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मेरु नाट्यम है गवरी-

राजस्थान की समृद्ध लोक परम्परा में कई लोक नृत्य एवं लोक नाट्य प्रचलित है। इन सबसे अनूठा है ' गवरी ' नामक 'लोक नृत्य-नाटिका''गवरी' उन भीलों का एक मेरु नाट्यम हैं। यह एक नृत्य नाटक है, जो कि अनुकरण (नक़ल mime) और वार्तालाप को जोड़ता है, और ''गवरी नृत्य या राई नृत्य'' के नाम से जाना जाता है। गवरी में अभिनीत किये जाने वाले दृश्यों को 'खेल', 'भाव' या सांग कहा जाता है। यह भील जनजाति का एक ऐसा नाट्य-नृत्यानुष्ठान है, जो सैकड़ों बरसों से प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा के एक दिन पश्चात प्रारंभ हो कर सवा माह तक आयोजित होता है। इसका आयोजन मुख्यत: उदयपुर और राजसमंद जिले में होता है। इसका कारण यह है कि इस खेल का उद्भव स्थल उदयपुर माना जाता है तथा आदिवासी भील जनजाति इस जिले में बहुतायत से पाई जाती है। गवरी का कथानक भगवान शिवजी के इर्द-गिर्द होता है, जो इसके केंद्रीय चरित्र है, तथा इस नृत्य-नाटिका में उनका चरित्र बहुत ही आश्चर्यजनक रूप में चित्रित होता है। गवरी में जो गाथाएं सुनने को मिलती हैं, उनके अनुसार 'देवी गौरजा' (माँ पार्वती या दुर्गा या अंबे) धरती पर आती हैं और धरती पुत्रों को खुशहाली का आशीर्वाद देकर जाती हैं। गौरजा भीलों की प्रमुख देवी हैं। वे मानते हैं कि यह देवी ही सर्वकल्याण तथा मंगल की प्रदात्री है। यह सभी प्रकार के संकटों से हमारी रक्षा करती है व विवादों-झगड़ों तथा दुख: दर्दों से मुक्ति दिलाती है। इसी देवी की आराधना में ये लोग 'गवरी' अनुष्ठान का संकल्प धारण करते हैं। 




भील लोग देवी गौरजा माताजी के देवरे (मंदिर) में जाकर गवरी लेने की इच्छा व्यक्त करते हैं और पाती (पत्ते) माँगते हैं । 'पाती माँगना' एक परम्परा है जिसमे देवी की मूर्ति के समक्ष एक थाली रखकर विनती करते है। यदि मूर्ति से फूल या पत्तियाँ गिर कर थाली में आ जाती है तो इसे देवी की इजाजत मानते हैं। देवरे में भोपा (पुजारी) के शरीर में माता प्रकट हो कर भी गवरी की इजाजत देती है। तब गांव के प्रत्येक भील के घर से एक व्यक्ति सवा माह तक पूरे संयम के साथ गवरी नाचने के लिए घर से निकल जाता है। इन कलाकारों को खेल्ये कहा जाता है। गवरी के सवा मास दौरान ये खेल्ये मात्र एक समय भोजन करते हैं, ये नहाते भी नहीं हैं तथा हरी सब्जी, मांस, मदिरा का त्याग रखते हैं। पांव में जूते नहीं पहनते हैं। एक बार घर से बाहर निकलने के बाद सवा माह तक अपने घर भी नहीं जाते हैं। 


