3/11/2014 07:59:00 am
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अजमेर में स्थित इस राजकीय संग्रहालय को ‘मैगजीन' के रूप में भी जाना जाता है। यह “अकबर के किले (मैगजीन किले)” के अंदर स्थित है। इसे लॉर्ड कर्जन और भारत में पुरातत्व विभाग के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल की पहल के तहत अक्टूबर 1908 में स्थापित किया गया था। बाद में अपने पहले अधीक्षक पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा अपनी प्रदर्शनी के माध्यम से क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत की ओर लोगों का ध्यान केंद्रित करने के उद्देश्य से इसे विकसित किया गया। इस संग्रहालय में मुख्य रूप से मूर्तियां, शिलालेख, पूर्व ऐतिहासिक अनुभाग, लघु चित्रों, अस्त्र-शस्त्र, कवच और कला और शिल्प की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है।
मूर्तियां-
मूर्ति-शिल्प अनुभाग इस संग्रहालय का सबसे दिलचस्प अनुभाग है। इस अनुभाग का गठन पुष्कर, अढाई दिन का झोंपड़ा, बघेरा , पीसांगन, हर्षनाथ (सीकर) भरतपुर, सिरोही, अर्थुना और ओसियां से प्राप्त प्राचीन, दुर्लभ और अद्वितीय मूर्तियों से किया गया है।  ये मूर्तियां गुप्तकाल से लेकर 19 वीं शताब्दी ईसवी की तक की है जो शैव​​, वैष्णव और जैन धर्मों का प्रतिनिधित्व करती है। यहाँ प्रदर्शित शानदार कला नमूनों में में लिंगोद्भव महेश्वर (No. 374), चतुर्मुख शिवलिंग (No. 15 और 16), शिव और पार्वती विवाह (No. 13),  ब्रह्मा-विष्णु-महेश (No.206), गणेश (No.1054), विष्णु (No.50), सूर्य (No.370), नक्षत्र (No.451), वराह (No.448), लक्ष्मी नारायण (No.352), कुबेर (No.54,349, 356)  और इंद्र (No.55) आदि प्रमुख है।

लिंगोद्भव

 इसके अलावा यहाँ कुछ रोचक जैन मूर्ति-शिल्प भी एक अलग गैलरी में प्रदर्शित हैं। राजस्थान जैन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, इसी कारण इस संग्रहालय को भी जैन मूर्तियों का अच्छा संग्रह प्राप्त हुआ है। संग्रहालय के जैन मूर्ति-शिल्प में ऋषभदेव(No.44), पार्श्वनाथ (No.56 & 17), कुंथुनाथ (No.1143), महावीर (No.279), शांतिनाथ (No.344 -345), यक्ष गौमुख (No.370) और सरस्वती (No.57-58) विशेष ध्यानाकर्षण योग्य है तथा इस क्षेत्र में जैन प्रभाव को सिद्ध करते हैं।  यहाँ के मूर्तिकला संग्रह के अधिकतर शिल्प 10 वीं शताब्दी से 12 वीं शताब्दी ई. के मध्य के हैं। यह वह दौर था, जिसके दौरान अजमेर के चौहान राजाओं विग्रहराज द्वितीय, विग्रहराज तृतीय, अजयराज, विग्रहराज चतुर्थ (उपनाम वीसलदेव), सोमेश्वर और महान पृथ्वीराज चौहान तृतीय का राज्य रहा था।  इस काल में जीवन के हर क्षेत्र में वृद्धि परिलक्षित हुई है। इस काल में कला, वास्तुकला (आर्किटेक्चर) और साहित्यिक गतिविधियों में अजमेर राज्य चरम पर पहुंच गया था। अजमेर, सरवर, नारायणा, बीसलपुर, रणथम्भौर और नाडोल इस अवधि में राजस्थान में मुख्य सांस्कृतिक केन्द्रों में शामिल थे।             
     इस काल में मूर्तिकला की सामग्री में हलका बलुआ पत्थर, सफेद संगमरमर, बेसाल्ट, ग्रेनाइट आदि शामिल हैं। 11 वीं से 12 वीं सदी की प्रतिमाओं में (बघेरा से प्राप्त) काले मुलायम प्रस्तर पर उच्च पॉलिश से युक्त स्पष्ट और बेहतरीन महीन नक्काशी की गयी है।


