हिस्से का यह पानी पंजाब के ‘‘हरिके बैराज‘‘ से बाड़मेर जिले में गडरा रोड तक लाने वाली 9413 कि.मी. लम्बी इस नहर परियोजना द्वारा राजस्थान को आवंटित जल में से 1.25 लाख हेक्टेयर मीटर जल का उपयोग गंगनहर, भांखडा नहर व सिद्वमुख फीडर में दिया जाने लगा। इन्दिरा गांधी नहर जल परियोजना IGNP का मुख्यालय (बोर्ड) जयपुर में है।
इस नहर का निर्माण का मुख्य उद्द्देश्य रावी व्यास नदियों के जल से राजस्थान को आवंटित 86 लाख एकड़ घन फीट जल को उपयोग में लेना है। नहर निर्माण के लिए सबसे पहले फिरोजपुर में सतलज, व्यास नदियों के संगम पर 1952 में हरिकै बैराज का निर्माण किया गया। हरिकै बैराज से बाड़मेर के गडरा रोड़ तक नहर बनाने का लक्ष्य रखा गया। जिससे श्री गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर व बाड़मेर को जलापूर्ति हो सके। नहर निर्माण कार्य का शुभारम्भ तत्कालीन गृहमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत ने 31 मार्च 1958 को किया । 11 अक्टूबर 1961 को इससे सिंचाई प्रारम्भ हो गई, जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन ने नहर की नौरंगदेसर वितरिका में जल प्रवाहित किया था। इस नहर की कुल लम्बाई 649 किमी है।

इन्दिरा गांधी नहर परियोजना के दो भाग हैं-

1. प्रथम भाग-

प्रथम भाग राजस्थान फीडर कहलाता है इसकी लम्बाई 204 कि.मी. (169 कि.मी. पंजाब व हरियाणा 14 किमी हरियाणा में तथा शेष 21 कि.मी. राजस्थान) है। जो हरिकै बैराज से हनुमानगढ़ के मसीतावाली हैड तक विस्तारित है। नहर के इस भाग में जल का दोहन नहीं होता है। 

2. दूसरा भाग -

इन्दिरा गांधी नहर परियोजना का दूसरा भाग मुख्य नहर है। मुख्य नहर के तल की निकास स्थल पर चौडाई 40 मीटर व गहराई 6-7 मीटर है। इसकी लम्बाई 445 किमी. है। नहर में जल प्रवाह क्षमता 523 घनमीटर प्रति  सैकन्ड है। यह मसीतावाली से जैसलमेर के मोहनगढ़ कस्बे तक विस्तारित है। इस प्रकार इन्दिरा गांधी नहर परियोजना की कुल लम्बाई 649 किमी. है। यह विश्व की सबसे बड़ी परियोजना में से एक होगी, जिसकी वितरिकाओं की लम्बाई 9424 किमी. (distribution system Harrika barrage to Gadra Road) है तथा नहरों व नालियों की कुल लम्बाई 64 हजार किमी होगी। इन्दिरा गांधी नहर के निर्माण के प्रथम चरण में राजस्थान फीडर सूरतगढ़, अनूपगढ़, पूगल शाखा का निर्माण हुआ है। इसके साथ-साथ 3075 किमी. लम्बी वितरक नहरों का निर्माण हुआ है। इसका निर्माण 1963 लाख हैक्टेयर सिंचाई योग्य भूमि के लिए  जल उपलब्ध  कराने के लिए किया गया है।
राजस्थान फीडर का निर्माण कार्य सन् 1975 में पूरा हुआ। नहर निर्माण के द्वितीय चरण में 256 किमी. लम्बी मुख्य नहर और 5112 किमी. लम्बी वितरक प्रणाली का लक्ष्य रखा गया है। नहर का द्वितीय चरण बीकानेर के पूगल क्षेत्र के सतासर गांव से प्रारम्भ हुआ था। जैसलमेर के मोहनगढ़ कस्बे में द्वितीय चरण पूरा हुआ है। इसलिए मोहनगढ़ कस्बे को इन्दिरा गांधी नहर का ZERO POINT कहते हैं।
मोहनगढ़ कस्बे से इसके सिरे से लीलवा व दीघा दो उपशाखाऐं निकाली गई है। द्वितीय चरण का कार्य 1972-73 में पूरा हुआ है। 256 किमी. लम्बी मुख्य नहर दिसम्बर 1986 में बनकर तैयार हुई थी। 1 जनवरी 1987 को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसमें जल प्रवाहित किया।
इन्दिरा गांधी नहर की कुल सिंचाई 30 प्रतिशत भाग लिफ्ट नहरों से तथा 70 प्रतिशत शाखाओं के माध्यम से होता है।
रावी - व्यास जल विवाद हेतु गठित इराड़ी आयोग(1966) के फैसले से राजस्थान को प्राप्त कुल 8.6 एम. ए. एफ. जल में से 7.59 एम. ए. एफ. जल का उपयोग इन्दिरा गांधी नहर के माध्यम से किय जायेगा।