एक गाँव का गवरी दल केवल अपने गाँव में ही नहीं नाचता है अपितु हर दिन उस अन्य गाँव में जाता है जहाँ उनके गाँव की बहन-बेटी ब्याही गई है। जिस गाँव में ये जाता उस गाँव के लोग इस दल के भोजन की व्यवस्था करते है तथा नृत्य के अंत में गवरी को न्यौतने वाली बहन-बेटी उन्हें कपड़े भी भेंट करते है जिसे पहरावनी कहते हैं । गवरी का गठन करते समय कलाकारों के लिए कपड़ों, गहनों, मेकअप इत्यादि पर आने वाले खर्च को पूरे गाँव के सभी जातियों के लोग मिल जुल कर वहन करते हैं। जो कलाकार गवरी में जिस पात्र का अभिनय करता है अक्सर वह हर समय उसी की वेशभूषा पहने रहता है। गवरी का प्रदर्शन जहां भी चौराहा या खुला स्थान होता है, वहां होता है। यह खेल प्रात:काल 8 - 9 बजे से सायंकाल 5 - 6 बजे तक चलता है। इसमें बालक से लेकर बूढ़े तक आयु वर्ग के 40 - 50 लोग भाग लेते हैं। गाँव में हर तीसरे वर्ष गवरी ली जाती है। खम्मा के फटकारे लगते हैं। आनंद का उत्सव होता है। 

गवरी के मुख्य पात्र- 

राईबूढ़िया का मुखौटा
गवरी में दो मुख्य पात्र होते है बूढ़िया (राईबूढ़िया)  और राईमाता। बूढ़िया को शिव तथा राईमाता को पार्वती माना जाता है। इसलिए दर्शक इन पात्रों की पूजा भी करते है। गवरी का मूल कथानक शिव-भस्मासुर से संबंधित है। इसका नायक बूडिया होता है जो शिव तथा भस्मासुर का प्रतीक है। बूड़िया की वेशभूषा विशिष्ट होती है। इसके हाथ में लकड़ी का खांडा, कमर में मोटे घुघरूओं की बंधी पट्टी, जांघिया तथा मुँह पर विचित्र कलात्मक मुखौटा होता है। जहां इसकी जटा तथा भगवा पहनावा शिवजी का प्रतीक है वहीं हाथ का कड़ा तथा मुखौटा भस्मासुर का द्योतक है। 

गवरी के संबंध में प्रचलित मान्यताएं-

भगवान शिव और भस्मासुर की कहानी 'गवरी' की मूल कहानी है। भस्मासुर ने अपनी तपस्या के माध्यम से भगवान शिव से वरदान में 'भस्म-कडा' प्राप्त किया था, जिसकी सहायता से वह भगवान शिव को भस्म करना चाहता था। भगवान विष्णु ने मोहिनी का मोहक रूप को धारण किया और भस्मासुर को ही भस्म कर दिया था। राख में जलते समय, भस्मासुर ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे अमरत्व का वरदान दें। गवरी का नाटक इस घटना का जश्न मनाता है। भस्मासुर के प्रतीक रूप में, गवरी का मुख्य पात्र 'बूडिया' अपने चेहरे पर एक असाधारण कलात्मक मुखौटा पहनता है।
अपने जीवन और कला में भील हिंदू पौराणिक कथाओं के प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं। इस नृत्य नाटक 'गवरी' की उत्पत्ति के बारे में कई कहानियां और किंवदंतियां हैं। चूंकि इस खेल को भील ही करने वाले अकेले हैं, इसलिए 'गवरी' व उनके संबंधों को जानना महत्वपूर्ण है। 

(a) ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव भीलों के मुख्य देवता है। इसलिए उन्होंने शिवजी के जीवन की सबसे अधिक प्रभावशाली घटना अपनाई है ताकि वे अपनी विश्वास और भक्ति प्रदर्शित कर सकें। 
(b) भील अपने को भगवान शिव के सभी भक्तों के सबसे अधिक आस्थावान मानते हैं। भस्मासुर की याद में और उसकी अमरता रखने के लिए, एक व्यक्ति को चुनना बहुत जरूरी था जिसे भस्मासुर की खोपड़ी दी जा सकती थी तथा उसकी याद में एक समूह नृत्य-नाटक किया जाए। भगवान शिव ने यह उचित माना कि भील, जो प्रतिदिन उनके ध्यान-स्थल (seat of meditation) पर मूली लेकर आता था, उन्हें ही 'गवरी' करना चाहिए।
(c) पार्वती के पिता हिमाचल के हीमजल भील थे। इसलिए भील दृढ़ता से मानते हैं कि वे शिव के एकमात्र सच्चे उपासक हैं।
(d) भगवान शिव ने ही 'राई का मंडल' बनाया, जिसे उन्होंने भीलों को सौंप दिया, और यह मंडल 'राई' या 'गवरी' के रूप में जाना जाता है। यह किंवदंती उनकी धारणा की पुष्टि करती है कि शिव के साथ उनका संबंध प्राचीन है, वे उनके एकमात्र उपासक हैं। 