शिलालेख-
संग्रहालय में प्रदर्शित राजस्थान के विभिन्न भागों से एकत्र किए गए महत्वपूर्ण अद्वितीय शिलालेख निम्नानुसार है-
1. ई.पू. द्वितीय शताब्दी के लिए आबंटित बरली  का रहोमी  शिलालेख (अजमेर)। यह राजस्थान में खोजे गए प्राचीन शिलालेखों में से एक है।
2. विक्रम संवत् 481 का बाघरी शिलालेख।
3. विक्रम संवत् 894 का Bauka का जोधपुर शिलालेख (इसके अनुसार मंडोर, जोधपुर के प्रतिहार ब्राम्हण हरिश्चन्द्र के वंशज हैं और इसमें ब्राम्हण हरिश्चन्द्र के Bauka तक के वंशजों के नाम और काल अभिलेखित है।)
4. 10 वीं शताब्दी का पुष्कर शिलालेख ( इसमें राजा वाकपति राज का नामोल्लेख है )
5. एक स्लैब में 1153 ई. का हरिकेलि नाटक (चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ  द्वारा रचित) खुदा हुआ है।
6.  1153 ई. का ललित विग्रहराज नाटक युक्त स्लैब (चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ के काल में उनके दरबारी कवि सोमदेव द्वारा रचित )।
7. चामुंडाराज के समय का शिलालेख (विक्रम संवत् 1137)
8. महान शासक पृथ्वीराज तृतीय के काल का विक्रम संवत् 1234 का शिलालेख ( एक वापी के निर्माण का रिकॉर्ड)
9. कई महत्वपूर्ण ताम्र-पत्र इस संग्रह के मौजूद है।
अस्त्र-शस्त्र–
इस भाग में मध्यकालीन अवधि की लड़ाइयों में प्रयुक्त हुए सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह है। इनमें तलवारें, बंदूकें, ढाल, कटार, फरसे आदि सम्मिलित हैं।  विभिन्न प्रकार की तलवारों पर उपयोगकर्ता की पसंद के अनुसार कलात्मक मूठे बनी है। ऐसी अन्य तलवारें भी हैं जो तकिये के नीचे रखी जाती थी और आपात स्थिति में प्रयुक्त की जाती थी। यहाँ टोडरदार, पठारीदार, टोपीदार, कारतूसी, एकनाली, दुनाली तथा रामचंगी आदि विभिन्न प्रकार बंदूकें प्रदर्शित है। इस भाग में प्रदर्शित राजपूत योद्धा का नासिका गार्ड युक्त एक हेलमेट भी उल्लेखनीय है। ऐतिहासिक महत्व की एक तोप भी संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है।
खुदाई सामग्री-
मोहनजोदाड़ो की सिंधु घाटी में खोजे गए पूर्व ऐतिहासिक अवशेष और चित्रलेख युक्त मोहरों के सांचे यहाँ प्रदर्शित है। इनमें से चकमक ब्लेड या चाकू,  पत्थर के तीखा करने के उपकरण, देवी माँ प्रतिमाएं, वीनस, खिलौना गाड़ी के पहिए, शंख के टुकड़े, कार्बनीकृत गेहूं के छोटे से हिस्से, तांबे के तीर, मिट्टी की चूड़ियाँ, सुईयां, विभिन्न प्रकार की ईटें, मानव और पशुओं की मूर्तियां, तांबे की चूड़ियां, एक कुल्हाड़ी आदि उल्लेखनीय है, जो लगभग 3000 वर्ष ईसा पूर्व के हैं।
कला और शिल्प-
प्राचीन सभ्यता के लकड़ी तथा हाथी दांत पर नक्काशी युक्त कलाकृतियाँ, एंटीमनी बक्सों पर हाथी दांत व गोटा-पट्टा के कलात्मक कार्य युक्त कुछ नमूने, बर्तन, कलश व प्यालें, हाथी दांत का कंघा, चाकू, नेकलेस, पीतल पर उत्कीर्ण नक्काशी व उभरी हुई नक्काशी, लकड़ी के कलम स्टेंड, संगमरमर की प्लेट, पत्थर की आटा चक्की और ब्लू पॉटरी के कुछ नमूने इस कला प्रदर्शनी में रखे गए हैं।
रिजर्व संग्रह –
निदेशक, पुरातत्व और संग्रहालय, राजस्थान, जयपुर की पूर्व अनुमति से यहाँ संरक्षित सामग्री के फोटो अनुसंधान कार्य के लिए खिंचवाए जा सकते हैं।
सन्दर्भ पुस्तकालय–
शोधार्थियों के उपयोग हेतु इस संग्रहालय में इतिहास, कला और पुरातत्व पर संदर्भ पुस्तकों का एक वृहद् संग्रह है।
समय अनुसूची
यह संग्रहालय प्रतिदिन प्रातः 10:00 से सायंकाल 4:30 बजे तक खुला रहता है किन्तु होली, दीपावली, दशहरा, गणतंत्र दिवस, ईद-उल-जुहा, महानवमी, जन्माष्टमी, नवरात्र स्थापना और गोवर्धन पूजा जैसी सार्वजनिक छुट्टियों पर बंद रहता है।
संगठनात्मक संरचना –
अजमेर के संग्रहालय एक सरकारी संस्था है और निदेशालय, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग,  राजस्थान सरकार, जयपुर के अधीन है तथा यह अधीक्षक, पुरातत्व और संग्रहालय, हवा महल सर्किल, जयपुर, राजस्थान के प्रशासनिक नियंत्रण में है। संग्रहालय के कर्मचारियों में क्यूरेटर (प्रभारी अधिकारी) व कार्यालय सहायक हैं। इसके अलावा गैलरी अटेंडेंट, घड़ी और वार्ड स्टाफ भी है।