इन्दिरा गांधी नहर के द्वारा राज्य के आठ जिलों - हनुमानगढ़, श्री गंगानगर, चूरू, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, जैसलमेर एवं बाड़मेर में सिंचाई हो रही है या होगी। इनमें से सर्वाधिक कमाण्ड क्षेत्र क्रमशः जैसलमेर एवं बीकानेर जिलों का है।

ऊँचे व दूर स्थित तथा पहुँच से दूर वाले भागों में जल जल पहुँचाने के लिए सात लिफ्ट नहरों का निर्माण कार्य किया गया है। इन्दिरा गांधी नहर से 7 शाखाएं निकाली गई है जो निम्न है -

क्र. स.लिफ्ट नहर का पुराना नामलिफ्ट नहर का नया नामलाभान्वित जिले
1गंधेली(नोहर) साहवा लिफ्टचैधरी कुम्भाराम लिफ्ट नहरहनुमानगढ़, चुरू, झुंझुनू
2.बीकानेर - लूणकरणसर लिफ्टकंवरसेन लिफ्ट नहरश्रीगंगानगर, बीकानेर
3.गजनेर लिफ्ट नहरपन्नालाल बारूपाल लिफ्ट नहरबीकानेर, नागौर
4.बांगड़सर लिफ्ट नहरभैरूदम चालनी वीर तेजाजी लिफ्ट नहरबीकानेर
5.कोलायत लिफ्ट नहरडा. करणी सिंह लिफ्ट नहरबीकानेर, जोधपुर
6.फलौदी लिफ्ट नहरगुरू जम्भेश्वर जलोत्थान योजनाजोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर
7.पोकरण लिफ्ट नहरजयनारायण व्यास लिफ्टजैसलमेर, जोधपुर
8.जोधपुर लिफ्ट नहर(170 किमी. + 30 किमी. तक पाईप लाईन)राजीव गांधी लिफ्ट नहरजोधपुर


बीकानेर - लूणकरणसर लिफ्ट नहर सबसे लम्बी बड़ी नहर है।

इन्दिरा गांधी नहर की 9 शाखाएं है।

1. रावतसर(हनुमानगढ़)

 यह इन्दिरा गांधी नहर की प्रथम शाखा है जो एक मात्र ऐसी शाखा है। जो नहर के बाईं ओर से निकलती है।

श्री गंगानगर

2. सूरतगढ़
3. अनूपगढ़

बीकानेर

4. पूगल
5. चारणवाला
6. दातौर
7. बिरसलपुर

जैसलमेर

8. शहीद बीरबल
9. सागरमल गोपा

इन्दिरा गांधी नहर की 4 उपशाखाएं है -

1. लीलवा
2. दीघा। ये मोहनगढ़ से निकाली गयी हैं।
3. बरकतुल्ला खां (गडरा रोड उपशाखा़)
सागरमल गोपा शाखा से निकाली गई है।
4. बाबा रामदेव उपशाखा
इन्दिरा गांधी नहर से हनुमानगढ़, श्री गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, चुरू, जोधपुर, झुझुनू को पेयजल उपलब्ध हो सकेगा। तथा 18.36 लाख हैक्टेयर सिंचाई योग्य क्षेत्र उपलब्ध हो सकेगा।