राई मण्डल


गवरी के पात्रों के प्रकार-

'गवरी' में 4 प्रकार के पात्र, जैसे- देवता, मनुष्य, राक्षस और जानवर होते हैं-

(i) देवता-

देवता आदर्शों के प्रतीक हैं। भगवान शिव और पार्वती मनुष्यों में प्रवेश करते हैं तथा उनकी सहायता करते हैं, दुःख-पीड़ितों को शान्ति देते है और दुखों को कम करने की कोशिश करते हैं। शिव अपनी अलौकिक शक्ति से उनके कार्यों को पूर्ण करने में मदद करने के लिए वरदान देते हैं।

(ii) मानव पात्र-

हम गवरी में कई मानव पात्र को देखते हैं :-
  • भूडिया        
  • राई
  • कुटकड़िया
  • कंजर-कंजरी 
  • मीणा
  • बणजारा-बणजारी
  • दाणी
  • नट
  • खेतूडी 
  • शंकरिया 
  • कालबेलिया
  • कान-गूजरी 
  • भोपा
  • फत्ता-फत्ती
इनके अलावा अन्य पात्र भी होते हैं। 

(iii) दानव-

दानव चरित्र क्रूर, दुःखद और परेशान करने वाले हैं। उसके सिर पर सींग होते हैं और उनकी उपस्थिति भयानक और अशुभ होती है। खडलीयो भूत, भियाँवड़ (हटियो) आदि गवरी के दानव पात्र हैं।

(iv) पशु पात्र-

गवरी के पशु पात्र हिंसक और क्रूर नहीं हैं। इनमें सुअर- भालू और शेर प्रमुख हैं।

'गवरी' का आयोजन करने का उद्देश्य न केवल मनोरंजन है, बल्कि मुख्य रूप से यह धार्मिक कर्तव्य का प्रदर्शन है। इसके द्वारा वे यह बाबा भैरव-नाथ (शिव) को प्रसन्न करके गांव व ग्रामीणों को बीमारी, दुःख-दर्द, गरीबी, अकाल आदि से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।
जो भील लोग गवरी के नाटक में भाग लेते हैं, वे इतना शानदार अभिनय करने का प्रयास करते हैं ताकि उन्हें उन पात्रों के रूप में ही पहचाना जा सके तथा लोग कहे कि वह कितना शानदार अभिनय करता है।
यह बूढ़िया गवरी की गोल घेरे में नृत्य करती गम्मत में नहीं रह कर उसके बाहर रहकर उसके विपरीत दिशा में उल्टे पांव नृत्य करता है। बूड़िया परम्परागत पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिता पुत्र के उत्तराधिकार के रूप में बनता है। राईमाता गवरी की नायिका होती है। प्रत्येक गवरी में राईमाता की संख्या दो होती हैं। दोनों शिव पत्नियां हैं जो शक्ति (सती) और पार्वती का प्रतिनिधित्व करती हैं। 