वर्गाकार इमारत

अकबर के किले स्मारक का संरक्षण –
      यह संग्रहालय अकबर के किले या मेग्जीन किले में स्थित है जिसका निर्माण वर्ष 1570 ई. (हिजरी 976) में मुगल सम्राट अकबर द्वारा कराया गया था यह एक विशाल वर्गाकार इमारत है जिसके प्रत्येक कोने पर बड़े अष्टकोणीय बुर्ज हैंयह किला शहंशाह के अजमेर प्रवास के दौरान ठहरने में प्रयुक्त किया जाता था इसके मध्य में एक सुन्दर सभा कक्ष बना हुआ है तथा शहर के पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए एक आकर्षक शोभायमान द्वार है शहंशाह जहांगीर अपने अजमेर प्रवास के दौरान प्रतिदिन प्रातःकाल इस द्वार पर बने झरोखे में प्रजा को दर्शन देता था तथा उनकी समस्यायों को सुनता था व न्याय भी करता था। इंग्लैंड के सम्राट जेम्स प्रथम का राजदूत सर टॉमस रो ने अपने आप को जहांगीर के सम्मुख इसी द्वार पर 10 जनवरी, 1616 को प्रस्तुत किया था और ईस्ट इण्डिया कंपनी को भारत में व्यापार करने की अनुमति माँगी थी। इस किले को राजस्थान सरकार द्वारा संरक्षित किया गया है।

4 टिप्पणियाँ:

  1. Thanks for the information. Appreciable work. Sad, but even official Rajasthan tourism website lacks information about this monument, they have just mentioned and name and basic details.

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