इन्दिरा गांधी नहर में पानी के नियमित बहाव के लिए निम्न उपाय है।
1. व्यास - सतलज नदी पर बांध
2. व्यास नदी पर पौंग बांध
3. रावी - व्यास नदियों के संगम पर पंजाब के माधोपुर नामक स्थान पर एक लिंक नहर का निर्माण।
गंधेली साहवा लिफ्ट नहर से जर्मनी के सहयोग से ‘आपणी योजना‘ बनाई गई है। इस योजना के प्रथम चरण में हनुमानगढ़, चूरू, और इसके द्वितीय चरण में चूरू व झुँझुनू के कुछ गांवों में जलापुर्ति होगी।
इन्दिरा गांधी नहर की सूरतगढ़ व अनूपगढ़ शाखाओं पर 3 लघु विद्युत गृह बनाये गये है। भविष्य में इस नहर को कांडला बन्दरगाह से जोड़ने की योजना है। जिससे यह भारत की राइन नदी बन जाएगी।
डा. सिचेन्द द्वारा आविष्कारित लिफ्ट ट्रांसलेटर यंत्र नहर के विभिन्न स्थानों पर लगा देने से इससे इतनी विद्युत उत्पन्न की जा सकती है जिससे पूरे उत्तरी - पश्चिमी राजस्थान में नियमित विद्युत की आपूर्ति हो सकती है।
यह नहर सतलज नदी से पंजाब के फिरोजपुर के हुसैनीवाला से निकाली गई है।
मुख्य नहर की लम्बाई 129 कि.मी. है।(112 कि.मी. पंजाब + 17 कि.मी. राजस्थान) फिरोजपुर से शिवपुर हैड तक है। नहर की वितरिकाओं की लम्बाई 1280 कि.मी. है। लक्ष्मीनारायण जी, लालगढ़, करणीजी, समीक्षा इसकी मुख्य शाखा है। नहर में पानी के नियमित बहाव और नहर के मरम्मत के समय इसे गंगनहर लिंक से जोड़ा गया है।यह लिंक नहर व हरियाणा में लोहागढ़ से निकाली गई है। और श्रीगंगानगर के साधुवाली गांव में गंगनहर से जोड़ा गया है।
31 मई 2000 को केन्द्रीय जल आयोग ने नहर के रख रखाव व मरम्मत हेतु आर्थिक सहायता प्रदान की है।

2. गंगनहर परियोजना -

यह भारत की प्रथम नहर सिंचाई परियोजना है। राजस्थान के पश्चिमी भागों में वर्षा बहुत ही कम होने के कारण तत्कालीन बीकानेर के महाराजा श्री गंगासिंह ने गंगनहर का निर्माण करवाया था। महाराजा गंगासिंह के प्रयासों से गंगनहर के निर्माण द्वारा सतलज नदी का पानी राजस्थान में लाने हेतु 4 दिसम्बर 1920 को बीकानेर, भावलपुर और पंजाब राज्यों के बीच सतलज नदी घाटी समझौता हुआ था। गंगनहर की आधारशिला फिरोजपुर हैडबाक्स पर 5 सितम्बर 1921 को महाराजा गंगासिंह द्वारा रखी गई। 26 अक्टूबर 1927 को तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने श्री गंगानगर के शिवपुर हैड बॉक्स पर उद्घाटन किया था। इस नहर का उद्गम स्थल सतलज नदी से फिरोजपुर के निकट हुसैनीवाला से माना जाता है। गंगनहर श्री गंगानगर के संखा गांव में यह राजस्थान में प्रवेश करती है। शिवपुर, श्रीगंगानगर, जोरावरपुर, पदमपुर, रायसिंह नगर, स्वरूपशहर, होती हुई यह अनूपगढ़ तक जाती है। नहर की वितरिकाओं की लम्बाई 1280 कि.मी. है। लक्ष्मीनारायण जी, लालगढ़, करणीजी, समीक्षा इसकी मुख्य शाखा है। नहर में पानी के नियमित बहाव और नहर के मरम्मत के समय इसे गंगनहर लिंक से जोड़ा गया है।यह लिंक नहर व हरियाणा में लोहागढ़ से निकाली गई है। और श्रीगंगानगर के साधुवाली गांव में गंगनहर से जोड़ा गया है। गंगनहर की कुल लम्बाई 292 कि.मी. है।

गंगनहर लिंक चैनल-

सन् 1984 में एक लिंक चैनल जो 80 कि.मी. लम्बा है का निर्माण किया गया। इसे गंगनहर लिंक चैनल कहते है। गंगनहर लिंक चैनल का उद्गम स्थल हरियाणा के लोहागढ़ नामक स्थान पर हुआ है। यह चैनल इन्दिरा गांधी मुख्य नहर से जोडी गई है। चैनल का प्रारम्भिक 7 कि.मी. हिस्सा हरियाणा राज्य में पडता है। लिंक चैनल की क्षमता 3200 क्यूसेक्स पानी की है। इसे निकटवर्ती ग्राम साधुवाली को निकट गंगनहर में जोडा़ गया है।

3. भरतपुर नहर परियोजना-

पेयजल व्यवस्था हेतु सन् 1906 में तत्कालीन भरतपुर नरेश के प्रयासस्वरूप भरतपुर नहर परियोजना का निर्माण किया गया लेंकिन पूर्ण कार्य 1963-64 में हुआ। इस नहर को पश्चिम यमुना से निकलने वाली आगरा नहर के सहारे 111 कि.मी. के पत्थर से निकाला गया। यह कुल 28 कि.मी. (16 उत्तर प्रदेश + 12 राजस्थान) लम्बी है। इससे भी भरतपुर में जलापूर्ति होती है।