गवरी के अन्य पात्र शिवजी के गण होते हैं। नायक बूड़िया महादेव शिव है। पुराण में कथा का नायक चूड़ मिलता है। यही चूड़ धीरे-धीरे बूड़ और फिर बूड से बूढ़िया बन गया है। भील ग्रामीणों में यह मान्यता है कि शिव हमारे जंवाई है और गौरजा अर्थात पार्वती हमारी बहन बेटी है। कैलाश पर्वत से गौरजा अपने पीहर मृत्युलोक में मिलने आती हैं। गवरी खेलने के बहाने सवा माह तक अलग-अलग गाँव में यह सबसे मिलती हैं। 
गांव में कोई भी आंगन या कोई चौराहा ही गवरी का मंच (Stage) होता है। गवरी लोक नाट्य में विभिन्न प्रसंगों को जोडने के लिए जो नृत्य किया जाता है, उसे गवरी की घाई कहते है। गवरी में सभी पुरुष कलाकार भी होते हैं। महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं। संपूर्ण गवरी में नायक बूड़िया पूरी गवरी का नेतृत्व करता है। दोनों राइयां लाल घाघरा, चूनरी, चोली तथा चूड़ा पहने होती हैं। इनका दाढ़ी-मूंछ वाले मुँह के भाग को कपड़े से ढँका रहता हैं । 
गवरी के विशिष्ट पात्रों में झामटिया पटकथा की प्रस्तुति देता है तथा कुटकड़िया अपनी कुटकड़ाई शैली से गवरी मे हास्य व्यंग्य का माहौल बनाए रखता है। गवरी में अलग-अलग कहानियों का मंचन किया जाता है। 
गवरी के मुख्य खेलों में मीणा-बंजारा, हठिया, कालका, कान्ह-गूजरी, शंकरिया, दाणी जी, बाणियां, चपल्याचोर, देवी अंबाव, कंजर, खेतुड़ी, बादशाह की सवारी जैसे कई खेल अत्यंत आकर्षक व मनोरंजक होते हैं। गवरी में कुछ ऐतिहासिक खेल भी होते है जिनमें प्रमुख खेल बीबी बादशाह व महाराणा प्रताप का है
भीलों के अनुसार शिव आदि देव हैं। इन्हीं से सृष्टि बनी। पृथ्वी पर पहला पेड़ बड़ अर्थात वटवृक्ष पाताल से लाया गया। देवी अंबाव और उसकी सहेली व अन्य देवियों के साथ यह वृक्ष लाया गया और पहली बार उदयपुर के पास प्रसिद्ध रणक्षेत्र हल्दीघाटी के पास राजसमन्द जिले में ऊनवास गांव में स्थापित किया गया था, जहाँ ये आज भी मौजूद है। 

गवरी के मुखौटे-

'गवरी' में कला और नाटक अविभाज्य हैं। भील इसमें अपना कलात्मक कौशल का प्रदर्शन नृत्य, विभिन्न मुद्राओं, अभिनय व नाटकीयता, प्रतिमा का निर्माण तथा उसकी साज-सज्जा, दृश्य की प्रस्तुति, संगीत और वार्तालाप के माध्यम से करते हैं। गवरी में इन लोगों की दैनिक गतिविधियों को प्रकट किया जाता है। गवरी के नाटक में प्रयुक्त किए जाने वाले अद्भुत शिल्प कौशल वाले मुखौटे लोककला के बहुत ही कलात्मक नमूना होते हैं। राई बुडिया, जो इस नाटक का मुख्य पात्र है, उसे अपने मुखौटे द्वारा ही पहचाना जाता है, जो काफी विशाल और भव्य होता है। जैसे ही वह इस मुखौटे को पहनता है, एक अलौकिक आत्मा 'बुडिया' में प्रवेश करती है और जिस क्षण वह इसे हटा देता है, वह अपने सामान्य मानव रूप में लौट आता है। इस मुखौटे को चांदी की परत (वर्क) को चिपका कर एवं रंगों से सजाया जाता है। 

गवरी का मेकअप-

दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रत्येक चरित्र को एक अलग ही तरह का मेकअप करके सजाया जाता है। इसमें मुख्यतः काले, नीले, पीले और लाल रंग का उपयोग किया जाता है। गवरी उत्सव विभिन्न प्रकार के पारंपरिक मुखौटे बनाए जाते हैं। ये मुखौटे अत्यंत कलात्मक होते हैं।