4. गुडगाँव नहर परियोजना -

हरियाणा व राजस्थान की सरकारों के प्रयत्नों का परिणाम है। यह नहर हरियाणा व राजस्थान की संयुक्त नहर है। इस नहर के निर्माण का लक्ष्य यमुना नदी के अतिरिक्त पानी का मानसून काल में उपयोग करना है। 1966 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ एवं 1985 में पूरा हुआ। यह नहर यमुना नदी में उत्तरप्रदेश के औंखला से निकाली गई है। नहर की क्षमता 2100 क्यूसेक है जिसमें से राजस्थान को 500 क्यूसेक पानी का हिस्सा प्राप्त है। नहर यमुना नदी से ओखला के निकट से निकाली गई है तथा राजस्थान में भरतपुर जिले की कामां तहसील में जुरेश गांव के पास से यह राज्य में प्रवेश करती है। नहर की कुल लम्बाई राजस्थान राज्य में 58 कि.मी. है। है। इससे भरतपुर की कामा व डींग तहसील की जलापूर्ति होती है। आजकल इसे यमुना लिंक परियोजना कहते हैं।

5. चम्बल नदी घाटी परियोजना -

राजस्थान एवं मध्यप्रदेश राज्यो के सहयोग से बनी यह परियोजना पेयजल प्राप्ति के लिए स्वतंत्रता के बाद से ही 1952 -54 में ही प्रारम्भ की गई थी। पेयजल की दृष्टि से परियोजना का 50 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान का था, सर्वप्रथम परियोजना की शुरूआत 1943 में कोटा के निकट एक बाँध बनाये जाने के रूप में हुई।

(अ) गांधी सागर बाँध -

यह बांध 1960 में मध्यप्रदेश की भानपुरा तहसील में भानपुरा से 33 कि.मी. दूर और मध्यप्रदेश के चौरासीगढ से 8 कि.मी. दूर जहाँ घाटी की चौड़ाई कम है, गांधी सागर बाँध 1960 में बनाया गया। यह बांध चौरासीगढ़ में 8 कि.मी. पहले एक घाटी में बना हुआ है। यह बाँध 514 मीटर लम्बा एवं 62.17 मीटर ऊँचा है। इसके ऊपर 5 मीटर चौडी़ सडक़ बनायी गयी है व अतिरिक्त जल निकालने के लिए स्पिलवे भाग में 18.2 x 8.5 वर्गमीटर के 10 फाटक बनाये गये है। इन नहरों की कुल लम्बाई में से 261 कि.मी. राजस्थान में तथा 641 कि.मी. मध्यप्रदेश में है। इससे 2 नहरें निकाली गई है।

1. बाईं नहर - बूँदी तक जाकर मेेज नदी में मिलती है।

2. दांयी नहर - पार्वती नदी को पार करके मध्यप्रदेश में चली जाती है। यहां पर गांधी सागर विद्युत स्टेशन भी है।

(ब) राणा प्रताप सागर बाँध परियोजना -

गांधी सागर बाँध से 48 कि.मी. दूरी पर स्थित यह बाँध 1143 मीटर लम्बा और 53.9 मीटर ऊँचा है। इसके द्वारा बनाने वाले जलाशय का क्षेत्रफल 113 वर्ग कि.मी. है और उसमें 2905 Mcum जल समा सकता है। यहां एक विद्युत शक्ति गृह भी बनाया गया है। यह बांध चित्तौड़गढ़ में चूलिया जल प्रपात के समीप रावतभाटा नामक स्थान पर 1970 में बनाया गया है।

(स) कोटा बाँध अथवा जवाहर सागर परियोजना -

यह बाँध राणा प्रताप सागर बाँध से लगभग 33 कि.मी. दूर बोरावास ग्राम के समीप बनाया गया है। इसे कोटा बांध भी कहते हैं। यह बाँध 395.19 मीटर लम्बा और 36 मीटर ऊँचा है। इस बाँध की जल धारण क्षमता 67.11Mcum मीटर है। यहां एक विद्युत शक्ति गृह भी बनाया गया है।

कोटा बैराज परियोजना -

कोटा बाँध से 16 कि.मी. आगे कोटा नगर के पास 600 मीटर लम्बा और 36 मीटर ऊँचा कोटा बैराज का निर्माण किया गया है। इस बाँध की जल संग्रहण की क्षमता 76,460 लाख घनमीटर है।

1. दाईं नहर - पार्वती व परवन नदी को पार करके मध्यप्रदेश में चली जाती है।

2. बायी नहर - कोटा, बूँदी, टोंक, सवाई माधोपुर, करौली में जलापूर्ति करती है।

6 भाखडा़ नांगल परियोजना -

भाखडा नांगल परियोजना बहुउद्धेशीय नदी घाटी योजनाओं में से भारत की सबसे बडी़ योजना है, जो राजस्थान, पंजाब व हरियाणा की संयुक्त परियोजना है। जिसकी जल भराव क्षमता एक करोड़ क्यूबिक मीटर है। इसकी लम्बाई 96 कि.मी. है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश की संयुक्त परियोजना है। इसमें राजस्थान का हिस्सा 15.2 प्रतिशत है। हिमाचल प्रदेश का हिस्सा केवल जल विधुत के उत्पादन में ही है। सर्वप्रथम पंजाब के गर्वनर लुईस डैन ने सतलज नदी पर बांध बनाने का विचार प्रकट किया।
इस बांध का निर्माण 1946 में प्रारम्भ हुआ एवं 1962 को इसे राष्ट्र को समर्पित किया गया। यह भारत का सबसे ऊंचा बांध है।

इस परियोजना के अन्तर्गत निम्नांकित परियोजनाएं हैं-

क. भाखड़ा बांध-

इसका निर्माण पंजाब के होशियारपुर जिले में सतलज नदी पर भाखड़ा नामक स्थान पर किया गया है। इसका जलाशय गोविन्द सागर है। इस बांध को देखकर पं. जवाहरलाल नेहरू ने इसे चमत्कारिक विराट वस्तु की संज्ञा दी और बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को आधुनिक भारत का मन्दिर कहा है।

ख. नांगल बांध

यह बांध भाखड़ा से 12 कि.मी. पहले एक घाटी में बना है इससे 64 कि.मी. लम्बी नहर निकाली गई है जो अन्य नहरों को जलापूर्ति करती है।

ग. भाखड़ा मुख्य नहर

यह पंजाब के रोपड़ से निकलती है यह हरियाणा के हिसार के लोहाणा कस्बे तक विस्तारित है। इसकी कुल लम्बाई 175 कि.मी. है। इसके अलावा इस परियोजना में सरहिन्द नहर, सिरसा नहर, नरवाणा नहर, बिस्त दो आब नहर निकाली गई है। इस परियोजना से राजस्थान के श्री गंगानगर व हनुमानगढ़ चुरू जिलों को जल व विधुत एवं श्री गंगानगर, हनुमानगढ़, चुरू, झुँझुनू, सीकर बीकानेर को विद्युत की आपूर्ति होती है।

7. व्यास परियोजना व पोंग बाँध -

रावी और व्यास नदियों के जल का उपयोग करने के लिये पंजाब, हरियाणा और राजस्थान द्वारा सम्मिलित रूप से बहुउद्धेशीय परियोजना प्रारम्भ की गई। इस परियोजना को दो चरणों में पूरा किया गया। प्रथम चरण में व्यास सतलज लिंक नहर के रूप में तो द्वितीय चरण पोंग बाँध के रूप में बना है। इससे इन्दिरा गांधी नहर में नियमित जलापूर्ति रखने में मदद मिलती है।

रावी - व्यास जल विवाद

जल के बंटवारे के लिए 1953 में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, जम्मु - कश्मीर, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश राज्यों के बीच एक समझौता हुआ इसमें सभी राज्यों के लिए अलग- अलग पानी की मात्रा निर्धारित की गई लेकिन इसके बाद भी यह विवाद थमा नहीं तब सन् 1985 में राजीव गांधी लौंगवाला समझौते के अन्तर्गत न्यायमूर्ति इराडी की अध्यक्षता में इराडी आयोग बनाया गया था। इस आयोग ने राजस्थान के लिए 86 लाख एकड़ घन फीट जल की मात्रा तय की है।