गवरी का समापन गड़ावण-वळावण से-

गवरी का समापन गौरजा या पार्वती देवी की गजारूढ प्रतिमा का जल में विसर्जन के साथ होता है। पार्वती की  प्रतिमा जिस दिन बनाई जाती है, उसे 'गड़ावण' अर्थात बनाने का दिन कहते हैं और जिस दिन इस प्रतिमा का विसर्जन होता है, उसे 'वळावण' (विसर्जन) पर्व कहते हैं । एक दिन पूर्व सायं को आदिवासी समाज के लोग नृत्य करते हुए गांव के कुम्हार के घर जाते है, जहां ये विधि-विधान पूजा-अर्चना के साथ मिट्टी के हाथी पर सवार गौरज्या की प्रतिमा को एक सवारी के रूप में माताजी के देवरे में लाते हैं तथा यहाँ रात को भी गवरी के खेल का आयोजन होता है, जिसमें आसपास के गाँवों के अलावा कई रिश्तेदार व परिजन दर्शक के रूप में हिस्सा लेते हैं और खेल का मजा लूटते हैं 'वळावण' में गाँव भर के सभी जातियों के लोग एकत्रित  होकर गौरज्या माता की शोभायात्रा निकलते हैं और इस आदिवासी लोक नाट्य का किसी जल स्रोत में धूमधाम से विर्सजन कर, गवरी को नम आँखों से विदाई देते हैं इसमें कपड़े के हाथी का नृत्य मुख्य आकर्षण का केन्द्र होता है गड़ावण-वळावण के बाद गवरी के प्रमुख वाद्य 'मांदळ' को खूंटी पर रख दिया जाता है। इस पर्व में कलाकारों के लिए परिजन, रिश्‍तेदार पोशाकें लाते हैं जिसे 'पहिरावणी' परंपरा कहते हैं। 

'बडलिया हिंदवा'

समापन के दिन रूंखा री रूखाळी अर्थात वृक्षों की रखवाली का संदेश देने वाला नाटक 'बडलिया हिंदवा' जरूर मंचित होता है। इसके अलावा भींयावड नाटक भी होता है। भीयावड दरअसल महिषासुर मर्दिनी के आख्‍यान पर आधारित है। भीया से आशय महिष है, वो हठिया दानव (हठ करने वाला) है। देवी गौरजा उसका वध करती है। 

गवरी का हाथी की कथा -

गड़ावण-वळावण अवसर पर निर्मित एक अन्य कलात्मक कृति गवरी का मिट्टी का शुभ हाथी है। गवरी के विसर्जन के दिन खूबसूरती से सजाए गए मिट्टी के हाथी को लाया जाता है। यह एक सुंदर अनुष्ठान होता है। यह हाथी भगवान शंकर का प्रतीक है। ऐसा कहा जाता है कि जब भस्मासुर दौड़ रहा था, तब उसका 'कड़ा' उसके हाथ से गिर गया और हवा में लटका रहा।
भगवान शिव ने इसे लिया और पहना, और एक हाथी का रूप धारण करते हुए निकट के एक तालाब में कूद कर उसमे समा गए। गवरी के अंतिम दिन इस घटना का एक भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है। इस हाथी को चांदी के गहनों, वर्क, लाल, हरे, पीले और नीले पत्तो (मालिपन्ना) तथा आकर्षक कांच के टुकड़ों आदि से सजाया जाता है। और इस पर शिव व पार्वती (माता गौरजा) बहुत ही कलात्मक रूप से विराजित होते हैं।  
इस प्रकार गवरी नृत्य-नाटक, भील-जीवन में एक प्रतिष्ठित स्थान रखता है। लोक साहित्य में पाए जाने वाले सभी लोक नाटकों में से, 'गवरी' एकमात्र ऐसा लोक नाट्य है जिसमें एक आदर्श लोक नाटक के सभी गुण विद्यमान हैं। यह कला, मूर्तिकला, नृत्य, संगीत, नाटक एवं संस्कृति का एक अद्वितीय व सामंजस्यपूर्ण समन्वय है।


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