8. माही बजाज सागर परियोजना -

आदिवासी क्षेत्र से लगभग 20 कि.मी. दूर बोरखेड़ा ग्राम के पास माही नदी पर माही बजाज सागर बाँध बनाया गया है। यह राजस्थान एवं गुजरात की संयुक्त परियोजना है। माही बजाज सागर परियोजना के अन्तर्गत बना यह बाँध गुजरात एवं राजस्थान सरकार के वर्ष 1966 में एक अनुबंध / समझौते का परिणाम है। ऐसे में केन्द्रीय बाँध का जल संग्रहण क्षेत्र 6240 वर्ग कि.मी. है, 1966 में हुए समझौते के अनुसार इस परियोजना में राजस्थान सरकार का 45 प्रतिशत व गुजरात सरकार का 55 प्रतिशत हिस्सा है।
इस परियोजना में गुजरात के पंचमहल जिले में माही नदी पर कड़ाना बांध का निर्माण किया गया है। इसी परियोजना के अंतर्गत बांसवाड़ा के बोरखेड़ा गांव में माही बजाज सागर बांध बना हुआ है। इसके अलावा यहां 2 नहरें, 2 विद्युत ग्रह, 2 लघु विद्युत ग्रह व 1 कागदी पिकअप बांध बना हुआ है। 1983 में इन्दिरा गांधी ने जल प्रवाहित किया। इस परियोजना से डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिलों की कुछ तहसीलों को जलापूर्ति होती है।

9. जवाई बाँध परियोजना -

इसे मारवाड़ का ‘अमृत सरोवर‘ भी कहते हैं। सन् 1946 में जोधपुर रियासत के महाराजा उम्मेद सिंह ने पाली में सुमेरपुर एरिनपुरा के पास स्टेशन से 2.5 कि.मी. की दूरी पर जवाई बाँध का निर्माण करवाया था। इसे 13 मई 1946 को शुरू करवाया, 1956 में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ। पहले इस बांध को अंग्रेज इंजीनियर एडगर और फर्गुसन के निर्देशन में शुरू करवाया बाद में मोतीसिंह की देखरेख में बांध का कार्य  पूर्ण हुआ। यह बांध लूनी नदी की सहायक जवाई नदी पर पाली के सुमेरपुर में बना हुआ है। इससे एक नहर और उसकी शाखाएं निकाली गयी हैं। जवाई बांध में पानी की आवक कम होने पर इसे उदयपुर के कोटड़ा तहसील में निर्मित सेई परियोजना से जोड़ा गया था। 9 अगस्त 1977 को सेई का पानी पहली बार जवाई बांध में डाला गया। इस बांध के जीर्णोद्धार का कार्य 4 अप्रैल 2003 को शुरू किया गया।



10. जाखम परियोजना -

प्रतापगढ जिले में छोटी सादड़ी कस्बे के पास जाखम नदी का उद्गम स्थल है। जाखम नदी के पानी का उपयोग करने हेतु राज्य सरकार द्वारा 1962 में इस परियोजना को स्वीकृति प्रदान की गयी थी तथा 1986 में इसमें जल प्रवाहित किया गया। इस परियोजना का पूर्ण कार्य वर्ष 1998-99 में पूरा हो गया है। यह परियोजना चित्तौड़गढ़ - प्रतापगढ़ मार्ग पर अनूपपुरा गांव में बनी हुई है। यह राजस्थान की सबसे ऊंचाई पर स्थित बांध है। इस परियोजना से प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा के आदिवासी कृषक लाभान्वित होते हैं।

यह परियोजना आदिवासी क्षेत्रों के लिए लाभदायक सिद्ध हुई है। इस परियोजना में जल विद्युत उत्पादन की दो इकाईयां है।

11. सिद्धमुख नोहर परियोजना -

इसका नाम अब राजीव गांधी नोहर परियोजना है। नाबार्ड के 21.44 करोड़ रूपये के वित्तीय सहयोग से 27.53 करोड़ रूपये की इस उपयोजना का प्रारम्भ इसका शिलान्यास 5 अक्टूबर 1989 को राजीव गांधी ने भादरा के समीप भिरानी गांव से किया। रावी-व्यास नदियों के अतिरिक्त जल का उपयोग लेने के लिए भाखड़ा मुख्य नहर से 275 कि.मी. लम्बी एक नहर निकाली गयी है। इस परियोजना से हनुमानगढ़ एवं चुरू जिले की 18350 हैक्टेयर अतिरिक्त भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो रही है। इससे हनुमानगढ़ के 24 गाँव एवं चुरू जिले के 14 गाँवों को लाभ मिल रहा है। इस परियोजना का 12 जुलाई 2002 को श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा लोकार्पण किया गया। इस परियोजना के लिए पानी भाखड़ा नांगल हैड वर्क से लाया गया है।

राजस्थान में इस योजना में कार्य- (Works in Rajasthan)

(1) सिद्धमुख कमांड (Sidhmukh Command)-

(i.) 20 km Sidhmukh feder in Rajasthan territory from Haryana Rajsathan border
(ii.) Lined Raslana distributary (64 km) and Sidhmukh distributary (52 km) both offtaking from the tail of Sidhmukh feeder in Rajasthan.

(2) नोहर कमांड (Nohar Commnad)-

i. Remodelling of Jasana major (3km).
ii. Remodelling of Khanania (25km) and Jasana (23 km) distributary of Bhakra system for extra discharge requirement of Nohar command.
iii. Nohar distributary off-taking from km 11.3 of Khanals distributary and its minot network.

12. ओराई सिंचाई परियोजना -

 इसमें चित्तौड़गढ़ जिले में भोपालपुरा गांव के पास ओराई नदी पर एक बांध का निर्माण किया गया। इस परियोजना का निर्माण कार्य सन् 1962 में प्रारम्भ होकर सन् 1967 में पूर्ण हो गया। मुख्य बाँध नदी के तल से 20 मीटर ऊँचा है एवं इसकी भराव क्षमता लगभग 3810 लाख घनमीटर है। इस बांध से एक नहर निकाली गई है जिसकी लम्बाई 34 कि.मी. है। इस परियोजना से चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा जिले में सिंचाई सुविधा प्राप्त हो रही है।

13. मोरेल बाँध परियोजना -

सवाईमाधोपुर तहसील से लगभग 16 कि.मी. दूर मोरेल नदी पर मिट्टी का एक बाँध बनाया गया है।

14. पांचना परियोजना -

राजस्थान के पूर्वी जिले करौली के गुड़ला गाँव के निकट पांच नदियों के संगम स्थल पर बने इस बाँध में भद्रावती बरखेड़ा, अटा, आची तथा भैसावट नदी के मिलने पर इसका नाम पांचना बाँध रखा गया है। बालू मिट्टी से बने इस बाँध की उंचाई 25.5 मीटर निर्धारित कर दी गई। इसकी जल ग्रहण क्षमता लगभग 250 क्यूसेक है। परियोजना सन् 2004-05 में पूर्ण हो चुकी है। इससे करौली व सवाईमाधोपुर जिले व बयाना (भरतपुर) को लाभ मिल रहा है। यह मिट्टी से निर्मित राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है।

15. नर्मदा परियोजना -

नर्मदा बाँध परियोजना मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है। नर्मदा जल विकास प्राधिकरण द्वारा नर्मदा जल में राजस्थान का हिस्सा 0.50 MAF (मिलियन एकड़ फीट) निर्धारित किया गया है। इस जल को लेने के लिए गुजरात के सरदार सरोवर बांध से नर्मदा नहर (458 कि.मी. गुजरात + 75 कि.मी. राजस्थान) निकाली गई है। 27.03.2008 को उक्त परियोजना के तहत गुजरात के सरदार सरोवर बाँध से छोडे गये नर्मदा नदी के पानी का राजस्थान में विधिवत् प्रवेश यह नहर जालौर जिले की सांचौर तहसील के सीलू गाँव से हुआ। यह राज्य की पहली परियोजना है जिसमें सम्पूर्ण सिंचाई ‘‘फव्वारा पद्धति’’ से होती है। फरवरी 2008 को वसुंधरा राजे ने जल प्रवाहित किया। इस परियोजना में सिंचाई केवल फव्वारा पद्धति से सिंचाई करने का प्रावधान है। जालौर व बाड़मेर की गुढ़ामलानी तहसील लाभान्वित होती है।

16. मानसी वाकल परियोजना -

यह राजस्थान सरकार व हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड की संयुक्त परियोजना है। इसमें 70 प्रतिशत जल का उपयोग उदयपुर व 30 प्रतिशत जल का उपयोग हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड करता है। इस परियोजना में 4.6 कि.मी. लम्बी सुरंग बनी हुई है, जो देश की सबसे बड़ी जल सुरंग है।

17. बीसलपुर परियोजना -

यह राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है। यह परियोजना बनास नदी पर टौंक जिले के टोडारायसिंह कस्बे में है। इसका प्रारम्भ 1988-89 में हुआ। इससे दो नहरें भी निकाली गई है। इससे अजमेर, जयपुर, टौंक में जलापूर्ति होती है। इसे NABRD के RIDF से आर्थिक सहायता प्राप्त हुई है।

18. ईसरदा परियोजना -

बनास नदी के अतिरिक्त जल को लेने के लिए यह परियोजना सवाई माधोपुर के ईसरदा गांव में बनी हुई है। इससे सवाईमाधोपुर, टोंक, जयपुर की जलापूर्ति होती है।

19. मेजा बांध-

यह बांध भीलवाड़ा के माण्डलगढ़ कस्बे में कोठारी नदी पर है। इससे भीलवाड़ा शहर को पेयजल की आपूर्ति होती है। मेजा बांध की पाल पर मेजा पार्क को ग्रीन माउण्ट कहते हैं। यह माउण्ट फूलों और सब्जियों के लिए प्रसिद्ध है।

20. ओराई सिंचाई परियोजना -

इस परियोजना में चित्तौड़गढ़ जिले में भोपालपुरा गांव के पास ओराई नदी पर एक बांध का निर्माण किया गया। इस बांध से 34 कि.मी. लम्बाई की एक नहर निकाली गई है। इस परियोजना से चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा जिले में सिंचाई सुविधा प्राप्त हो रही है।

21. पार्वती परियोजना (आंगई बांध) -

इस योजना में धौलपुर जिल में पार्वती नदी पर 1959 में एक बांध का निर्माण किया गया। इससे धौलपुर जिले में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो रही है।

22. गम्भीरी परियोजना -

इस बांध का निर्माण 1956 में चित्तौड़गढ़ जिले के निम्बाहेड़ा के निकट गम्भीरी नदी पर किया गया। यह मिट्टी से निर्मित बांध है। इस बांध से चित्तौड़गढ़ जिले को सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो रही है।

23. भीखाभाई सागवाड़ा माही नहर-

यह डूंगरपुर जिले में स्थित इस परियोजना को 2002 में केन्द्रीय जल आयोग ने स्वीकृति प्रदान की। इसमें माही नदी पर साइफन का निर्माण कर यह नहर निकाली गई है। यह डूंगरपुर जिले में लगभग 21000 हेक्टेयर में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए है।

24. इन्दिरा लिफ्ट सिंचाई परियोजना -

यह करौली जिले की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना है। इसमें चम्बल नदी के पानी को कसेडु गांव (करौली) के पास 125 मीटर ऊंचा उठाकर करौली, बामनवास (सवाईमाधोपुर) एवं बयाना (भरतपुर) में सिंचाई सुविधा प्रदान की गई।

25.  सेई परियोजना:-

उदयपुर की घाटियों में सेई नदी पर एक बांध बनाया गया हैं। जिसका पानी इकट्ठा करके भूमिगत नहर के द्वारा जवांई बांध के लिए भेजा जाएगा, जो गैर-मानसून अवधि में पीने का पानी व सिंचाई उपलब्ध करवा जा रहा है।

26.  बांकली बांध -

यह जालौर में, सुकड़ी व कुलथाना नदियों के संगम पर स्थित हैं। इस बांध में जालौर, पाली व जोधपुर को पेयजल व सिंचाई उपलब्ध होती हैं।

27.  सोम कमला आम्बा सिंचाई परियोजना -

दक्षिणी राजस्थान की जनजाति बहुल बांगड़ क्षेत्र की समृद्धि के लिए सोम कमला अंबा सिंचाई परियोजना भाग्य रेखा है। उदयपुर जिले के सलुम्बर के निकट सोम एवं गोमती नदी पर कमला आम्बा गांव के समीप 34.5 मीटर ऊँचे 620 मीटर लम्बे बांध का निर्माण किया गया है। इससे डूंगरपुर और उदयपुर के अनेक गांवों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। इसका निर्माण 1975 में स्वीकृत हुआ तथा 1995 में पूर्ण हुआ।

28. सोम कागदर परियोजना - 

यह उदयपुर में स्थापित परियेाजना हैं।

29. पार्वती पिकअप वीयर परियोजना-

बारां जिले में चम्बल नदी पर यह एक वृहद् सिंचाई परियोजना है।

30. अकलेरा सागर परियोजना -

वृहद् सिंचाई एवं पेयजल परियोजना के अंतर्गत बारां जिले के किशनगढ़ के समीप ये बाँध निर्मित है।

31. हरिश्चंद्र सागर वृहद् सिंचाई परियोजना-

हरिश्चंद्र सागर वृहद् सिंचाई परियोजना को कालीसिंध परियोजना भी कहा जाता है। इस योजना में लाभान्वित जिले कोटा एवं झालावाड़ है तथा यह बाँध कोटा जिले में कालीसिंध नदी पर निर्मित है। ये परियोजना 1957 में प्रथम पंचवर्षीय योजना में स्वीकृत हुई थी तथा 8 वीं प्रथम पंचवर्षीय योजना में पूर्ण हुई। इस परियोजना में कालीसिंध नदी पर झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील में 427 meter लम्बा एक पिक अप वीयर है। मुख्य नहर की लम्बाई 37 km है जिसकी हेड डिस्चार्ज क्षमता 8.25 cumec है। इसका वर्तमान कमांड क्षेत्र 12,284 hectare है।
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